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राष्ट्रपतिलाई जुक्ति लगाउने उक्साउने प्रतिपक्षलाई प्रश्न 

राष्ट्रपति से अध्यादेश रोकने का आग्रह करने वाले विपक्ष के कदम पर उठे सवाल

सरकार ने प्रतिनिधिसभा के अधिवेशन को स्थगित कर अध्यादेशों के जरिए शासन करने की कार्यशैली अपनाई है और राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने तीन अध्यादेश जारी कर चुके हैं। विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति से अध्यादेश रोकने का आग्रह किया है, लेकिन संविधान राष्ट्रपतিকে ऐसा अधिकार नहीं देता है और इस कदम को लोकतंत्र के विरोधी माना जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, विपक्ष को रचनात्मक विरोध और वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करते हुए ही लोकतंत्र को जीवित रखना चाहिए, जिसके लिए संवाद और नैतिक शक्ति आवश्यक है।

१८ वैशाख, काठमांडू। सरकार ने प्रतिनिधिसभा के अधिवेशन को समाप्त कर अध्यादेशों के सहारे शासन चलाने का मार्ग चुना है। यद्यपि यह नेपाल की संसदीय परंपरा में कोई नई बात नहीं है और संविधान में भी अध्यादेश लाने को हमेशा गैरसंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। शुक्रवार शाम तक राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने तीन अध्यादेश जारी कर दिए हैं जबकि शेष पांच अध्यादेशों को रोक कर परामर्श ले रहे हैं। अध्यादेशों के माध्यम से शासन करने की सरकार की यह शैली सार्वजनिक मंच पर आलोचना का विषय बनी हुई है।

वैशाख १७ को निर्धारित अधिवेशन के बुलाए जाने के २४ घंटों के भीतर अचानक स्थगित किए जाने और अध्यादेशों का सहारा लेने से सरकार की लोकतांत्रिक संस्कृतियों और मंशा पर सवाल उठते हैं। इसके अतिरिक्त, जेष्ठ जन आंदोलनों के बाद भी पुरानी सोच और व्यवहार की पुनरावृत्ति को लेकर नागरिकों में सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार जब अध्यादेश लाने के कारण और उद्देश्य के बारे में स्पष्ट और प्रभावी संवाद नहीं कर रही है, तब विरोध के स्वर तीव्र हो रहे हैं। संसद को दरकिनार करने इस प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने के प्रयास से, पिछले समय की तरह ही जनता में प्रणाली की विश्वसनीयता खोने का भय है।

हालांकि, पहले अध्यादेश लाने वाली वर्तमान विपक्षी शक्तियां अब सरकार के इस कदम को गैरसंवैधानिक बता रही हैं। वे राष्ट्रपति से अध्यादेशों को रोकने का आग्रह भी कर रहे हैं। विपक्षी दलों ने बुधवार को बैठक के बाद जारी बयान में कहा, ‘सम्माननीय राष्ट्रपति के समक्ष सिफारिश किए गए अध्यादेश संसद को दरकिनार करने की मंशा से प्रसारित हुए हैं, अतः हम निवेदन करते हैं कि इन्हें स्वीकार न करें।’

पर सभी बातें साफ होनी चाहिए – संसद को रोक कर अध्यादेश के जरिए शासन चलाने वाले सत्तापक्ष के कदम की तुलना में राष्ट्रपति से अध्यादेश रोकने का आग्रह करने वाला विपक्ष का कदम लोकतंत्र के लिए और भी हानिकारक है। एक शक्तिशाली सत्ताधारी को सुधारने के लिए संख्या में कमजोर विपक्ष का ऐसा रुख उसे और कमजोर करता है। ऐसी स्थिति में विपक्षी दलों के पास सरकार से सवाल करने के लिए नैतिक शक्ति होनी चाहिए क्योंकि संख्या की दृष्टि से वे बेहद कमजोर हैं। यह नैतिक शक्ति पिछली कमजोरियों को सुधारकर, आंतरिक लोकतंत्र स्थापित कर और उचित व्यवहार के साथ सवाल पूछकर ही हासिल हो सकती है। संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति को अध्यादेश रोकने का अधिकार नहीं है।

लोकतंत्र एक मूल्य प्रणाली है। लेकिन विपक्ष द्वारा राष्ट्रपति से यह आग्रह करना उसी मूल्य प्रणाली की सीमा को लांघने जैसा है। उल्लेखनीय है कि ‘बदला हुआ कांग्रेस’ कार्यालय में गगन थापा और विश्वप्रकाश शर्मा द्वारा चुने गए संसदीय दल के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे के नेतृत्व में यह आग्रह किया गया है।

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