
आठ वर्षों के बाद मधेश्य-केंद्रित दलों का मधेश में सत्ता से बाहर होना
समाचार सारांश
- मधेश में आठ वर्षों से सत्ता में रहे मधेश्य केंद्रित दल पहली बार विपक्ष में चले गए हैं।
- मधेश प्रदेश में जसपा, जनमत और लोसपा सरकार बनाने में असफल रहने के बाद कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन ने सत्ता संभाली है।
- राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मधेश्य केंद्रित दलों ने सत्ता के स्वार्थ में फंसे रहकर जनता से समर्थन खो दिया है।
१० जेठ, जनकपुरधाम। मधेश में आठ वर्षों से सत्ता में रहे मधेश्य केंद्रित दल पहली बार विपक्षी स्थिति में आ गए हैं। कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार ने जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) को हटाने के बाद मधेश की सत्ता पहली बार मधेश्य केंद्रित दलों के बिना हो गई है।
बृहस्पतिवार को मधेश के मुख्यमंत्री कृष्णप्रसाद यादव ने जसपा नेपाल के भौतिक पूर्वाधार मंत्री राजकुमार गुप्ता, श्रम व यातायात मंत्री मनिष सुमन तथा शिक्षा व संस्कृति मंत्री रानीकुमारी तिवारी को बर्खास्त कर दिया। कुछ समय का इस्तीफे का अवसर देने के बाद उन्होंने इन मंत्रियों को हटाकर नेकपा एमाले को सरकार में शामिल किया।
वैशाख २१ को जनमत पार्टी ने मधेश सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था, पर जनमत के अर्थ मंत्री महेशप्रसाद यादव और खेल एवं समाज कल्याण मंत्री वसंत कुशवाहा ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर इस्तीफा दिया। इसके साथ ही पहली बार मधेश्य केंद्रित दलों का मधेश में सत्ता से बाहर होना हुआ।
२०७२ साल असोज ३ को संविधान जारी होने के बाद हुए पहले चुनाव में २०७४ में सात प्रदेशों में मधेश में संघीय समाजवादी फोरम के लालबाबु राउत नेतृत्व वाली सरकार बनी थी। शुरुआत में फोरम और राष्ट्रिय जनता पार्टी नेपाल ने संयुक्त रूप से आवश्यक ५४ सीटों में ५५ सीटें जीती थीं। बाद में इन दोनों दलों के बीच एकता और विभाजन के बावजूद कांग्रेस, तत्कालीन माओवादी केन्द्र समेत अन्य दल सरकार में शामिल रहे लेकिन लालबाबु राउत की सरकार गिर नहीं पाई।
महन्थ ठाकुर नेतृत्व वाली लोसपा दो साल बाद सरकार से बाहर हो गई थी। इसी प्रभाव के कारण प्रदेश संख्या २ का नाम ‘मधेश प्रदेश’ रखा गया था।
२०७९ मंसिर में हुए दूसरे प्रदेश चुनाव में भी मधेश्य केंद्रित दलों को बहुमत नहीं मिला। १०७ सदस्यीय मधेश प्रदेश सभा में जसपा नेपाल ने १९, जनमत ने १३ और लोसपा ने ९ सीटें जीती। ये तीनों मिलकर भी सरकार बनाने में असफल रहे। जसपा और जनमत ने थ्रेसहोल्ड पार किया लेकिन लोसपा राष्ट्रीय दल नहीं बन पाया। हालांकि, जसपा ने मधेश में दूसरे कार्यकाल का प्रारंभिक सरकार संभाला।
२०७९ पौष २३ को नेकपा एमाले, जनमत, माओवादी केन्द्र, लोसपा, एकीकृत समाजवादी सहित दलों के समर्थन से जसपा संसदीय दल के नेता सरोजकुमार यादव मुख्यमंत्री बने। केन्द्रीय राजनीतिक समीकरण मधेश को अलग नहीं रख सके। माओवादी केन्द्र ने ३० वैशाख को सरकार छोड़कर समर्थन वापस ले लिया। पाँचवें बार २०८१ जेठ २३ को सरोजकुमार यादव को सदन में विश्वास मत हारना पड़ा, जिसमें पक्ष में ५० और विपक्ष में ५३ वोट पड़े। १७ महीने बाद उनकी सरकार गिर गई।
इसके बाद मधेश केंद्रित दल ने २५ जेठ को फिर से सरकार का नेतृत्व किया। जनमत पार्टी के अध्यक्ष डा. सीके राउत के प्रभुत्व में दल के नेताओं को हटाकर सतीशकुमार सिंह मुख्यमंत्री बने, जिन्हें एमाले, माओवादी केन्द्र, एकीकृत समाजवादी, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी और संघीय समाजवादी पार्टी का समर्थन प्राप्त था। लोसपा सरकार में था लेकिन जसपा विपक्ष में था। बाद में कांग्रेस भी सरकार में शामिल हुआ।
‘जेनजी’ आंदोलन के दौरान २४ भदौ को डा. सीके राउत के निर्देश पर सामाजिक मीडिया से मुख्यमंत्री सिंह ने इस्तीफा देने की घोषणा की, लेकिन माहौल सामान्य होते ही उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। जनमत पार्टी ने समर्थन वापस लेने के बाद असोज २८ को विश्वास मत हारने के डर से सदन में इस्तीफा घोषित किया। उनका कार्यकाल लगभग १६ महीने रहा।
