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क्या मजबूरी है या नियति?

कृष्ण उपाध्याय।

वर्तमान में नेपाल की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा युवा वर्ग का है। लेकिन इस देश की युवावस्था का मुख्य लक्ष्य कुछ ऐसा है — देश छोड़ना। देश से बाहर जाने की चाह रखने वाले युवाओं की संख्या प्रत्येक दिन बढ़ती जा रही है।

अब तक लगभग 60 लाख से अधिक नेपाली श्रम अनुमति लेकर विदेश रोजगार के लिए जा चुके हैं। पढ़ाई और विभिन्न कारणों से विदेश जाने वाले युवा भी इतने ही हैं।

मैनपावर एजेंसियों, शहरों की गलियों में खुले भाषा परीक्षा केंद्रों से लेकर हवाई अड्डों की कतारों तक युवाओं की भीड़ देखी जा सकती है।

पासपोर्ट लेकर बैठे युवाओं की भीड़ अब कोई असामान्य बात नहीं रह गई है।

चाय की दुकानों और गांव की चौथियों पर होने वाली चर्चाओं में भी विदेश जाने का विषय काफी सुना जाता है।

यह सब देखते हुए कई लोग पूछते हैं — क्या नेपाली युवा वास्तव में देश छोड़ना चाहते हैं, या फिर मजबूरी उन्हें इस ओर धकेल रही है? वर्तमान सच्चाई यही है कि युवाओं को अपने ही देश में संभावनाएं, सम्मान और भविष्य की अनुभूति नहीं हो पा रही है।

यह केवल युवाओं की बेचैनी या असंतोष का विषय नहीं है, बल्कि यह अपनी ही भूमि पर अपने भविष्य को न देख पाने का जद्दोजहद है। आज के खुले वैश्विक बाजार से जुड़ी 21वीं सदी की शुरुआत में युवा अपने जीवन के निर्माण के लिए भरोसेमंद आधार की तलाश में हैं।

कुछ वर्ष पहले तक नेपाली युवाओं के सपने अलग थे। उनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करना, सरकारी या प्रतिष्ठित नौकरी पाना तथा परिवार के साथ देश में ही जीवन बनाना था। लेकिन समय के साथ वे सपने बदल गए हैं। आज युवाओं की बातचीत रोजगार, कौशल या देशी अवसरों से अधिक भाषा परीक्षा के स्कोर, गंतव्य देश और उड़ान की तारीख पर केंद्रित है।

देश में ऐसी पीढ़ी उभर रही है जिसने अपना भविष्य देश के भीतर के बजाय बाहर अधिक स्पष्ट देखा है। सवाल यह नहीं है कि वे अपने देश से निराश क्यों हैं, बल्कि यह है कि वे अपनी ज़िंदगी का मूल्य, अवसर और सम्मान कहां खोज रहे हैं?

सार्वजनिक प्रशासन की जड़ता और सुशासन की कमी के कारण युवा राज्य की संस्थाओं पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

देश की मौजूदा शिक्षा नीति और रोजगार के बीच की बड़ी खाई इस संकट का मुख्य कारण है। दीक्षांत समारोह में उछाली जाने वाली टोपी की तरह ही युवाओं के सपनों को भी ऊँचा उड़ना चाहिए था, लेकिन हकीकत काफी अलग है। देश की शिक्षा प्रणाली ज्ञान और व्यावहारिक कौशल की बजाय केवल प्रमाणपत्रों का उत्पादन कर रही है। नीतिगत और संरचनात्मक इस कमी के चलते आज देश के प्रमुख विश्वविद्यालय विद्यार्थी अभाव में खाली हो रहे हैं।

कक्षा बंद होने की स्थिति आ गई है, पर वहीं दूसरी ओर भाषा परीक्षा केंद्रों और पासपोर्ट विभागों में युवा कतारबद्ध हैं। पिछले छह महीनों में ही लगभग चार लाख नेपाली फिर से श्रम अनुमति लेकर विदेशी रोजगार पर गए हैं, यह तथ्य विदेशी रोजगार विभाग में दर्ज है।

यह संख्या बाजार की मांग और विश्वविद्यालयों से निकलने वाली जनशक्ति के बीच गहरे असंतुलन को दर्शाती है। कई स्नातक रोजगार के लिए आवेदन करते हैं लेकिन उन्हें ‘अनुभव की कमी’ का हवाला देकर अस्वीकृति मिलती है। पर जो अवसर ही नहीं पाते, वे अनुभव कैसे हासिल करें? यह अनुत्तरित सवाल दर्शाता है कि समस्या युवाओं में नहीं बल्कि हमारी शिक्षा नीति और श्रम बाजार की पारंपरिक संरचना में है।

युवाओं के विदेशी पलायन को केवल आर्थिक उपार्जन के रूप में देखना अन्याय होगा। हवाईअड्डों पर दिखाई देने वाली लंबी कतारें राज्य के खिलाफ मौन लेकिन शक्तिशाली विद्रोह हैं। राज्य फिलहाल बढ़ते हुए रेमिटेंस के आंकड़ों पर खुश नजर आता है।

वर्तमान में नेपाल के कुल घरेलू उत्पादन का एक चौथाई से अधिक हिस्सा रेमिटेंस द्वारा पूरा होता है। चालू वित्तीय वर्ष में यह प्रवाह लगभग 40 प्रतिशत बढ़ा है। यह आंकड़ा भले ही मैक्रो-आर्थिक स्थिति को सतह पर स्थिर दिखाता हो, लेकिन देश के उत्पादनशील जनशक्ति के खाली होने की असली तस्वीर छुपा नहीं सकता।

