
सूर्यदर्शन सहकारी में समझौते के लिए बढ़े आवेदन, पीड़ितों ने भोटे छूट के बाद जीबी राई से की मुलाकात
समाचार सारांश
- पोखरा के सूर्यदर्शन सहकारी ठगी मामले के आरोपी पूर्व संचालक शिवबहादुर गुरुङ को कास्की जिला अदालत ने 5 लाख रुपए के जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
- 17 करोड़ 8 लाख रुपए के बांड की मांग की गई है, गुरुङ ने सहकारी के कोष में राशि जमा करने का वचन दिया है।
- सम्पत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध के मामले वापस लिए जाने के बाद इस मामले के अन्य अभियुक्तों से भी समझौते के लिए आवेदन आने लगे हैं।
२५ जेठ, पोखरा। पोखरा के सूर्यदर्शन सहकारी ठगी मामले में पुर्पक्ष विहीन जेल में बंद पूर्व संचालक शिवबहादुर गुरुङ, जिन्हें ‘महेन्द्र भोटे’ के नाम से भी जाना जाता है, ने बांड अदा करने की बात कबूल की है, जिसके बाद कास्की जिला अदालत ने उन्हें 5 लाख रुपए जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
पूर्व अध्यक्ष गितेन्द्रबाबु (जीबी) राई के समूह के साथ मिलकर सहकारी का धन अपप्रयोग करने के आरोप में 17 करोड़ 8 लाख रुपए के बांड की मांग की गई है। गुरुङ ने 5 लाख रुपए जमानत राशि जमा कर बाहर रह कर अपना न्यायिक लड़ाई लड़ने की अनुमति प्राप्त की है।
सूर्यदर्शन सहकारी के धन की अनियमितता के आरोप में गुरुङ पर संगठित अपराध का मामला भी चल रहा था। लेकिन, महान्यायाधिवक्ता के फैसले के अनुसार सम्पत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध के मामलों को वापस ले कर केवल सहकारी ठगी का मामला ही अदालत में निपटाने पर सहमति मिलने के बाद उन्हें जेल से रिहा किया गया।
कास्की जिला अदालत के न्यायाधीश हिमलाल बेलबासे की अदालत ने २२ जेठ, शुक्रवार को जमानत मंजूर की। हालांकि, जमानत और बांड की प्रक्रिया अभी पुलिस द्वारा जारी है।
२०८० असोज १० को सरकारी वकील कार्यालय ने पूर्व अध्यक्ष जीबी राई, अध्यक्ष ज्ञानबहादुर बम्जन, उपाध्यक्ष कैलाश दर्लामी, कोषाध्यक्ष कुमार रम्तेल, शिवबहादुर समेत कुल १९ व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
इसी आधार पर गुरुङ के खिलाफ भदौ २४ को गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद फरार महेन्द्र ने २०८० पुस १७ को कानूनी सलाहकार के साथ कास्की जिला अदालत में आत्मसमर्पण किया था।
अगले दिन न्यायाधीश वसन्तजंग थापा की अदालत ने जमानत के लिए उनकी याचिका नकारकर उन्हें पुर्पक्ष के लिए बंदी बनाने का आदेश दिया था।
शुरुआत में १९ अभियुक्तों के खिलाफ १ अरब ११ करोड़ रुपए के बांड की मांग की गई थी, लेकिन वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार गुरुङ ने लगभग ८ करोड़ रुपए की हेराफेरी की थी। उस समय १ हजार ३८ लोगों की शिकायत के आधार पर यह बांड मांगा गया था।
२०८० माघ २४ को काठमाण्डू के नेचर हर्ब्स कार्यालय पर छापेमारी के दौरान पुलिस ने जीबी राई सहित सहकारी से जुड़े महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य बरामद किए थे। थाने के आग्रह पर काठमाण्डू पुलिस ने पूर्व डीआईजी छविलाल जोशी के घर पर छापा मार कर सहकारी का सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक रेकॉर्ड भी जब्त किया था।
