
निजी अस्पतालों में खर्च बढ़ने से स्वास्थ्य बीमा सेवाओं में कटौती
समाचार सारांश
सम्पादकीय समीक्षा गरिएको ।
- स्वास्थ्य बीमा बोर्ड ने वित्तीय समस्याओं के कारण देश के ३६ निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में आकस्मिक सेवाओं को छोड़कर अन्य सेवाओं को बंद किया है।
- बोर्ड की कार्यकारी निदेशक शकुन्तला प्रजापति ने बताया कि अत्यधिक आर्थिक दबाव के कारण यह निर्णय लेना पड़ा।
- वित्तीय संकट से निपटने के लिए बोर्ड भुगतान प्रणाली को बदल कर ‘डीआरजी’ पैकेज प्रणाली लागू करने की तैयारी में है।
१३ जेठ, काठमांडू । स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम की वित्तीय मुश्किलों के कारण बीमा बोर्ड ने निजी अस्पतालों में दी जाने वाली सेवाओं में कटौती की है।
बोर्ड ने वित्तीय संकट को ध्यान में रखते हुए अगले आदेश तक आकस्मिक सेवाओं को छोड़कर निजी स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा अन्य सेवाएं बंद रखने की घोषणा की है।
११ जेठ को आयोजित बोर्ड की बैठक में देश के ३६ निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में ओपीडी, परीक्षण, शल्य चिकित्सा और दवाइयों सहित कई सेवाएं अस्थायी तौर पर बंद करने का निर्णय लिया गया।
स्वास्थ्य बीमा बोर्ड की कार्यकारी निदेशक शकुन्तला प्रजापति ने कहा कि बोर्ड पर अत्यधिक आर्थिक दबाव बढ़ने के कारण उन्हें यह कड़वा निर्णय लेना पड़ा।
बोर्ड के मुताबिक वैशाख तक दावी की गई रकम १८ अरब नेपाली रुपए हो गई है। मंसिर तक की दावी राशि की समीक्षा भी हो चुकी है, जिसमें देश भर के सेवा प्रदाताओं को केवल ८ अरब रुपए ही भुगतान किया गया है।
‘आर्थिक दायित्व बहुत बढ़ गया है। यदि सरकार ने वित्तीय सहायता दी होती तो सेवाएं रोकनी नहीं पड़तीं,’ प्रजापति ने कहा, ‘यह अस्थायी निर्णय है। वित्तीय स्थिति सुधरने पर सेवाएं फिर शुरू की जाएंगी।’
बोर्ड के अनुसार प्रति माह औसतन २ से २.५ अरब रुपए का क्लेम आता है। लेकिन, सरकार की वित्तीय सहायता तब तक नहीं आने तक सेवा की निरंतरता संभव नहीं है, ऐसा बोर्ड के अधिकारियों ने माना है।

कार्यक्रम को निरंतर चलाने के लिए प्रति वर्ष २५-२६ अरब रुपए आवश्यक हैं, जबकि आमदनी और खर्च में काफी अंतर है। बीमितों से जुटाया गया वार्षिक प्रीमियम लगभग ४ अरब रुपए है। सरकार से मिलने वाला वार्षिक १० अरब रुपए का अनुदान भी कुल खर्च का आधा नहीं पहुंच पाता।
प्रजापति के अनुसार निजी अस्पतालों को सेवा प्रदान करने पर भुगतान की जिम्मेदारी बोर्ड पर है, लेकिन सरकार से धन की उपलब्धता अनिश्चित होने के कारण खर्च घटाने का फैसला किया गया है।
निजी अस्पतालों में सेवा ठप होने से सरकारी अस्पतालों पर रोगियों का दबाव बढ़ने की चिंता जताई गई है। वर्तमान में भी सरकारी अस्पतालों में लंबी लाइनों, सीमित कर्मचारियों और उपकरणों की कमी की समस्या मौजूद है। बोर्ड ने दावा किया है कि नागरिक पूरी तरह से सेवा से वंचित नहीं होंगे। ‘आकस्मिक सेवाएं लगातार चलेंगी। नियमित सेवाएं सरकारी अस्पतालों से ली जा सकती हैं,’ प्रजापति ने कहा।
बीमा कोष में सदस्य संख्या में गिरावट, अनुदान की देरी और निजी अस्पतालों से आने वाले अत्यधिक क्लेम ने बोर्ड पर भारी वित्तीय दबाव डाला है। इस वित्तीय संकट के कारण ओपीडी सेवाओं को सीमित करना और निजी अस्पतालों में सेवाएं बंद करना इस कार्यक्रम के संकट में पड़ने का संकेत है।
