
आकस्मिक प्रधानन्यायाधीश और न्यायिक संतुलन की चुनौती
समाचार सारांश
- डा. मनोजकुमार शर्मा को संसदीय सुनवाई समिति से सर्वसम्मत अनुमोदन के बाद देश के 33वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया।
- शर्मा ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय के सम्पादन में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से इनकार स्पष्ट किया है।
- नवनियुक्त प्रधान न्यायाधीश शर्मा ने न्यायिक मत और दृष्टिकोण से न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाए रखने की चुनौती बताई है।
५ जेठ, काठमांडू। संसदीय सुनवाई समिति से सर्वसम्मत अनुमोदन के बाद डा. मनोजकुमार शर्मा को देश का 33वां प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया गया है।
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल से नियुक्ति पत्र प्राप्त करते ही उन्होंने शपथ ग्रहण भी किया। नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 129(4) के तहत नवनियुक्त प्रधान न्यायाधीश शर्मा ४ जेठ, २०८९ साल तक पद पर रहेंगे। इस अनुच्छेद में प्रधान न्यायाधीश का कार्यकाल छह वर्ष निर्धारित है।
डा. शर्मा की प्रधान न्यायाधीश पद पर सिफारिश करते समय कई परंपरागत प्रथाओं में तोड़ हुई है। २०२० साल में भगवतीप्रसाद सिंह और २०३३ साल में नयनबहादुर खत्री की नियुक्तियों को छोड़कर डा. शर्मा सबसे लंबे समय तक न्यायपालिका का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति होंगे।
प्रधान न्यायाधीश के रैंकिंग में चौथे स्थान पर होने के बावजूद वे सर्वसम्मत अनुमोदित होकर नियुक्त हुए हैं।
कार्यभार ग्रहण करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए नवनियुक्त प्रधान न्यायाधीश शर्मा ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के पक्ष में किसी भी तरह का समझौता न करने का स्पष्ट पार किया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष रहना चाहिए और न्यायाधीशों की व्यावसायिकता तथा न्याय संपादन में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।
संचारकर्मियों से उन्होंने कहा, ‘इस विषय में किसी को कोई संदेह होने की स्थिति नहीं आएगी। मैं इस तरह की शंकाओं को दूर करने के लिए पूर्ण विश्वास दिलाना चाहता हूं।’
स्थिर कार्यकाल और न्यायिक संतुलन की चुनौती
अत्यधिक बदलाव के बजाय स्थिर नेतृत्व होने पर यह राज्यों के अंगों को निश्चित दिशा देने की संभावना बढ़ाता है। लेकिन स्थिर नेतृत्व का दुरुपयोग और निरंकुश होने का जोखिम भी रहता है, इसलिए राज्य के विभिन्न अंगों को संतुलन बनाये रखना आवश्यक होता है।
इस संदर्भ में देखें तो २०७४ साल में तत्कालीन नेकपा के बहुमत प्राप्त होने पर जैसा हाल देखा गया था, वही स्थिति पुनः उत्पन्न हो रही है। उस समय प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने दो-तिहाई बहुमत के साथ शक्तिशाली सरकार चलाई थी।
वहीँ न्यायपालिका को लंबे कार्यकाल वाला प्रधान न्यायाधीश प्राप्त हुआ था। प्रस्तावित प्रधान न्यायाधीश दीपकराज जोशी की नाम सिफारिश अनुमोदित न हो पाने के बाद चोलेन्द्र शमशेर जबरा प्रधान न्यायाधीश बने थे।
लेकिन केपी शर्मा ओली और प्रधान न्यायाधीश जबरा के बीच विवाद और समझौतों ने कार्यपालिका को निरंकुश करने के रास्ते खोल दिए और न्यायपालिका विवाद में फंस गई।
कानूनी पेशेवरों के आंदोलन और महाभियोग के बाद जबरा निलंबित कर सेवा निवृत्त हुए, लेकिन उनका पेंशन आज तक फाइनल नहीं हुआ।