अधिक सबूत मिलने के बाद १८ व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ १२१ लोगों ने फिर से पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।
जांच के दौरान जीबी, महेन्द्र सहित १९ व्यक्तियों के खिलाफ २०८१ पुस ५ को जिला अदालत कास्की में आरोपपत्र दायर किया गया, जबकि रास्वपा अध्यक्ष और पूर्व गृह मंत्री रवि लामिछाने सहित ४४ लोगों के खिलाफ ७ पुस को पूरक आरोपपत्र दाखिल हुआ।
इन अतिरिक्त अभियोगों में सभी आरोपियों से कुल १ अरब ५१ करोड़ रुपए का बांड माँगा गया था, जिसमें पूर्व संचालक शिवबहादुर के खिलाफ केवल सहकारी ठगी और संगठित अपराध में १७ करोड़ ८ लाख रुपए की मांग थी।
अन्य अभियुक्त भवीश्वर अर्याल समेत अदालत में उपस्थित महेन्द्र ने पुर्पक्ष के लिए थाने के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय भी गए। उन्होंने जमीन-जायदाद की रिहाई तथा सामान्य जमानत की मांग की थी, लेकिन आदेश नहीं मिला।
महान्यायाधिवक्ता कार्यालय की ओर से सम्पत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध मामले वापस लेने के बाद सहकारी ठगी के मामले को आगे बढ़ाने का निर्णय आया। पीड़ित और महेन्द्र ने भी संयुक्त रूप से सरकारी वकील कार्यालय में आवेदन दिया।
जिला सरकारी वकील कमला काफ्ले ने कहा, ‘साधारण या जमानत लेकर थाने से रिहा होकर मामले की लड़ाई करने की अनुमति दी जाए, सम्पत्ति रोकड़ी हटा दी जाए, समझौता हो’ ऐसी ३-४ याचिकाएं दी गईं, जिसके आधार पर अदालत में आवेदन दायर किया गया।
महेन्द्र ने सहकारी के कोष में बांड राशि जमा करने और इसकी गारंटी देने की सहमति दी है, जिसका उन्होंने अदालत में भी पक्ष रखा। पीड़ितों के आवेदन के आधार पर मुकदमा अभियोजन किया गया है ताकि धन वापसी सुनिश्चित हो सके।
वे ढाई वर्ष तक पुर्पक्ष हेतु जेल में रहे। उन्होंने मुलुकी फौजदारी कार्यविधि संहिता, २०७४ की धारा ७७ के तहत थाने की रिहाई हेतु आवेदन दिया।
इस प्रावधान के अनुसार जमानती बंदी की यदि मुकदमे की सुनवाई एक वर्ष के अंदर नहीं होती, तो उसे जमानत पर रिहाई दी जा सकती है।
सरकारी वकील कार्यालय के मुताबिक सहकारी ऐन २०७४ की धारा १३१ के तहत भी मिलापत्र के लिए आवेदन दायर किया गया था।
इसके उपधारा १ के अनुसार दोषी ने पीड़ितों की मांग पर बांड, बचत, या शेयर राशि वापस करने पर सहमति दे दी हो, और दूनों पक्षों की मंजूरी से महान्यायाधिवक्ता या सरकारी वकील के समक्ष संयुक्त आवेदन दायर किया जा सके। इसके तहत महेन्द्र और पीड़ितों ने संयुक्त आवेदन दिया है, बताया सहकारी अध्यक्ष किरण श्रेष्ठ ने।
न्यायाधीश बेलबासे की अदालत ने सहकारी के खाते में बांड राशि जमा करने की सहमति के आधार पर महेन्द्र को जमानत पर मुक्त किया।
महेन्द्र पर गुंडागर्दी के बाद व्यापार और राजनीति में प्रवेश का आरोप है। उन पर जीबी समूह के साथ मिलकर पोखरा के कई स्थानों पर धन की अवैध निकासी का आरोप है। उन्होंने यहां के नाइट क्लब, रेस्टोरेंट, निर्माण कंपनी और रिसॉर्ट में निवेश किया, ऐसा भी आरोप है। वे एमाले के निकट युवा संघ के केन्द्रीय उपमहासचिव थे और २०७९ के स्थानीय चुनाव में मादी गाउँपालिका अध्यक्ष के प्रत्याशी भी थे।
