
इजरायल के सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले करने वाले हूथी विद्रोही कौन हैं?
समाचार सारांश
संपादकीय समीक्षा पर आधारित।
- यमन के हूथी विद्रोहियों ने 28 मार्च को इजरायल के संवेदनशील सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमला किया।
- हुथी समूह ने इजरायली सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया और इस अभियान को फिलिस्तीन व ईरान के खिलाफ जारी रखने का ऐलान किया है।
- इस हमले ने लाल सागर के व्यापार मार्ग में अनिश्चितता बढ़ा दी है और वैश्विक ऊर्जा संकट व आर्थिक मंदी का खतरा पैदा किया है।
यमन के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र से उभरे हुथी विद्रोहियों ने शनिवार को इजरायल के “संवेदनशील सैन्य ठिकानों” पर मिसाइल दागी। यह हमला ईरान के खिलाफ अमेरिका व इजरायल द्वारा शुरू किए गए एक महीने के युद्ध में हुथी समूह का औपचारिक और आक्रामक प्रवेश माना जा रहा है।
हुथी सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने अल-मसिरा टेलीविजन पर इजरायली सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा, “हमने इजरायली सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया है और यह अभियान फिलिस्तीन और ईरान के खिलाफ के आक्रमण जारी रहने तक चलेगा।”
इजरायल ने अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने का दावा किया है, लेकिन इस घटना ने लाल सागर के व्यापारिक मार्ग में पुनः अस्थिरता और तनाव बढ़ा दिया है।
हुथी विद्रोहियों का उद्भव
हुथी समूह को आधिकारिक रूप से ‘अंसार अल्लाह’ (ईश्वर के समर्थक) कहा जाता है। यह यमन के उत्तरी सादा प्रांत से निकला एक सशस्त्र धार्मिक और राजनीतिक समूह है। हुथी समूह की उत्पत्ति समझने के लिए यूमन के हजारों साल पुराने धार्मिक इतिहास को समझना आवश्यक है। ये ज्यादातर ज़ैदी शिया मुस्लिम समुदाय से जुड़े हैं, जो शिया इस्लाम की एक शाखा है जो कुछ प्रथाओं में सुन्नियों के करीब होती है।
ईरान के लिए हुथी समूह सौदी अरब को दबाव में रखने और लाल सागर में इजरायल तथा पश्चिमी शक्तियों के समुद्री मार्ग को चुनौती देने वाला प्रमुख हथियार हैं। हिज़्बुल्लाह और हमास की तरह, हूथी भी ईरान के ‘प्रतिरोध अक्ष’ के मुख्य स्तंभ हैं।
सन् 897 से 1962 तक, लगभग एक हजार वर्षों तक यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाके में ज़ैदी इमाम शासन करते रहे। पैगंबर मुहम्मद की वंशावली (अह्ल अल-बायत) से आने वाले इन नेताओं के लिए अन्याय के खिलाफ विद्रोह करना धार्मिक कर्तव्य माना जाता था। इसी ‘खुरुज’ (विद्रोह) की अवधारणा ने वर्तमान हुथी आंदोलन की वैचारिक नींव रखी।
1962 का सैन्य ‘विद्रोह’ और इमामत का अंत
यमन के आधुनिक इतिहास में 1962 महत्वपूर्ण वर्ष था। उस वर्ष हुए सैन्य विद्रोह ने हजार वर्षों पुराने ज़ैदी इमामत का अंत कर दिया और ‘यमन अरब गणराज्य’ (उत्तर यमन) की स्थापना हुई।
इस विद्रोह ने ज़ैदी समुदाय को राजनीतिक रूप से कमज़ोर कर दिया। मिस्र के गमाल अब्देल नासिर ने गणतंत्रवादियों का समर्थन किया जबकि सऊदी अरब ने इमामत के समर्थकों का पल्ला पकड़ा। इससे यमन एक लंबे गृहयुद्ध में फंस गया, जिसका प्रभाव आज के हूथी विद्रोहियों में भी देखा जाता है। वे स्वयं को वह खोई हुई राजनीतिक और धार्मिक सत्ता वापस लाने वाले योद्धा मानते हैं।

यमन के आंतरिक संघर्ष में धार्मिक रंग इसलिए भी गहरा हो गया जब पड़ोसी सऊदी अरब ने यमन के उत्तरी क्षेत्र में ‘वाहाबी’ और ‘सलाफी’ (कट्टर सुन्नी) विचारधारा फैलाना शुरू की।
1980 के दशक में सऊदी अरब ने सादा प्रांत (हूथी क्षेत्र) में मदरसों पर भारी निवेश किया। ज़ैदी विद्वानों ने इसे अपनी पहचान पर खतरा माना। इसके बाद हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूथी ने धार्मिक शिक्षा और युवाओं को संगठित करना शुरू किया। यह केवल धार्मिक विवाद नहीं बल्कि यमन की मौलिक पहचान एवं विदेशी हस्तक्षेप के बीच संघर्ष था।
1990 के दशक में यमन के एकीकरण के बाद, सऊदी अरब के ‘वाहाबी’ प्रभाव में वृद्धि और अमेरिकी समर्थित यमनी सरकार के विरुद्ध यह आंदोलन शुरू हुआ। संस्थापक हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूथी ने 1992 में ‘विश्वास रखने वाले युवा’ नामक कार्यक्रम शुरू किया ताकि ज़ैदी पहचान को बचाया जा सके।
2003 के इराक युद्ध के बाद हुसैन ने अमेरिका और इजरायल विरोधी नारा को अपना मुख्य मंत्र बनाया। जब सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश की, तो 2004 में सादा पहाड़ से उनका पहला सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ। उसी वर्ष 10 सितंबर को हुसैन की मृत्यु हो गई। उनके निधन के बाद आंदोलन कमजोर होने की बजाय और मजबूत हुआ। नेतृत्व उनके भाई अब्दुल मलिक अल-हूथी ने संभाला और विभिन्न ज़ैदी कमांडरों को एक सैन्य कमान में लाया।

