
सरयू से गंगा तक की आध्यात्मिक यात्रा
तीन दिन लंबी यात्रा में विराटनगर से अयोध्या, प्रयागराज और बनारस के पौराणिक शहरों में धार्मिक स्नान और दर्शन किए गए। मानव मन अनोखा होता है। कभी यह शांत तालाब की तरह होता है, तो कभी आंधी-तुफान की तरह अनियंत्रित हो जाता है। व्यस्त चिकित्सकीय जीवन, अस्पताल की सफेद दीवारों और मरीजों की आहों के बीच कहीं एक आध्यात्मिक प्यास छिपी हुई थी। उसी प्यास और संक्षिप्त अवकाश ने एक योजना को जन्म दिया। सामान्य पर्यटकों के लिए यह ‘असंभव’ जैसा था, जबकि भक्तों के लिए यह ‘महोत्सव’ समान रहा। गुरुवार से रविवार तक तीन दिन की यात्रा, लेकिन गंतव्य तीन पौराणिक शहर थे – अयोध्या, प्रयागराज और बनारस के अनगिनत आध्यात्मिक अनुभव। कई लोग इसे ‘थकाने वाली यात्रा’ कह सकते थे, लेकिन मेरे लिए यह एक ‘आध्यात्मिक मैराथन’ जैसा था। गुरुवार सुबह सामान्य काम जल्दी निपटाकर विराटनगर से हमारी टीम रवाना हुई। टीम में मैं, मेरी जीवनसंगिनी सोमनी, पुत्र विप्लव, पुत्री बंदना, भाभी रम्भा, दीदी अहिल्या और यात्रा के सारथी कुलदीप शामिल थे। कुलदीप की भारतीय नंबर प्लेट वाली गाड़ी केवल यात्रा का साधन नहीं थी, वह एक चलता-फिरता ‘छोटा घर’ थी, जिसमें विश्वास और उत्साह का ईंधन भरा था।
१. अयोध्या: सरयू का शीतल स्पर्श विराटनगर से शुरू हुई लम्बी सड़क यात्रा ने हमें गुरुवार रात २ बजे अयोध्या की पवित्र धरती पर पहुंचाया। शहर सो रहा था, लेकिन हमारे मन में एक अलग जागरूकता थी। मात्र चार घंटे की विश्राम के बाद वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के उष्मा भरे सूरज के साथ सुबह ६ बजे हम सरयू नदी के किनारे पहुंचे। भगवान विष्णु के नेत्रजल से उत्पन्न मानी जाने वाली सरयू नदी के ‘नए घाट’ पर स्नान किया। बुद्ध जयंती एवं वैशाख शुक्ल पूर्णिमा की पावन तिथि पर सरयू के ठंडे और निर्मल जल में डूबने से लंबी यात्रा की थकान दूर हो गई। इस नदी के पानी में एक विशेष शांति है जो इंसान को ‘मर्यादा’ सिखाती है। स्नान के बाद हनुमानगढ़ी का दर्शन किया और फिर नव निर्मित भव्य राम मंदिर का। रामलला की वह अलौकिक मूर्ति इस मैराथन के पहले चरण की सफलता का अनुभव कराती थी।
२. प्रयागराज: संगम की गहराई अयोध्या से आशीर्वाद लेकर हमारी गाड़ी सीधे प्रयागराज (इलाहाबाद) की ओर बढ़ी। यह मैराथन का दूसरा और अति महत्वपूर्ण हिस्सा था। पूर्णिमा के स्नान को हमने मिस नहीं किया। इसलिए दोपहर की गर्मी और सड़क के जाम झेलते हुए शाम ५ बजे हम त्रिवेणी संगम के किनारे पहुंच गए। प्रयागराज को ‘तीर्थराज’ यानी तीर्थों का राजा भी कहा जाता है। यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम होता है। हम संगम के बीचों-बीच थे, जो अत्यंत आकर्षक दृश्य था। यमुना का नीला पानी और गंगा का सफेद पानी स्पष्ट सीमा से अलग दिख रहा था। वहां के बीच जलराशि में परिवार सहित स्नान केवल शरीर को धोना नहीं था, बल्कि अपने अहंकार और बुराइयों का विसर्जन करना था। पौराणिक मान्यता के अनुसार वैशाख पूर्णिमा पर संगम में स्नान करना अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य माना जाता है। स्नान के बाद वहां के प्रसिद्ध सुते हनुमान का दर्शन किया और हमारी यात्रा बनारस की ओर मुड़ी।
