
क्या अमेरिका के बिना भी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) विश्वसनीय शक्ति बन सकता है?
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल द्वारा हाल ही में किए गए हमलों में भाग लेने से यूरोपीय देशों द्वारा लगातार इनकार किए जाने के बाद अमेरिका-यूरोप संबंधों में नए तनाव उत्पन्न हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मीडिया के साथ किए इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर बार-बार यूरोपीय सहयोगियों के प्रति असंतोष व्यक्त करते हुए लंबे समय से अस्तित्व में उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) से अमेरिका को अलग करने की धमकी भी दी है। इस गठबंधन में रक्षा खर्च और अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी में अमेरिका की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। यदि वह गठबंधन से बाहर निकलता है तो क्या यूरोपीय देश विश्वसनीय सामूहिक सुरक्षा क्षमता दिखा पाएंगे?
नाटो क्या है और कब बनाया गया था? अमेरिका, यूके, कनाडा और फ्रांस सहित 12 देशों ने 1949 में नाटो की स्थापना की थी। इस सैन्य गठबंधन के सदस्य राष्ट्रों के बीच यह प्रतिबद्धता है कि यदि किसी एक पर हमला होता है तो सभी मिलकर उसकी रक्षा करेंगे। इसका उद्देश्य सोवियत संघ, अर्थात् आज के रूस के अधीन कम्युनिस्ट गणराज्यों के यूरोप में विस्तार को रोकना था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कई पूर्वी यूरोपीय देश इस गठबंधन में शामिल हुए जैसे: अल्बानिया, बुल्गारिया, हंगरी, पोलैंड, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, रोमानिया, लिथुआनिया, लातविया और एस्ट्रोनिया।
दशकों तक तटस्थ रहने वाले स्वीडन और फिनलैंड ने भी यूक्रेन में रूसी आक्रमण के बाद 2022 में नाटो में शामिल होने के लिए आवेदन किया। अब इस सैन्य गठबंधन में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कुल 32 सदस्य राष्ट्र हैं। नाटो की अपनी कोई सेना नहीं है लेकिन अंतरराष्ट्रीय संकट आने पर सदस्य देश सामूहिक सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। नाटो की सेना ने पहली बार 1994 में सैन्य कार्रवाई की थी, जब अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने बोस्निया में बमबारी कर रहे सर्बियाई विमानों को गिरा दिया था। इस ऑपरेशन का नाम ‘ऑपरेशन डिनाइ फ्लाइट’ रखा गया था।
नाटो में शामिल होने के लिए यूक्रेन का आवेदन इस वक्त विचाराधीन है। नाटो ने यूक्रेन युद्ध में अपने सैनिक नहीं भेजे हैं। परमाणु महाशक्ति रूस के साथ युद्ध में घसीटे जाने के डर से उसने यूक्रेन के आकाश को उड़ान निषेध क्षेत्र घोषित भी नहीं किया है। हालांकि सदस्य राष्ट्र यूक्रेन को हथियार और सैन्य सामग्री मुहैया करा रहे हैं। यूरोप की रक्षा और अमेरिका की भूमिका को देखते हुए नाटो एक शक्तिशाली समूह है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका की भागीदारी के बिना इसकी क्षमता काफी कमजोर हो जाएगी। दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 68 हजार अमेरिकी सैनिक 31 सैन्य अकादमी और 19 सैन्य ठिकानों पर स्थायी तौर पर तैनात हैं।
“आज के समय में नाटो के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता परंपरागत और परमाणु दोनों तरह की सैन्य क्षमताओं के लिए अनिवार्य है,” अमेरिकी अनुसंधान संस्था एटलांटिक काउंसिल के ट्रांसएटलांटिक सिक्योरिटी इनिशिएटिव के निदेशक डॉ. टोरी टाउसिग ने बताया। अमेरिकी भागीदारी के बिना “लंबी दूरी की सैन्य और आपूर्ति परिवहन क्षमता, खुफिया जानकारी, सर्वेक्षण, रेकी क्षमता और मिसाइल रक्षा प्रणाली” जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यूरोप के लिए निर्भर रहना मुश्किल होगा, उन्होंने एक ईमेल साक्षात्कार में कहा।
