
‘चमौली, मेलम्ची और टिस्टा की बाढ़ घटनाएँ भोटेकोशी बाढ़ की निरंतरता हैं, इसके अनुसार अब रणनीति बनाएं’
वातावरण वैज्ञानिक उत्तमबाबु श्रेष्ठ ने भोटेकोशी की बाढ़ को पिछले ६ वर्षों की हिमालयी बाढ़ों से ज्यादा हानिकारक बताया है। उन्होंने हिमनद के पिघलने से बन रहे हिमताल एवं ढाल के टूटकर नदी में गिरने वाले कास्केडिंग घटनाओं को बाढ़ के मुख्य कारणों के रूप में बताया है। श्रेष्ठ ने जलवायु परिवर्तन को भोटेकोशी बाढ़ का प्रमुख दुष्करमणीय तत्व मानते हुए इस तरह की आपदाओं से निपटने के लिए बहुआयामी तैयारी की आवश्यकता पर जोर दिया।
‘भोटेकोशी के बाद हमारी ज़िन्दगी’ नामक संवाद श्रृंखला के पहले भाग में विपद् प्राधिकरण के पूर्व सीईओ अनिल पोखरेल के साथ बातचीत आयोजित की गई थी। इसी श्रृंखला के दूसरे भाग में वातावरण वैज्ञानिक उत्तमबाबु श्रेष्ठ ने भोटेकोशी की तुलना करते हुए गत छह वर्षों की हिमालयी बाढ़ों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। श्रेष्ठ ने कहा, ‘भोटेकोशी ने जो क्षति पहुँचाई है, उसकी तीव्रता किसी अन्य बाढ़ से कहीं अधिक है।’
उनके अनुसार, नदी को रोकना या बांध बनाना, नदी के साथ-साथ मिट्टी, गाद और हिमखंड के गिरने से निचले तटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विनाशकारी प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। भोटेकोशी बाढ़ के कई कारण हैं, परंतु जलवायु परिवर्तन इसके मुख्य दोषी हैं, यह उनका दावा है। ‘आजकल आपदाएं श्रृंखलाबद्ध होकर होती हैं। इसका मतलब है हिमपहाड़ी लैंडस्लाइड या भूक्षय होता है, ताल बनती है और फिर नदी रुकती है, इसके बाद और भी विनाशकारी घटनाएं शुरू हो जाती हैं। इस तरह के ‘कास्केडिंग’ प्रकोप हमें बहुआयामी रणनीति बनाकर तैयार रहना आवश्यक बनाते हैं,’ श्रेष्ठ ने कहा।
वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान ग्लोबल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज के प्रमुख रहे श्रेष्ठ के साथ नेपाल के आगामी कार्यों के विषय में ऑनलाइन संवाद, प्रस्तुतकर्ता बसन्त बस्नेत। वीडियो: शंकर गिरी