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डीडीसीबाट ५० करोड नपाएका किसान ‘चिज…’ भन्दै हाँस्ने कि रुने ?

डीडीसी से ५० करोड़ नपाए किसान: ‘चीज़…’ कहकर हँसें या रोएं?

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने डीडीसी का चीज़ खाते हुए तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर कर सरकारी उत्पाद का प्रचार किया है। हालांकि, डीडीसी गुणवत्ता में समस्याओं से जूझ रहा है, किसानों को भुगतान में देरी हो रही है और यह आर्थिक घाटे में है, जिससे संस्था की विश्वसनीयता कमजोर हुई है। डीडीसी के महाप्रबंधक डॉ. शरण पांडे ने सुधार की योजनाएं लागू करने और गुणवत्ता में शून्य सहिष्णुता नीति के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। ६ जेठ, काठमाडौं।

देश के कार्यकारी प्रमुख द्वारा अपने हाथ में किसी उत्पाद को लेकर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करना स्वयं में बड़ी प्रभावशाली विज्ञापन रणनीति है। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री बालेन्द्र (बालेन) शाह ने दुग्ध विकास संस्था (डीडीसी) के चीज़ खाते हुए तस्वीर पोस्ट की थी और सोशल मीडिया पर लिखा – ‘से चीज़, डीडीसी का चीज़…डीडीसी नेपाल सरकार का है, ब्रो-सिस।’ प्रधानमंत्री के इस ‘फ्री ब्रांडिंग’ के बाद पूर्ण सरकारी स्वामित्व वाली डीडीसी अचानक चर्चा में आ गई। इससे पूर्व सरकारी स्वामित्व वाली उदयपुर सीमेंट का प्रचार कर चुके शाह ने अब डीडीसी को चयनित किया, जिसके कारण उन्होंने सरकारी उद्योगों के प्रति अपनी रुचि को कई लोग सकारात्मक रूप में लेकर सोशल मीडिया पर प्रशंसा कर रहे हैं।

लेकिन राजनीतिक इतिहास देखें तो नेपाल में मंत्री और प्रधानमंत्री जब अपने देश की सरकारी कंपनियों या संस्थानों का प्रचार करने की कोशिश करते थे, तब ताली की जगह कड़ी आलोचना होती थी। पहले कभी किसी मंत्री या प्रधानमंत्री द्वारा नेपाल वायुसेवा निगम (नेपाल एयरलाइंस), उदयपुर सीमेंट, हेटौंडा कपड़ा उद्योग या गोरखकाली रबर उद्योग जैसी सरकारी कंपनियों को बढ़ावा देने का प्रयास होने पर सोशल मीडिया और जनमानस में उनकी कड़ी आलोचना होती थी। इसका मुख्य कारण था विश्वास का संकट। आम जनता की समझ में ये सरकारी उद्योगों के ढ़हने की मुख्य वजह वे पारंपरिक दल और नेता होते थे।

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