ग्लासगो स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ स्ट्राथक्लाइड में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के प्रोफेसर डॉ. गैविन हॉल ने माना कि अमेरिका के नाटो से हटने पर यूरोपीय सुरक्षा को बड़ा झटका लगेगा। “नाटो सदस्यों में अमेरिका की क्षमता सबसे बड़ी है,” हॉल ने कहा। सैन्य संचालन और तैनाती के शुरुआती चरण मुख्य रूप से यूरोप में ही निर्भर हैं, यह बात यूरोपीय देशों को अच्छे से पता है। अमेरिकी मदद के बिना भी नाटो सदस्य देशों ने उल्लेखनीय सैन्य क्षमता विकसित की है। “बाल्कन क्षेत्र में हवाई मिशन और भूमध्यसागर में समुद्री गश्ती जैसी नाटो की कार्रवाइयां अमेरिकी प्रत्यक्ष संलग्नता के बिना भी जारी हैं।”
नाटो गठबंधन और सदस्य देशों द्वारा रक्षा खर्च में वृद्धि न होने पर ट्रम्प की गहरी नाखुशी है। 2014 में नाटो ने सभी सदस्य देशों को अपने रक्षा खर्च को अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 2% करने का निर्देश दिया था। 2035 तक इसे 5% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2024 में नाटो देशों के कुल रक्षा खर्च में अमेरिका की हिस्सेदारी 66% थी। यूरोपीय देशों के रक्षा बजट बढ़ने की निश्चितता के बारे में टाउसिग ने बताया, “अमेरिका नाटो के मुख्यालय, सैन्य कमान और संरचनाओं के संचालन के लिए आवश्यक साझा बजट का 15% वहन करता है। जब साथी देश रक्षा खर्च बढ़ाते हैं और यदि अमेरिका वित्तीय सहायता नहीं देता है तो भरोसेमंद संसाधनों की जरूरत होती है।”
2013 में नाटो कमांडरों ने आर्कटिक, उत्तरी अटलांटिक, मध्य यूरोप और भूमध्यसागर में संभावित रूसी हमले का मुकाबला करने की विस्तृत योजना बनाई थी। पिछले वर्ष उन्होंने उच्च सतर्कता पर रखे जाने वाली सेना की संख्या 40 हजार से बढ़ाकर 3 लाख करने की योजना की घोषणा की थी। हर तीन साल में नाटो ‘स्टेडफास्ट डिफेंडर’ नामक सैन्य अभ्यास करता है, जिसमें सभी 32 देशों की 90 हजार सैनिक भाग लेते हैं। अगला अभ्यास 2027 में होगा। “नाटो सीमित क्षमता रखता है लेकिन स्पष्ट नेतृत्व और मार्गदर्शन आवश्यक है,” हॉल ने कहा। उन्होंने कहा कि नाटो को अपनी परमाणु क्षमता सुधारनी होगी। फ्रांस और यूके के पास परमाणु हथियार हैं लेकिन उनकी संख्या रूस की तुलना में बहुत कम है। यूरोपीय देश प्रारंभिक हमले को झेलने और तेजी से परिचालन करने की योजना बना रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर हॉल पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
युद्ध कौशल के विकास के साथ संयुक्त युद्ध क्षमता सुधार के लिए अमेरिकी सेना यूरोपीय देशों के साथ बार-बार द्विपक्षीय और बहुपक्षीय अभ्यास करती है। नाटो में भाग लेने से अमेरिका को यूरोप के कई सैन्य केंद्रों तक सुगम पहुंच मिलती है। “नाटो के बिना अमेरिका को उनके साथ रक्षा सहयोग समझौते करने होंगे,” टाउसिग ने कहा। कुछ यूरोपीय देशों के साथ अमेरिका के अलग-अलग समझौते हैं, लेकिन अन्य के लिए नए समझौते की जरूरत होगी। यदि ट्रम्प ने नाटो से वापस जाने की धमकी को लागू किया तो इसका सैन्य और राजनीतिक प्रभाव बहुत बड़ा होगा। “राजनीतिज्ञों को समझना होगा कि अमेरिका का गठबंधन से अलग होना अमेरिका-यूरोप एकता तथा रूस और अन्य विरोधी देशों के सामने नाटो की प्रतिरोध क्षमता पर विनाशकारी प्रभाव डालेगा,” टाउसिग ने चेतावनी दी। सुरक्षा गारंटी के अलावा, नाटो ने यूरोप में अमेरिका के लिए काफी सद्भावना भी पैदा की है। “हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नाटो की सामूहिक सुरक्षा की धारा 5 केवल एक बार सक्रिय हुई है — अमेरिका की रक्षा के लिए।” 2001 के 11 सितंबर आतंकवादी हमलों के दौरान धारा 5 को सक्रिय किया गया था। हॉल का मानना है कि ट्रम्प नाटो से हटने की धमकी देकर ग्रीनलैंड को (जिसे वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अमेरिका को अधिग्रहित करना चाहता है) या व्यापार जैसे अन्य मसलों में लाभ लेने का प्रयास कर सकते हैं। अमेरिका के नाटो से अलग होने से दोनों पक्षों को बड़ा नुकसान होगा। “ऐसा होने पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित यूरो-अटलांटिक सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। इसका संदेश होगा कि यूरोप की सुरक्षा में अमेरिकी हित समाप्त हो गए हैं और यूरोपीय सुरक्षा संरचना में किसी भी परिवर्तन से अमेरिकी हित प्रभावित नहीं होंगे।”