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‘जेनजी आन्दोलन के दौरान नेपाली सेना ने संकट प्रबंधन में प्रभावी भूमिका निभाई’

समाचार सारांश

संपादकीय समीक्षा की गई।

  • २३ भदौ से पहले सूचना न होना नहीं, बल्कि सही विश्लेषण और समय पर निर्णय प्रक्रिया न होने के कारण सुरक्षा तंत्र असफल रहा, ऐसा नारायण अधिकारी ने बताया।
  • २४ भदौ को सर्वोच्च न्यायालय, सिंहदरबार सहित संवेदनशील संरचनाओं के विध्वंस और आगजनी से राज्य के संकट प्रबंधन और कमाण्ड-नियंत्रण में कमजोरी आई, उन्होंने कहा।
  • जेनजी आन्दोलन को उन्होंने केवल सोशल मीडिया प्रतिबंध की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सुशासन, युवाओं की असंतुष्टि, डिजिटल परिचालन और विश्वास संकट के विस्फोट के रूप में समझाया।

सिर्फ राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि सुरक्षा विशेषज्ञ भी २०८२ भदौं २३ और २४ की घटनाओं को अलग करके समझने की जरूरत बताते हैं। उस समय सरकार जीवन और संपत्ति दोनों की रक्षा करने में सक्षम नहीं थी। जेनजी आन्दोलन को सुरक्षा के दृष्टिकोण से कैसे देखा जाता है? आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के मामले में इन घटनाओं से क्या सीखना चाहिए? इस विषय पर सुरक्षा विशेषज्ञ नारायण अधिकारी से हुई बातचीत:

२०८२ भदौं २३ की घटना के संदर्भ में सुरक्षा एजेंसियों की पूर्व सूचना और विश्लेषण क्यों विफल हुए?

पूर्व सूचना में असफलता निश्चित है। लेकिन मेरे अनुसार सिर्फ सूचना न मिलना समस्या नहीं था। सूचना मिलने के बाद भी उसे गंभीरता से विश्लेषित कर निर्णय प्रक्रिया में समय पर उपयोग नहीं कर पाने से समस्या हुई। राज्य ने गुप्तचर प्रणाली में कितना निवेश किया, इसकी क्षमता क्या है, और इसे कितना व्यावसायिक एवं प्रभावी बनाया जा सकता है, यह महत्वपूर्ण है।

गुप्तचर काम केवल सूचना संग्रह नहीं, बल्कि जोखिम के स्तर के विश्लेषण, घटनाओं के भविष्य में कहां जा सकती हैं, और इन्हें रोकने या प्रबंधित करने के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए, ऐसी रणनीतिक चेतावनी देना है।

२३ भदौं से पहले आंदोलन के संकेत, युवाओं की डिजिटल गतिविधि और सोशल मीडिया पर बढ़ रही असंतुष्टि के पर्याप्त संकेत थे। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने इन संकेतों को पारंपरिक तौर पर