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श्रमिकों की शिकायतों को एक घंटे के भीतर कैसे निपटाएं? विशेषज्ञों के सामने चुनौती

लेख जानकारी
श्रम मामलों को देखभाल करने वाली एक संस्था ने नेपाल के अंदर श्रमिकों की शिकायत या आवेदन संबंधी प्रक्रियात्मक कार्यों को एक घंटे के भीतर निपटाने के लिए अपने अधीनस्थ कार्यालयों को निर्देश दिए हैं, अधिकारियों ने यह जानकारी दी। प्रतिक्रिया देने में हुई देरी को लेकर कई सेवाग्राहीयों ने युवा, श्रम तथा रोजगार मंत्री के समक्ष शिकायत की, जिसके बाद विभाग ने संबंधित कार्यालयों को परिपत्र भेजा है, ऐसा श्रम तथा व्यवसायजन्य सुरक्षा विभाग के महानिदेशक ने बताया। रोजगार संबंधी इस विभाग के अधीन फिलहाल देश भर में 11 श्रम तथा रोजगार कार्यालय संचालित हैं।

हालांकि, श्रमिकों की शिकायतों या आवेदनों पर समय रहते कार्रवाई करने के लिए संस्थागत क्षमता का विस्तार आवश्यक है, ऐसा श्रम मामलों के एक विशेषज्ञ ने बताया। परिपत्र में क्या कहा गया है? विभाग ने ये निर्देश तब जारी किए जब शिकायतों को समय पर निपटाने में देरी और सेवा प्राप्त करने वाले लोगों के साथ असभ्य व्यवहार जैसे मुद्दे सामने आए। उस परिपत्र के अनुसार, कार्यालय में श्रमिक या पीड़ित द्वारा दी गई शिकायत या आवेदन को कार्यालय प्रमुख और संबंधित कर्मचारियों को एक घंटे के अंदर स्पष्ट और उचित रूप से निपटाना आवश्यक है।

इस विषय में अधिक स्पष्टता देते हुए महानिदेशक चक्रपाणि पाण्डे ने कहा, “यदि कोई पीड़ित श्रमिक शिकायत लेकर आता है तो उसे एक घंटे के भीतर देखा जाना चाहिए, यदि संबंधित हो तो उसके आवेदन को दर्ज कर बाकी प्रक्रिया की जानकारी देनी चाहिए। नहीं तो इसे संबंधित विभाग को भेजना होगा।” उन्होंने बताया कि समस्या का समाधान एक घंटे में न भी हो, तब भी प्रक्रियात्मक कार्य उसी समय पूरा होना चाहिए। उन्होंने कहा, “यदि कोई आवेदन लेकर आता है तो किसी कर्मचारी को जवाब देना चाहिए, समाधान तुरंत न मिल सके तो भी शिकायत का सम्मान करना जरूरी है और आगे की प्रक्रिया समझानी होगी।”

परिपत्र में शिकायतकर्ता या गुनाहगार को किए जा रहे कार्यों की जानकारी समय पर देने और यदि मामला क्षेत्राधिकार से बाहर हो तो संबंधित विभाग को सूचित करने की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही, श्रमिक या पीड़ित की शिकायत पर समय पर प्रतिष्ठान से प्रतिक्रिया प्राप्त करने, श्रम कानून के अनुसार वार्ता करने, और यदि वार्ता विफल हो तो शीघ्र निर्णय लेने की व्यवस्था भी है। सीमित मानव संसाधनों के बावजूद इस विभाग और उसके अधीन कार्यालय श्रम शोषण समाप्त करने, न्यूनतम मजदूरी के क्रियान्वयन एवं निरीक्षण, और व्यवसायजन्य सुरक्षा व स्वास्थ्य संबंधित मामलों का संचालन कर रहे हैं।

महानिदेशक पाण्डे के अनुसार, उन्हें मिलने वाली शिकायतें हमेशा स्पष्ट और प्रभावी नहीं होतीं। बैंक तथा वित्तीय संस्थानों में काम करने वाले कुछ कर्मियों का दावा है कि उन्हें अतिरिक्त समय (ओवरटाइम) का पारिश्रमिक नहीं मिलता, वहीं कुछ निजी अस्पतालों के कर्मचारी न्यूनतम पारिश्रमिक नहीं पाने की बात लेकर आते हैं, जिससे कार्य में बाधा उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा, “एक व्यक्ति कहता है कि मैं 12 घंटे काम करता हूं, पर केवल 8 घंटे का पारिश्रमिक मुझे मिलता है। इस तरह की शिकायतें श्रम कानून के आधार पर स्थिर नहीं होतीं। अधिकतर शिकायतें सतही होती हैं, जिन्हें छांटने और कार्यान्वयन में कठिनाइयां आती हैं।”

विभाग ने बताया कि औसतन रोजाना 30 से 35 शिकायतें प्राप्त होती हैं। देरी के लिए आलोचना होती है पर सीमित संसाधनों के बावजूद विभाग निरंतर काम कर रहा है। महानिदेशक ने कहा, “आवेदन पर सुनवाई होती है और श्रमिकों में न्याय मिलने की आशा जागी है, लेकिन हमारी जनशक्ति और क्षमता सीमित है। फिर भी हम प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहे हैं।”

चुनौतियां क्या हैं? एक श्रम विशेषज्ञ ने बताया कि श्रमिकों की शिकायत और गुनाहों को निपटाने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध नहीं है। श्रम विशेषज्ञ केशव बस्याल ने सुझाव दिया कि समस्या का समय पर समाधान करने पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “श्रमिकों की संख्या और विभाग के कर्मचारियों की संख्या अनुपात में नहीं है। कर्मचारियों से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसलिए संस्थागत क्षमता का विस्तार आवश्यक है।” उन्होंने आगे कहा, “इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए अधिक कार्यालयों और प्रशिक्षित कर्मचारियों के बिना समाधान संभव नहीं।” साथ ही, श्रमिकों को अपने श्रम अधिकारों के प्रति स्वयं जागरूक होना भी जरूरी है। बस्याल ने बताया, “न्यूनतम पारिश्रमिक क्या होता है, कार्य स्थल पर उपकरण कैसे होने चाहिए, और श्रमिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो, इन विषयों पर श्रमिक अकसर जागरूक नहीं होते।” उनके अनुसार, यदि श्रमिक सामूहिक रूप से आपसी वार्ता करते हैं, तो वे अपने अधिकारों को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से प्राप्त कर सकेंगे।