आज भी, दो-तिहाई मत के साथ बालेन शाह प्रधानमंत्री हैं और डा. मनोजकुमार शर्मा न्यायालय में नियमित रूप से न्याय संपादन करते रहे हैं, वे न्यायिक मत व्यक्त करने में कम सक्रिय न्यायाधीश के रूप में जाने जाते थे। अब वे अभूतपूर्व ढंग से प्रधान न्यायाधीश के पद पर चयनित हुए हैं।
शक्तिशाली कार्यपालिका और उसके फैसलों से प्रधान न्यायाधीश डा. शर्मा न्यायिक स्वतंत्रता और न्याय संपादन को दबाने की अनुमति नहीं देंगे या नहीं, यह एक संदेह भी उभर रहा है।
संसदीय सुनवाई के दौरान इसी संदेह को व्यक्त करते हुए सांसद अर्याल ने सवाल किया, ‘क्या अब न्यायपालिका कार्यपालिका के गलत निर्णयों को चुनौती दे सकेगी?’
नेपाल बार एसोसिएशन ने भी नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए विरोध प्रदर्शन किया है।
संवैधानिक कानून विशेषज्ञ काशीराज दाहाल ने दशकों से न्यायपालिका में राजनीतिक हिस्सेदारी और इसके प्रभावों का जिक्र करते हुए कहा कि नए नेतृत्व को इस आरोप से बचना होगा।
निर्णयों पर विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायमूर्ति को निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है, दाहाल ने सुझाव दिया। उन्होंने कहा, ‘स्थिर राष्ट्र के प्रमुख अंगों को दोतरफा संतुलित होना आवश्यक है।’
नवनियुक्त प्रधान न्यायाधीश शर्मा पर शक करने वाले वर्ग उनके किसी भी आदेश और निर्णय पर संदेह कर सकते हैं। न्यायिक दृष्टिकोण से न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाए रखने का भरोसा देना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।
दाहाल ने कहा, ‘न्यायपालिका को संवैधानिक सर्वोच्चता के पक्ष में आगे बढ़ाना चाहिए और शासन के विधि-संबंधी पक्ष को सुनिश्चित करना इसका महत्वपूर्ण कार्य है। साथ ही मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतों को अभिभावक की भूमिका निभानी होगी। इन दोनों विषयों में संतुलन स्थापित करने से न्यायपालिका के प्रति विश्वास बढ़ेगा।’
सहकर्मियों का विश्वास अर्जित करने की चुनौती
प्रधान न्यायाधीश के कार्यकाल में कई बार न्यायाधीशों के विभाजित होने की घटनाएं देखी गई हैं। हालांकि संवैधानिक परिषद से सिफारिश के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में भेदभाव नहीं दिखा।
प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश के दो सप्ताह के भीतर न्यायाधीश दो समूहों में बंट गए हैं और न्यायिक दृष्टिकोण में मतभेद भी दिखने लगे हैं।
कई रिट याचिका दर्ज प्रक्रिया में कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ल ने प्रशासनिक आदेश जारी किया, जिस पर नेपाल बार एसोसिएशन ने विरोध जताया।

प्रधान न्यायाधीश नियुक्ति के बाद डा. शर्मा देश की न्यायपालिका का नेतृत्व करेंगे, लेकिन पूर्व न्यायाधीश कैसे स्वीकार करेंगे? उन्हें संवैधानिक पीठ गठन, प्रशासनिक जिम्मेदारियां वितरित करने और सहकर्मियों के साथ संतुलित व्यवहार करने जैसी चुनौतियों का सामना करना होगा।
एकता का संदेश देने के लिए उन न्यायाधीशों के प्रति भी पक्षपाती आरोपों से बचकर व्यवहार करना होगा जो उन पर प्रश्न उठाते हैं।
सर्वोच्च अदालत बार एसोसिएशन के सचिव रमण कर्ण न्यायाधीशों के बीच विश्वास संकट को व्यक्तिगत मामला मानते हैं।

उनके अनुसार न्यायाधीशों की व्यक्तिगत इच्छा और अहंकार न्याय संपादन में गौण होनी चाहिए।
‘न्याय संपादन में सभी न्यायाधीश समान अधिकार रखते हैं। प्रधान न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के मत समान होते हैं,’ वे कहते हैं, ‘आपसी मतभेद न्यायग्राही को अन्याय का अनुभव करा सकता है, इसलिए न्याय कर्मियों को एकता का संदेश देना जरूरी है।’
यथोचित कौशल और क्षमता का प्रयोग करते हुए विभाजित और असंतुष्ट न्यायाधीशों का विश्वास जीतना प्रधान न्यायाधीश की चुनौती होगी।
संविधान विशेषज्ञ काशीराज दाहाल कहते हैं, ‘सहकर्मियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना जरूरी है। वर्तमान में बार भी विभाजित है और कानून व्यवसायी आपस में मतभेद रखते हैं। प्रधान न्यायाधीश को अपनी ईमानदारी से कानून व्यवसायियों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने होंगे।’
मंगलवार संसदीय सुनवाई में सांसदों ने जल्दी न्याय सम्पादन का ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा। जवाब में डा. शर्मा ने क्षेत्रीय सुधार और सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग से तेज़ और कारगर न्याय देने की प्रतिबद्धता जताई।