इसके बाद असोज २९ को मधेश केंद्रित दल लोसपा के सांसद जितेन्द्र सोनल जसपा सहित छह दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री नियुक्त हुए। उन्हें जसपा, जनमत, माओवादी केन्द्र, लोसपा और नेकपा एकीकृत समाजवादी का समर्थन मिला।
उनकी नियुक्ति के दिन ही जनमत पार्टी में विभाजन दिखा। प्रदेश सांसद पूर्व मंत्री सतीश सिंह और त्रिभुवन साह ने जनमत छोड़ी और नए दर्ज ‘जनस्वराज पार्टी’ में शामिल हुए, लेकिन बाद में इस दल को वैधता नहीं मिली।
विभाजित सिंह और साह कात्तिक २२ को सोनल के विश्वास मत के दिन अनुपस्थित रहे। माओवादी केन्द्र के प्रदेश सांसद रहबर अन्सारी के विद्रोह के बाद विश्वास मत गंवाने की स्थिति आई और सोनल ने इस्तीफा दे दिया। इससे मधेश में सत्ता नेतृत्व का मधेश्य केंद्रित दलों का दीर्घकालीन प्रवाह खत्म हुआ।

संवैधानिक अनुच्छेद १६८ के उपखंड (३) के अनुसार बड़ी पार्टी के रूप में एमाले संसदीय दल के नेता सरोज कुमार यादव को कात्तिक २३ की रात मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। होटल में शपथ ग्रहण विवादित रही, जिसमें दो-दो सीट वाली राप्रपा नेपाल और संघीय समाजवादी पार्टी ने भी सरकार में भाग लिया। यह सरकार २१ दिनों में ही गिर गई।
इसके बाद १९ मंसिर को कांग्रेस के कृष्णप्रसाद यादव मधेश्य केंद्रित दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बने, पर अब सभी मधेश्य केंद्रित दल विपक्ष में हैं। मधेश में यह स्थिति पहली बार बनी है।
जसपा नेता मनिष सुमन कहते हैं, ‘यह एक अप्राकृतिक गठबंधन है। हम विपक्ष में हैं और अब गुण-दोष के आधार पर सरकार को समर्थन या विरोध करेंगे।’
मगर मधेश्य केंद्रित दल किसी न किसी रूप में केन्द्रीय सत्ता में थे। भदौ २३ को हुए ‘जेनजी’ विरोध तक महन्थ ठाकुर नेतृत्व वाली लोसपा तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार का हिस्सा थी।
लेकिन माघ २१ को हुए प्रतिनिधि सभा चुनाव में थ्रेसहोल्ड पार न करने के कारण जसपा और जनमत राष्ट्रीय दल नहीं बन सके। मधेश्य केंद्रित दल प्रतिनिधि सभा में कमजोर हो गए, मगर मधेश प्रदेश में उनकी उपस्थिति सत्ता समीकरण में असरदार रही। अब कांग्रेस, एमाले और माओवादी केन्द्र के गठबंधन के कारण मधेश्य केंद्रित दल किनारे हो गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. भोगेन्द्र झा का कहना है, ‘मधेश प्रदेश विधानसभा के दूसरे कार्यकाल में अस्थिरता की मुख्य वजह जनमत पार्टी है। जनता ने जनमत से बड़ी उम्मीदें लगाईं थीं लेकिन सरकार मजबूत नहीं हो पाई। डॉ. सीके राउत के पास कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं है।’
सत्ता के स्वार्थ के कारण किनारे हुए मधेश्य केंद्रित दल
एजेंडा से ज्यादा सत्ता के स्वार्थ में फंसने के कारण मधेश्य केंद्रित दलों की यह स्थिति बनी है। वर्षों तक मधेश सरकार चलाने के बाद भी जनता की अपेक्षा के अनुसार काम नहीं कर पाए।
बंटवारा-प्रधान बजट बनाना, उपभोक्ता समितियों से काम कराना, योजनाओं के पत्रों का बिक्री-वितरण और कर्मचारी ट्रांसफर में मनमानी जैसी बुराइयों की वजह से मधेश सरकार की बदनामी हुई। खराब शासन और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले ये प्रवृत्तियां मधेश्य केंद्रित दलों से जुड़ी हुई हैं।
एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस और एमाले से अलग पहचान बनाने में असफलता ही मधेश्य केंद्रित दलों की वर्तमान स्थिति की मुख्य वजह है।
‘मधेश्य केंद्रित दल सत्ता में रहते हुए केवल अपने करीबी और स्वयं को फायदेमंद तरीके से काम करते रहे। आम जनता के हित में कोई खास कार्रवाई नहीं हुई। इसलिए लोगों की सहानुभूति घटती गई। ये दल कांग्रेस और एमाले से अलग तरह से पेश नहीं होते,’ उन्होंने कहा।
मधेश केंद्रित दलों के सत्ता लालच और स्वार्थी स्वभाव के कारण ही यह स्थिति आई है, ऐसा राजनैतिक विश्लेषक डॉ. भोगेन्द्र झा का मानना है। ‘मधेश मुद्दा खत्म नहीं हुआ है, लेकिन सत्ता की चाहत के कारण मधेश्य दलों की स्थिति खराब हुई। संघीयता और आचरण अनुशासन भी मधेशक दलों में कमी थी,’ वे कहते हैं।
मधेश्य केंद्रित दल विपक्ष में होकर जिम्मेदार बने तो भविष्य में अवसर मिल सकता है, पर सत्ता की चाह पूरी करने के लिए कुछ भी करने से पीछे नहीं हटने की वजह से उससे ज्यादा आशा करना मुश्किल है।