फुटबॉल विश्व कप: दो अलग-अलग ट्रॉफी क्यों होती हैं?
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कई महान खिलाड़ी विश्व कप की ट्रॉफी को अपने हाथों में उठा चुके हैं। लेकिन ट्रॉफी के बारे में अक्सर चर्चा नहीं होती है या इसके दो अलग-अलग संस्करणों की बहुत कम जानकारी होती है।
विश्व कप की पुरानी ट्रॉफी को मौजूदा डिज़ाइन ने प्रतिस्थापित किए हुए 50 साल से अधिक हो चुके हैं।
फुटबॉल की सबसे प्रतिष्ठित ट्रॉफी में से एक मानी जाने वाली विश्व कप ट्रॉफी को दो अलग-अलग डिजाइन क्यों बनानी पड़ी?
मूल ‘ज्युल रीमे ट्रॉफी’
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फिफा ने विश्व कप का पहला आयोजन 1930 में किया था और पहली ट्रॉफी का उपयोग भी शुरू किया था। उस समय प्रतियोगिता ज्युल रीमे के नेतृत्व में थी जिनके सम्मान में इस ट्रॉफी का नाम रखा गया था।
रीमे फिफा के अध्यक्ष 1921 से 1954 तक सबसे लंबे समय तक रहे।
फ्रेंच मूर्तिकार अबेल लाफ्लूर ने डिज़ाइन की इस ट्रॉफी में ग्रीक मिथक की विजय की देवी नाइकी की आकृति है। नाइकी एक कप को उठाए हुए दिखाई देती हैं।
यह “स्टर्लिंग सिल्वर” यानी शुद्ध चांदी में हल्का ताम्र मिश्रण करके सोने की परत से सजाई गई थी और इसमें नीले रंग के बहुमूल्य पत्थर “लापिस लाजुली” लगाए गए थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फिफा के अधिकारी ओट्टोरिनो बारासी ने रोम में इस ट्रॉफी को नाज़ियों की पहुँच से बचाने के लिए अपने बिस्तर के नीचे जूते के बक्से में चुपा दिया था। वे इतालवी थे।
सन् 1966 में इंग्लैंड में विश्व कप शुरू होने से कुछ महीने पहले यह ट्रॉफी सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान चोरी हो गई थी।
उसके बाद पिकल्स नाम का कुत्ता दक्षिण लंदन के एक बगीचे में झाड़ियों के नीचे छिपाए गए ट्रॉफी को लेकर आया था जिसे एक अखबार में लपेटा गया था।
1970 में लगातार तीसरी बार विश्व कप जीतने के बाद ज्युल रीमे ट्रॉफी ब्राजील को स्थायी स्वामित्व में दे दी गई।
लेकिन वह ट्रॉफी 1983 में फिर चोरी हो गई। ब्राजील फुटबॉल एसोसिएशन के मुख्यालय से चोरी हुई ट्रॉफी कभी नहीं मिली और माना जाता है कि उसे पिघला दिया गया था। उस समय फिफा ने नई विश्व कप ट्रॉफी तैयार कर ली थी।
विश्व कप की आधुनिक ट्रॉफी
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विश्व कप की नई ट्रॉफी इटली के कलाकार सिल्वियो गाज़ानिगा द्वारा बनाई गई है। उन्होंने यूईएफए यूरोपा लीग ट्रॉफी भी डिज़ाइन की है।
फिफा की विश्व कप की यह नई ट्रॉफी 36 सेंटीमीटर ऊँची और 18 कैरेट सोने से बनी है।
इसमें दो मानवीय आकृतियाँ पृथ्वी को ऊपर उठाए हुए दिखती हैं। फिफा के अनुसार यह डिज़ाइन “फुटबॉल की वैश्विक एकता और भावना” को दर्शाता है।
1974 में पश्चिम जर्मनी ने विश्व कप जीतकर पहली बार इस नई ट्रॉफी को उठाया था।
पुरानी ट्रॉफी खो जाने के बाद फिफा ने यह निर्णय लिया कि किसी भी टीम को ट्रॉफी स्थायी रूप से नहीं दी जाएगी।
विश्व कप विजेता टीम केवल खेल खत्म होने पर विशेष समारोह में ट्रॉफी को छू सकती है, लेकिन बाद में उन्हें सोने की परत वाली ट्रॉफी की प्रतिकृति से संतोष करना होता है।
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