गुणवत्ता पूर्ण न्याय सम्पादन के माध्यम से अपनी नियुक्ति का औचित्य साबित करना प्रधान न्यायाधीश शर्मा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
वे पूर्व में प्रकाशन समिति की चयन प्रक्रिया को न्यायिक फैसलों के सीमित प्रकाशन का कारण बताते हुए आलोचना करते रहे हैं। अब वे न केवल संवैधानिक पीठ बल्कि अन्य पीठों का भी नेतृत्व करेंगे।
न्याय पीठ गठन और न्यायिक मत व्यक्त करने में पहल करनी होगी, क्योंकि प्रधान न्यायाधीश की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि न्यायिक भी मानी जाती है।
प्रतिबद्धता जताने के बावजूद न्यायपालिका के संस्थागत सुधार और तेज न्याय संपादन में सफलता पाना चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय में तीन न्यायाधीश पद रिक्त हैं तथा उच्च न्यायालयों में भी न्यायाधीश पदों की पूर्ति में देरी हो रही है।
देश की न्यायपालिका में लगभग सात हजार कर्मचारियों में अभी भी लगभग १० प्रतिशत जनशक्ति की कमी है। मुकदमों की बढ़ती संख्या में तेजी से न्याय देना और पुराने मामलों को निपटाना भी चुनौतीपूर्ण है।
नेपाल बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष तेजबहादुर रावल ने नए न्यायिक नेतृत्व के लिए मामले के दबाव को कम कर जल्द न्याय देने पर बल दिया।
‘सीमित संसाधनों के बीच तेज न्याय प्रवाह और अदालत में भ्रष्टाचार व अन्य विकृतियों का उन्मूलन प्रधान न्यायाधीश के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होगा,’ रावल ने कहा।

पूर्व प्रधान न्यायाधीश दामोदरप्रसाद शर्मा के रिश्तेदार डा. मनोजकुमार शर्मा को संसदीय सुनवाई में ‘नेपोटिज्म-बेबी’ से संबंधित प्रश्नों का सामना करना पड़ा। वे पुनरावेदन अदालत में अतिरिक्त न्यायाधीश थे और नया संविधान लागू होने के बाद स्थायित्व नहीं मिल पाया। वे चोलेन्द्रशमशेर जबरा के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने थे।
नियुक्ति में पृष्ठभूमि, संबंध और अन्य कारणों से उन पर नैतिकता और निष्ठा से जुड़े सवाल उठते रहे हैं।
संसदीय सुनवाई में लेनदेन से जुड़े आरोपों पर मौन रहने के बाद भी दूसरे प्रश्न के बाद उन्होंने उन आरोपों को अस्वीकार कर कहा, ‘ऐसे आरोप पूरी तरह झूठे हैं और पीएचडी से जुड़े आरोप में भी कोई सच्चाई नहीं है।’
चोलेन्द्रशमशेर जबरा के विवादित कार्यकाल और कार्यपालिका के साथ समझौते के कारण उनकी निलंबन हुई, उसके बाद उनका बहिर्गमन हुआ। पिछले प्रधान न्यायाधीशों से उनकी तुलना में कार्य में कमी हो सकती है, पर निष्ठा और ईमानदारी पर प्रश्न नहीं उठाए गए और वही मानक स्थापित हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अनुसार, ‘निष्ठा का स्तर कम से कम अपने पिछले तीन प्रधान न्यायाधीशों के समान बनाए रखना उनकी चुनौती होगी। न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए निष्ठा और ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण है।’

जेएनजी आन्दोलन के बाद न्याय कर्मियों और न्यायपालिका का मनोबल गिरा है। अब भी कई जल गए और अधकचा बसे हुए भवनों में अदालत चल रही है। ऐसे हालातों में जलाए गए दस्तावेजों को पुनः प्राप्त करके न्याय संचारित करना चुनौतीपूर्ण है।
न्याय प्रशासन में लंबे समय से कार्यरत और न्याय परिषद के सचिव रहे दाहाल कहते हैं कि न्यायाधीशों में एकरूपता की कमी है और न्यायग्राही मामले सूची के प्रकाशन के बाद आदेश के अनुमान लगाते हैं।
वे आगे कहते हैं, ‘मामलों में न्यायाधीशों का हमेशा एक दृष्टिकोण जरूरी नहीं, लेकिन कम से कम एकीकृत मानक बरकरार रहना चाहिए।’
पिछली नियुक्तियों पर राजनीतिक हिस्सेदारी के आरोप लगाने वाले दल अब सत्ता पक्ष में हैं और इनके प्रतिनिधि न्याय परिषद के वरिष्ठ सदस्य भी हैं। नवनियुक्त प्रधान न्यायाधीश को वरिष्ठतम न्यायाधीशों का विश्वास जीतकर योग्य व्यक्तियों का चयन करना होगा।
दाहाल कहते हैं, ‘अब प्रधान न्यायाधीश को सत्तारूढ़ दल या अन्य राजनीतिक रुचि व दांव-पेंच से ऊपर उठकर क्षमता के आधार पर योग्य व्यक्ति चुनना होगा। सक्षम न्याय कर्मी का चयन न कर पाने से न्यायपालिका सुधार मुश्किल होगा।’