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सात नए बालकथा पुस्तकों का विमोचन

सीमान्त आवाज और पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से सात नए बालकथा पुस्तकें जारी की गई हैं। काठमांडू में, बालकथाओं के माध्यम से सीमांत समुदायों की आवाज़ और पहुंच को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिखी गई ये सात पुस्तकें रविवार को नक्साल स्थित नेपाल ललित कला प्रज्ञा प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम में विमोचित की गईं। शिक्षाविद् केदारभक्त माथेमा, वरिष्ठ बाल साहित्यकार गंगा कर्माचार्य, कलाकार तथा नेपाल ललित कला प्रज्ञा प्रतिष्ठान के पूर्व उपकुलपति केके कर्माचार्य, बाल साहित्यकार एवं समीक्षक प्रमोद प्रधान, अधिकारकर्मी गौरी नेपाली सहित पुस्तक के लेखक विमोचन समारोह में मौजूद थे।

जारी बालकथा पुस्तकों में सुशीला तामांग की ‘आइतीको बिहे’, बिना थिंग की ‘नामको कथा’, हंसावती कुर्मी की ‘इन्द्रेणी’, शांति सापकोटा की ‘मितिनी’, संजोग ठकुरि की ‘ममीघर’, अस्मिता वादी की ‘हैतमाको हिम्मत’ और संगीता उराँव की ‘सुर्जीको उज्यालो’ शामिल हैं। ये कथाएँ पत्रकार सुशीला तामांग के संयोजन में ब्रिटिश काउंसिल के लैंगिकता संबंधी कला कार्यक्रम ‘जेन्डर आर्ट्स : इक्वल टुगेदर 2025’ के तहत ‘अपराजिता कथा परियोजना’ के हिस्से के रूप में प्रकाशित हुई हैं। इस परियोजना में बाल वाङ्मय तथा अनुसंधान केंद्र और हम दाजुभाइ संस्थान ने भी सहयोग दिया है।

पुस्तक में चित्रकार रविन्द्र मानन्धर, अनामिका गौतम और प्रज्वल थापामगर ने चित्रांकन किया है। बाल साहित्य के माध्यम से बालिका सशक्तिकरण, लैंगिक समानता, विकास और समाज में मौजूद बच्चों के बीच भेदभाव, जातीय, वर्गीय और सांस्कृतिक विभेद को कम करने की यह परियोजना का मुख्य उद्देश्य है। कथाओं में सीमांत समुदायों के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के पहलू, अनुभव और प्रथाएँ शामिल की गई हैं। कार्यक्रम में शिक्षाविद् माथेमा ने कहा कि लामा वाक्यों वाली पुस्तकें बच्चों को पढ़ाकर उनकी बौद्धिक क्षमता के विकास में मदद करनी चाहिए।

पठनशीलता ज्ञान के क्षितिज को विस्तारित करती है, इसलिए बालकाओं को इस दिशा में प्रेरित करना आवश्यक है, यह माथेमा का विचार था। सातों कथाओं की समीक्षा करते हुए कार्यकर्ता गौरी नेपाली ने बताया कि ये नैतिकता और आदर्श बाल कथाओं के रूप में परंपरागत लेखन शैली से अलग हैं और समाज की वास्तविक तस्वीर को प्रस्तुत करती हैं। ये कथाएँ किसी उच्च वर्ग के व्यक्तियों की नहीं हैं, बल्कि कई लोगों को अपनी ही कहानी जैसी लगने वाली हैं, इसलिए नेपाली लोग इन्हें पसंद कर रहे हैं। पुस्तक में व्यक्त विचारों को लेकर बाल साहित्यकार प्रमोद प्रधान, गंगा कर्माचार्य, प्रा.डा. तारानिधि भट्टराई, ब्रिटिश काउंसिल के ‘जेन्डर आर्ट्स : इक्वल टुगेदर 2025’ की निदेशक युक्ता बज्राचार्य, लेखक बिना थिंग और चित्रकार अनामिका गौतम सहित लोगों ने कहा कि ये पुस्तकें बाल साहित्य के क्षेत्र में सकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।