३६ निजी अस्पताल बनाम ४०० सरकारी संस्थाएं
बोर्ड के एक अधिकारी के अनुसार यह निर्णय अत्यधिक वित्तीय भार नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य कदम है। वर्तमान में प्रतिदिन ८ से १० करोड़ रुपए का अतिरिक्त दायित्व हो रहा है।
स्वास्थ्य बीमा बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक निजी अस्पतालों की संख्या ३६ है, लेकिन इनके द्वारा भुगतान के दावों की राशि ४०० से अधिक सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं के बराबर है। मतलब संख्या कम होने के बावजूद खर्च लगभग बराबर है।
‘कुल दावों में करीब आधा हिस्सा निजी अस्पतालों से आता है,’ अधिकारी कहते हैं, ‘इसलिए सबसे ज्यादा खर्च बढ़ाने वाली ओपीडी सेवा को बंद करने की रणनीति अपनाई गई है।’
स्वास्थ्य बीमा प्रणाली के शुरूआत से ही निजी अस्पतालों पर अनावश्यक परीक्षण, अधिक दवाइयों और अतिरिक्त सेवाओं के जरिए अधिक सुविधा लेने के आरोप लगते रहे हैं।
बोर्ड के पूर्व निदेशक रघुराज काफ्ले ने बताया कि निजी अस्पतालों से होने वाले दावे सरकारी अस्पतालों की तुलना में दो से ज्यादा हैं।
उनके अनुसार यह क्लेम मरीजों के अधिक आने से नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों की लचीली जांच प्रकिया और मरीजों की मांग के अनुसार ज्यादा परीक्षण कराने से बढ़ा है।
‘सरकारी अस्पताल में एक रुपये का इलाज निजी अस्पताल में तीन रुपये होगा, यह हमने देखा है,’ काफ्ले कहते हैं।
सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक अनावश्यक परीक्षण करने से डरते हैं और मरीजों के प्रश्न करने पर हिचकते हैं, जबकि निजी अस्पताल मरीजों की मांग पर ज्यादा परीक्षण कर देते हैं।

काफ्ले कहते हैं, ‘निजी अस्पतालों में मरीज और अस्पताल दोनों के लिए ज्यादा लचीलापन होता है, जिससे क्लेम में वृद्धि हो सकती है।’
बोर्ड के अधिकारियों ने भी निजी अस्पतालों द्वारा अनावश्यक परीक्षण और दवाइयों के अतिरिक्त उपयोग को स्वीकार किया है। ‘नकली मरीज और नकली बिल की धरपकड़ मुश्किल है पर जरूरत से ज्यादा परीक्षण और दवाइयां दी जाती हैं,’ उन्होंने बताया।
इसी वजह से निजी अस्पतालों पर निगरानी बढ़ाने की चर्चा लम्बे समय से चल रही थी। नया निर्णय निजी अस्पतालों को धीरे-धीरे हटाकर सरकारी संस्थानों को मजबूत करने पर केंद्रित है।
बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व स्वास्थ्य सचिव डॉ. सेनेन्द्रराज उप्रेती इस कदम को तात्कालिक दबाव प्रबंधन प्रयास कहते हैं। वे निजी अस्पतालों को पूरी तरह बंद न किए बिना बीमा प्रणाली की खामियां सुधारने पर जोर देते हैं।
उप्रेती के अनुसार निजी अस्पतालों को हटाने का फैसला कुछ जगहों पर प्रभाव कम कर सकता है, लेकिन कई जिलों में बीमितों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।
‘नेपालगंज, कोहलपुर जैसे स्थानों पर मेडिकल कॉलेज दूर-दराज से मरीज पाते हैं। निजी अस्पताल हटने से सेवा की पहुंच में समस्या होगी,’ डॉ. उप्रेती कहते हैं।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य बीमा का मूल उद्देश्य सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में समान दर पर सेवा उपलब्ध कराना था।