३. बनारस: भक्ति और स्वाद का संगम प्रयागराज से प्रस्थान कर हमारी टीम आधरात्री १२ बजे बनारस (काशी) पहुंची। रात के समय बनारस की गलियों में हमारी गाड़ी चल रही थी। यह पौराणिक नगर आधुनिकता से घिरा हुआ है लेकिन उसकी सांस्कृतिक विरासत कभी खोई नहीं। यह शहर कभी नहीं सोता और जीवन तथा मृत्यु को एक ही घाट पर स्वीकार करता देखाई देता है। रात को थोड़ा विश्राम किया। शनिवार सुबह ६ बजे हम गंगा के पवित्र किनारे पहुंचे। हमने बनारस के सबसे ऐतिहासिक और जीवंत दशाश्वमेध घाट पर स्नान किया। कहा जाता है कि यहीं पर ब्रह्मा ने १० अश्वमेध यज्ञ किए थे। गंगा की लहरों में स्नान करते हुए एक अद्भुत ऊर्जा का अनुभव हुआ। स्नान के बाद काशी विश्वनाथ के भव्य ‘कोरिडोर’ (गेट नं. २) से मंदिर में प्रवेश किया, जहां लंबी प्रतीक्षा समाप्त हुई। आधुनिक इंजीनियरिंग और प्राचीन आस्था के संगम ने काशी को नया स्वरूप दिया है। विश्वनाथ के दर्शन के बाद काशी के ‘कोतवाल’ कालभैरव का दर्शन कर हमारी यात्रा पूर्ण हुई। कालभैरव की गलियों में हम कुछ देर भटक गए। एक समान तरह की संकरी गलियां लेकिन अंत नहीं दिख रहा था। अंततः हम गुगल मैप की मदद से बाहर निकलने में सफल हुए। बनारस जाकर उसकी गलियों और स्वाद का अनुभव किए बिना यात्रा अधूरी होती। मिट्टी के बर्तन में मिलने वाली गाढ़ी और मलाईदार लस्सी, स्थानीय मिठाइयां और मुख को तरोताजा करने वाला प्रसिद्ध बनारसी पान इस यात्रा को और भी यादगार बना गया। सोशल मीडिया पर वाइरल बनारस के ‘लिट्टी’ के स्टॉल से भी मिले। वास्तव में वहां की लिट्टी चाट का स्वाद अद्भुत था। गलियों में खो जाना और ‘हरहर महादेव’ की गूंज सुनना अपने आप में एक अलग आनंद था। शनिवार शाम ६:४० बजे गंगा आरती के दर्शन के लिए हम पुनः दशाश्वमेध घाट पहुंचे। सात पंडितों ने भव्य पूजा की, एक साथ आरती के दीप उठाए, शंख की आवाज गुंज उठी और गंगा की लहरों पर हजारों दीप तैर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि साक्षात् ईश्वरीय शक्ति यहीं कहीं मौजूद है। झिलमिलाती रोशनी और प्रकाश के प्रतिबिंब ने मन में एक अलग संसार का अनुभव कराया। यह दृश्य इस ‘आध्यात्मिक मैराथन’ का सबसे सुंदर और भावुक क्षण था।
४. अंतिम प्रहर: घर लौटने की दौड़ शनिवार रात ९ बजे हमने बनारस को विदा किया। अब रविवार तक घर पहुंचकर आराम करना और सोमवार को नियमित काम पर लौटना चुनौती थी। रात भर गाड़ी चलती रही, सड़क की पीली बत्तियां पीछे छूटने लगीं। बीच-बीच में चाय लेते हुए और छोटे-छोटे आराम से शरीर को सहारा देते हुए आगे बढ़े। रविवार दोपहर १२ बजे हम विराटनगर के अपने घर पहुंच गए। इस तरह तीन दिन की ‘आध्यात्मिक मैराथन’ सफलतापूर्वक पूर्ण हुई। यह यात्रा केवल भूगोल की यात्रा नहीं थी, यह तो एक ‘डॉक्टर’ के भीतर छिपी ‘आस्था’ और अपनी आत्मा से संवाद, साथ ही पारिवारिक जिम्मेदारी भी थी। सामान्यतः मैराथन में लोग पदक पाने दौड़ते हैं, लेकिन हमारी इस मैराथन में हम आत्मिक शांति और पारिवारिक सान्निध्य के लिए दौड़े। सरयू की मर्यादा, संगम का ज्ञान और काशी की भक्ति को हृदय में समेट घर लौटना इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इस दिव्य दौड़ ने मुझे और मेरे परिवार को नई ऊर्जा दी है, जो जीवन भर की अमूल्य संपत्ति साबित होगी।