सम्पत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध के मामलों के वापस लिए जाने से सहकारी ठगी के मामले में समझौते के आवेदन आने लगे हैं।
कास्की जिला सरकारी वकील कार्यालय के अनुसार संगठित अपराध और सम्पत्ति शुद्धिकरण के मामले वापस लेने से पीड़ितों और अभियुक्तों के बीच समझौते के लिए अधिक आवेदन हो रहे हैं।
सूर्यदर्शन सहकारी ठगी मामले में रास्वपा अध्यक्ष एवं पूर्व गृह मंत्री रवि लामिछाने, संचालक जीबी राई, पूर्व डीआईजी छविलाल जोशी, और अन्य 5 लोगों के खिलाफ सम्पत्ति शुद्धिकरण के मामले वापस लिए जाने के लिए ७ जेठ को कोर्ट ने मंजूरी दी थी।
कोर्ट ने स्वीकृत आवेदन में कहा था कि अभियुक्तों को बांड राशि के बराबर बैंक गारंटी या संपत्ति जमानत पेश कर बचतकर्ताओं की रकम की वापसी सुनिश्चित करनी होगी, उसके बाद ही समझौता किया जा सकता है।
सहकारी ठगी मामले के अभियुक्त जो जेल में हैं या फरार थे, वे बांड राशि जमा या गारंटी कर अदालत में उपस्थित होकर समझौताकर्ता बन सकते हैं और बाहर रहकर मुकदमा लड़ सकते हैं, जिससे समझौते के लिए आवेदन बढ़ रहे हैं, बताया जिला सरकारी वकील काफ्ले ने।
पीड़ित संघर्ष समिति के संयोजक एवं सूर्यदर्शन संचालक समिति के अध्यक्ष किरण श्रेष्ठ ने बताया कि वे समझौते के लिए लगातार आग्रह कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “सभी अभियुक्तों से अपील है कि वे आएं, बांड राशि जमा करें, और समझौता करें; हम आवश्यक सहयोग और सरकारी वकील कार्यालय एवं अदालत में भी मदद करेंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि ऋण न लौटाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।
उन्होंने जीबी राई को भी समझौते के लिए आने का आग्रह किया है। ज्ञानबहादुर समेत सभी फरार हुए और सहकारी बंद होने के बाद २०८१ मंसिर १८ को विशेष साधारण सभा में किरण श्रेष्ठ अध्यक्ष चुने गए।
सूर्यदर्शन सहकारी मामले में ८४ दिन हिरासत में रहने के बाद २५ पुस २०८१ को रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने ६५ लाख रुपए जमानत पर रिहा हुए थे।
उसी दिन ८८ लाख रुपए जमानत देकर छविलाल जोशी भी रिहा हुए। इसके बाद गण्डकी प्रदेश के पूर्व सांसद मीना गुरुङ, नेचर हब्स के रामबहादुर खनाल, आरती गुरुङ, कृष्णबहादुर गुरुङ, और लीला पछाईं भी जमानत पर मुक्त हुए। पूर्व सहसचिव अनुज नकर्मी, नेत्रपाणि बास्तोला और विज्ञान राई भी जमानत पर रिहा हो चुके हैं।
२०८२ भदौ ८ को पूर्व अध्यक्ष १० लाख रुपए की जमानत पर खुला और देवकुमार नेपाली २०८२ जेठ ८ को २० लाख रुपए जमानत पर रिहा हुए। सहकारी के मुख्य योजनाकार जीबी राई अभी फरार हैं।
सूर्यदर्शन सहकारी ठगी मामले में तत्कालीन उपाध्यक्ष कैलाश दर्लामी जन_generic आंदोलन के दौरान फरार हैं।
कोषाध्यक्ष कुमार रम्तेल, पूर्व संचालक भवीश्वर अर्याल और प्रमोद भट्टराई पुर्पक्ष के लिए जेल में हैं जबकि ६३ आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद कई फरार हैं।