
पाकिस्तान के ईंट भट्टे के मजदूर गर्मी के प्रभाव में और जोखिम में
२५ साउन, शेखुपुरा (पाकिस्तान) (रासस/एएफपी) – पाकिस्तान में बढ़ते तापमान ने ईंट भट्टे पर काम करने वाले मजदूरों के जीवन को और अधिक जोखिमपूर्ण बना दिया है। अत्यधिक धूप और ४० डिग्री सेल्सियस से ऊपर के तापमान में काम करते हुए मजदूरों को नीचे से निकलने वाली आग की गर्मी और ऊपर से पड़ने वाली सूरज की तीव्रता दोनों सहन करनी पड़ती है। शेखुपुरा जिले के एक ईंट भट्टे में मजदूर नीचे के छोटे छिद्रों से कोयला जल रही आग वाले कमरे में कोयला डाल रहे हैं, जबकि उनके सिर के ऊपर भट्टी से निकलने वाला गाढ़ा काला धुआं फैलता रहता है। पारंपरिक ईंट भट्टे में तापमान एक हजार डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, इसलिए ईंट के सही पकने की लगातार निगरानी के लिए मजदूरों की मौजूदगी जरूरी होती है। हालांकि, पाकिस्तान में पहले भी अत्यधिक गर्मी होती थी, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान के बढ़ने से यह काम और भी कठिन और जोखिमपूर्ण हो गया है।
पैंतीस वर्षीय मजदूर आबिद हुसैन के कपड़े भट्टी से निकलने वाले काले धुएं और धूल से पूरी तरह ढके हुए थे। उन्होंने बताया कि वे ऊपर और नीचे से आने वाली आग की गर्मी के बीच फंसे हुए हैं। उन्होंने कहा, ‘गर्मी चरम पर है, लेकिन घर की आर्थिक जरूरत के कारण काम करना ही पड़ता है।’ हुसैन जैसे ही पाकिस्तान की ईंट उद्योग में सैकड़ों हजार मजदूर काम करते हैं। श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यहां कमजोर नियम, कम मजदूरी और जोखिमपूर्ण कामकाजी स्थिति है। तीव्र निर्माण गतिविधियों के कारण ईंट की मांग बढ़ी है, लेकिन मजदूरों की आमदनी बेहद कम है, लगभग तीन अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन।
तेज धूप, धूल और गर्म हवा के बीच मजदूर घंटों भट्टी की सतह पर काम करते हैं। बंडेड लेबर लिबरेशन फ्रंट पाकिस्तान की महासचिव सैदा गुलाम फातिमा के अनुसार, ईंट भट्टी मजदूरों के लिए “कैद की जगह” जैसी होती है। उन्होंने कहा, ‘कामगारों को ऊपर से आने वाली तेज धूप का अथक ताप सहना पड़ता है और नीचे से भट्टी की तीव्र गर्मी शरीर की ओर बढ़ती है।’ फातिमा के अनुसार मजदूर ऋण, चरम गर्मी और बिगड़ते स्वास्थ्य के चक्र में फंसे हुए हैं।
शेखुपुरा पाकिस्तान के बड़े ईंट भट्टे उद्योग का केंद्र है। २०१८ के जलवायु और स्वच्छ वायु गठबंधन के आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में १८ हजार से अधिक ईंट भट्टे संचालित हैं, जिनमें १० लाख से अधिक लोग काम करते हैं। जलवायु विशेषज्ञ पाकिस्तान को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के लिहाज से सबसे अधिक जोखिम वाले देशों में मानते हैं। फातिमा का कहना है कि कई मजदूर अग्रिम रकम लेकर ऋण के बोझ तले दबे होते हैं, इसलिए जोखिमपूर्ण हालत में भी काम छोड़ पाना मुश्किल होता है।
हुसैन ने बताया कि वे प्रति माह लगभग २५ हजार पाकिस्तानी रुपए, यानी करीब ९० अमेरिकी डॉलर कमाते हैं। यह राशि किराए और बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में ही खर्च हो जाती है। उन्होंने कहा, ‘हम बीमार भी हों या पारिवारिक समस्याएं हों, फिर भी काम करना पड़ता है। समय निकालकर काम न करें तो परिवार में समस्या होती है।’ ईंट भट्टे से होने वाला वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम कम करने के लिए पंजाब प्रांतीय सरकार पारंपरिक भट्टों को ‘जिगज़ैग’ तकनीक में परिवर्तित करने के लिए दबाव बना रही है।
लेकिन भट्टी का तापमान स्थिर रखना जरूरी होने के कारण लंबे आराम देना मुश्किल है, ऐसा ४५ वर्षीय सुपरवाइज़र मुजीब उल्ला ने बताया। उन्होंने कहा, ‘चाहे चरम गर्मी हो, ठंड हो या बारिश, काम लगातार करना पड़ता है।’ मजदूरों को पीने का पानी और कभी-कभी छोटा विश्राम दिया जाता है, लेकिन स्थिति में सुधार आवश्यक है। भट्टी के एक हिस्से में २८ वर्षीय मोहम्मद आज़म गीली मिट्टी मिलाकर लकड़ी के साँचे में हाथ से ईंट बना रहे थे। पाकने वाली ईंटों की कतारों के बीच उनका काम भी अत्यंत थकाने वाला है। आज़म ने काम की कठिनाई बताते हुए कहा, ‘मौसम अच्छा हो या खराब, काम तो काम ही है। करना ही पड़ता है।’