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भारत का निर्वाचन आयोग फिर विवाद के केंद्र में क्यों?

भारत का निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के प्रमुख आयुक्त पर नई अनियमितताओं के आरोप लगने के बाद पुनः विश्वास संकट में फंस गया है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक इस तीन सदस्यीय आयोग का नेतृत्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार कर रहे हैं, जबकि सुखवीर सिंह संधु और विवेक जोशी आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित समाचार के अनुसार, कुछ महीनों से मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ उनके दो सहयोगी आयुक्त मतदाता डेटाबेस की अखंडता, नए मतदाता जोड़ने की प्रक्रियाओं में बदलाव और मतदाता सूची की सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। आयुक्त संधु और जोशी ने ऐसी निर्णयों पर असहमति जताई है जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए हैं। पिछले १० महीनों में कम से कम १४ बार इस जोड़ी को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा गया। विपक्षी नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार से इस्तीफा देने का दबाव बनाया है।

निर्वाचन आयोग के जारी बयान में “विभिन्न मत” निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताए गए हैं। आयोग इस विवाद के बीच देशभर मतदाता डेटाबेस की समीक्षा कर रहा है। आयोग ने एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) योजना के तहत अयोग्य नाम मतदाता सूची से हटाने का लक्ष्य रखा है। हाल ही में मतदाता सूची लगभग २५ वर्ष पूर्व संशोधित की गई थी, और इस अवधि में मरे, देश छोड़ गए या नए पते पर चले गए लगभग १३ करोड़ लोगों के नाम हटाने के लिए पुनः नामावली अद्यतन की जा रही है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार पर चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पक्ष में मतदाता सूची में हेरफेर करने का आरोप लगाया गया है, जिसे बीजेपी और आयोग दोनों ने खंडित किया है। नवीनतम खुलासों के चलते आयोग के भीतर मुख्य आयुक्त की कार्यशैली पर भी प्रश्न उठने लगे हैं। विपक्षी नेताओं ने कुमार से इस्तीफा मांगते हुए कहा है कि उन्हें पद छोड़ना चाहिए, जबकि कुछ ने उनकी गिरफ्तारी तक की मांग की है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने आयोग पर मत चोरी के आरोप लगाते हुए इसे देशद्रोह की उपमा दी है।