विद्रोह से सत्ता तक का सफर और गृहयुद्ध की आग
2011 की ‘अरब स्प्रिंग’ क्रांति ने यमन के 33 सालों के सालेह शासन को हिला दिया। हूथी समूह ने साना में हुए प्रदर्शनों में मुख्य भूमिका निभाई।
सालेह के सत्ता छोड़ने के बाद उपराष्ट्रपति अब्द-रब्बु मंसूर हादी ने सरकार संभाली। लेकिन उनकी सरकार कमजोर और भ्रष्ट साबित हुई। हूथी समूह ने जनता की असंतुष्टि का लाभ उठाते हुए 2014 में साना में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू किए। 21 सितंबर 2014 को हुथी लड़ाकुओं ने राजधानी साना पर कब्ज़ा कर लिया और हादी सरकार को पलायन करने को मजबूर कर दिया। इससे यमन का इतिहास चिरपरिचित तरीके से बदल गया और भीषण गृहयुद्ध शुरू हुआ। 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में दस देशों के सैन्य गठबंधन ने हुथी समूह को रोकने के लिए ‘ऑपरेशन डिसाइसिव स्टॉर्म’ शुरू किया।
अब्दुल मलिक अल-हूथी ने लाल सागर में जहाजों को पूरी तरह नष्ट करने की चेतावनी दी है यदि ‘रेड लाइन’ पार की गई। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ा है।
सऊदी अरब का उद्देश्य हादी सरकार की पुनर्स्थापना करना और ईरान समर्थित हुथी समूह को सीमाओं से बाहर निकालना था। लेकिन यह युद्ध सऊदी के लिए आसान नहीं रहा। हुथी समूह ने धमाके वाले युद्धकेला से सऊदी की आधुनिक सैन्य तकनीक को चुनौती दी। वहीं, ईरान ने उन्हें अत्याधुनिक ड्रोन और मिसाइल तकनीक उपलब्ध कराई। परिणामस्वरूप, हुथी समूह ने सऊदी और संयुक्त अरब अमीरात के तेल प्रसंस्करण केंद्रों और हवाई अड्डों पर हमले की क्षमता विकसित की।
यह युद्ध अंततः ईरान और सऊदी अरब के बीच एक ‘प्रॉक्सी’ युद्ध बन गया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक है, जिसमें अब तक लगभग 4 लाख लोगों की जान गई है और 40 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं।
ईरान के साथ संबंध और ‘प्रतिरोध अक्ष’
हुथी समूह ईरान के क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोगी के रूप में बेहद प्रभावशाली हैं। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) उन्हें अत्याधुनिक ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल और सैन्य प्रशिक्षण प्रदान करता है।
हुथी समूह ने ईरानी तकनीक की मदद से “पैलेस्टीन-2” जैसे शक्तिशाली मिसाइल विकसित किए हैं, जो 2,150 किलोमीटर से अधिक की दूरी तक मार कर सकते हैं।
ईरान के लिए, ये हुथी समूह सौदी अरब को दबाव में रखने और लाल सागर में इजरायल तथा पश्चिमी शक्तियों के समुद्री मार्ग को चुनौती देने का मुख्य हथियार बन गए हैं। हिज़्बुल्लाह और हमास की तरह, हुथी भी ईरान के ‘प्रतिरोध अक्ष’ के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

लाल सागर पर हमले: विश्व व्यापार के प्रमुख मार्ग पर प्रहार
2022 तक यह द्वंद्व अपेक्षाकृत स्थिर था। सऊदी अरब और हुथी समूह के बीच लंबे समय से युद्धविराम के लिए गोपनीय और खुले वार्ताएं चल रही थीं। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 के बाद, हुथी समूह ने फिलिस्तीन का समर्थन करते हुए लाल सागर में जहाजों पर लगातार हमले शुरू किए। उन्होंने लाल सागर और ‘बाब अल-मंदेब’ स्ट्रेट में इजरायल और पश्चिमी जहाजों को निशाना बनाकर लगातार हमले किए, जिनका प्रभाव विश्वव्यापी था।
यह मार्ग विश्व व्यापार का लगभग 15% हिस्सा संभालता है। यहां असुरक्षा बढ़ने के कारण जहाज अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड हूप’ से होकर जाना मजबूर हुए, जिससे परिवहन समय 9 दिनों तक बढ़ गया और लागत 2 से 3 गुना हो गई।
ईंधन और वस्तुओं की परिवहन लागत बढ़ने के कारण नेपाल जैसे विकासशील देशों में वस्तु कीमतों में भारी वृद्धि हुई, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति में इजाफा हुआ।
2026 का ईरान-इजरायल युद्ध और हुथी समूह का ‘तीसरा मोर्चा’
फरवरी और मार्च 2026 में, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु स्थलों पर हमले किए, तब हुथी समूह ने औपचारिक रूप से युद्ध में प्रवेश किया। 28 मार्च को इजरायली सैन्य लक्ष्यों पर मिसाइल प्रहार इसी का नवीनतम संकेत है।
अब्दुल मलिक अल-हूथी ने कहा है कि यदि लाल सागर में ‘रेड लाइन’ की उल्लंघन हुई तो वे वहां जहाजों को पूरी तरह नष्ट कर देंगे। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट और आर्थिक मंदी का खतरा फिर से बढ़ गया है। क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर दोनों महत्वपूर्ण समुद्री चोकप्वाइंट हैं, इनके प्रभावित होने से विश्व की तेल आपूर्ति ठप होने की संभावना है।