युवा केवल ‘निर्यात योग्य वस्तु’ की तरह समझे जाते हैं और जब वे वापस आते हैं तब उन्हें परियाप्त नीतिगत सुरक्षा और निवेश के माहौल नहीं दिया जाता, यह राज्य की दोहरी नीति चिंता का विषय है।

रेमिटेंस ने परिवारों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक मदद जरूर दी है, पर प्रतिभा, ऊर्जा और रचनात्मकता के निरंतर बाहर जाने से देश दीर्घकालिक रूप से सामाजिक-आर्थिक दलदल में फंस सकता है।

बहुत से युवाओं के लिए विदेश यात्रा सिर्फ स्थानांतरण नहीं, बल्कि वे एक सुरक्षित जीवन, आत्मसम्मान और नए अवसरों की तरफ पहला कदम मानते हैं।

इस संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू है – मानसिक और सामाजिक थकान। सोशल मीडिया पर दिखने वाली रंगीन तस्वीरों और सफलताओं के पीछे असमंजस, अकेलापन और भावनात्मक खालीपन बढ़ रहा है। आज के युवा संबंध, विवाह, घर बसाना या दीर्घकालिक निर्णय लेने में भयभीत या विलंबित हैं।

देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट और नीतिगत प्राथमिकताओं में मानसिक स्वास्थ्य अभी भी सीमांत विषय बना हुआ है। न तो पर्याप्त सलाहकार हैं और न ही स्थानीय स्तर तक सेवा पहुंचती है। युवाओं को उपदेश नहीं, बल्कि सुनने वाला माहौल, समर्थ समाज और मानसिक सुरक्षा की जरूरत है। दुर्भाग्य से ‘युवा विकास और समृद्धि’ की बहस में यह पक्ष अभी तक शामिल नहीं हो पाया है।

हालांकि यह युवा बेरोजगार या पलायनवादी कह देना सही नहीं होगा। पिछले वर्षों में नेपाली युवाओं ने राजनीतिक, सामाजिक और वैकल्पिक नेतृत्व क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

देश की नेतृत्व में बालेन शाह का उदय और युवा संसद, सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक उनकी सक्रियता ये दोनों ही संकेत हैं कि युवा असंतोष को केवल पलायन में ना लेकर भागीदारी और परिवर्तन की मांग में बदला जा रहा है। यह साफ संदेश देता है— युवा समस्या नहीं हैं, वे समाधान और परिवर्तन के वाहक बनना चाहते हैं।

लेकिन जो युवा स्वदेश में कुछ करना चाहते हैं, उनके लिए वर्तमान प्रशासनिक संरचना और सरकारी कार्यशैली बाधा बनकर सामने है। कोई युवा जब खुद की जमीन पर उद्यम शुरू करने की कोशिश करता है तो दर्जा, कर और सीमा शुल्क के दर्जनों स्तर पार करने की जटिलता, विभिन्न संस्थाओं से अनेक अनुमतियाँ लेने की जरूरत और कानूनी मार्गदर्शन की कमी उसकी उत्साह को मद्धिम कर सकती है।

सार्वजनिक प्रशासन की जड़ता और सुशासन की कमी विकास संस्थाओं में युवाओं के विश्वास को कमजोर कर रही है। इस संदर्भ में राज्य की जिम्मेदारी और स्पष्ट होनी चाहिए। प्रशासनिक तंत्र को जन-केंद्रित एवं चुस्त बनाकर बाजार की मांग के अनुरूप शिक्षा सुधारें, स्वदेश में रोजगार सृजन करें, उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करें और मानसिक स्वास्थ्य को सार्वजनिक नीति का केंद्र बनाएं— यह आज की बहुत जरूरी आवश्यकता है। यही नया सामाजिक समझौता भविष्य की नींव होगा।

राज्य की समस्या केवल यह नहीं कि युवा विदेश जा रहे हैं, बल्कि यह है कि वे देश में अपने भविष्य को देखने का पर्यावरण और फिर लौटकर आने की संभावनाएं नहीं बना पा रहे हैं। अंतत: सवाल युवा का नहीं, उनके उत्तरदायित्व पूरा करने के बाद अब राज्य के सामने है। नेपाल आज ‘जनसांख्यिक लाभांश’ के ऐतिहासिक स्वर्ण युग में है। लेकिन इस उर्जावान जनशक्ति का देश के भीतर सदुपयोग न कर पाने से विकास का अभूतपूर्व अवसर गवां रहा है।

रेमिटेंस के ऊपर निर्भर करते हुए स्थिरता को स्वदेशी उत्पादन और रोजगार आधारित स्थायी अर्थव्यवस्था में नहीं बदला गया तो यह प्रवृत्ति रुकने वाली नहीं है। अगर समय रहते राज्य अपनी युवा पीढ़ी की आकांक्षा और परिवर्तन के साथ कदम नहीं मिला पाया, तो भविष्य का नेपाल वृद्धाश्रम बन सकता है।

देश केवल कुछ लाख युवाओं को ही नहीं, बल्कि अपनी संपूर्ण भविष्य और संभावनाओं का रास्ता भी खोने का जोखिम ले रहा है।

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