‘बीमा द्वारा सरकारी और निजी अस्पतालों को समान दर पर भुगतान किया जाता था, जिससे मरीज जल्दी और सुविधाजनक सेवा प्राप्त करते थे और वे संतुष्ट भी रहते थे,’ उन्होंने कहा।
फिर भी, वित्तीय दबाव बढ़ना ही मौजूदा संकट का मुख्य कारण है और ‘दायित्व बढ़ने पर सेवा कम करना ही समाधान नहीं’ है, उन्होंने बताया।
वे स्वीकार करते हैं कि निजी अस्पतालों में ‘फाल्स क्लेम’ और ‘ओवर क्लेम’ की समस्याएँ अभी भी मौजूद हैं, कभी-कभी बिना परीक्षण के भी दावे किए जाते हैं और विभिन्न प्रकार के फर्जी बिल पास होते हैं।
‘यह समस्या केवल नेपाल की नहीं, बल्कि दुनिया के बीमा प्रणालियों में देखी जाती है। लेकिन नियंत्रण की जिम्मेदारी बीमा प्रणाली की ही होती है। निगरानी, डिजिटल ट्रैकिंग और वास्तविक समय में क्लेम प्रक्रिया को मजबूत बनाना होगाएक,’ डॉ. उप्रेती ने कहा।
‘नागरिकों के साथ धोखाधड़ी’
बोर्ड ने १ फाल्गुन से स्वास्थ्य बीमा के तहत ओपीडी सेवाओं को कम करके वार्षिक सुविधा सीमा २५ हजार रुपए कर दी है। बोर्ड का मानना है कि यह ओपीडी खर्च को नियंत्रण में लाकर बीमा कार्यक्रम को स्थायी बनाने में मदद करेगा।
अब बीमितों को ओपीडी में वार्षिक २५ हजार रुपए तक की सेवाएं मिलेंगी, इसके बाद सेवाएं अस्पताल में भर्ती (आईपीडी) और आकस्मिक (इमरजेंसी) के जरिए प्रदान की जाएंगी।
बोर्ड के कुल खर्च में सबसे ज्यादा हिस्सा ओपीडी सेवा का है। भुगतान में लगभग ७१ प्रतिशत ओपीडी, १९ प्रतिशत आईपीडी और १० प्रतिशत आकस्मिक सेवाओं पर खर्च होता है।
हालांकि, बोर्ड के पूर्व अधिकारी इस निर्णय को बीमितों के साथ अन्याय बताते हैं। पूर्व समझौते के अनुसार वार्षिक एक लाख रुपए तक की सुविधा मिलनी थी, लेकिन खर्च की स्पष्ट सीमा नहीं निर्धारित की गई थी।

डा. उप्रेती कहते हैं, ‘बीमा शुरू में ऐसा नियम नहीं था, बिच में नियम बदला गया और वर्तमान बीमितों पर लागू करना अन्याय है। सुविधा देने के नाम पर बीमा कंपनी पैसा लेती है लेकिन आवश्यक सेवाएं नहीं देती, यह किस न्यायसंगत है?’
वे बताते हैं कि यह निर्णय विशेषत: दीर्घकालीन रोगियों और नियमित दवाई लेने वाले मरीजों को प्रभावित करेगा।
स्वास्थ्य बीमा का मुख्य उद्देश्य मरीज को खर्च से बचाना है। बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि कई बीमित ओपीडी सेवा का उपयोग करते हैं, लेकिन ओपीडी पर सीमा लगाने से कई इलाज से वंचित होंगे।
विशेषज्ञों ने इस निर्णय को नागरिकों के साथ ठगी करार दिया है।
अब ‘डीआरजी मॉडल’ लागू करने की तैयारी
वित्तीय संकट बढ़ने के कारण बोर्ड भुगतान प्रणाली में बदलाव करने जा रहा है। वर्तमान में परीक्षण और सेवाओं के अनुसार अलग-अलग भुगतान होता है, जिसे ‘फ्री फॉर सर्विस’ मॉडल कहा जाता है।
अब बोर्ड ‘डीआरजी’ यानी पैकेज प्रणाली लागू करने का लक्ष्य रखता है, जिसमें रोग के अनुसार एक निश्चित राशि तय होगी। उदाहरण के तौर पर निमोनिया के इलाज के लिए अस्पताल को एक निर्धारित पैकेज मिलेगा।
बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि नए सिस्टम को लागू करने में समय लगेगा, इसलिए संक्रमण काल के दौरान निजी अस्पतालों में ओपीडी को सीमित किया गया है।