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खाली पैर दौड़ने वाली माँ की कहानी पर भारत में शिक्षा प्रणाली पर बहस छिड़ी

खाली खुट्टा दौड़ती रामाबाई

तस्बिर स्रोत, Kiran Sakle/BBC

पश्चिम भारत की रामाबाई रणवीर ने दौड़ के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था और उनके पास दौड़ने के लिए जूते भी नहीं थे।

पहली बार दौड़ में भाग लेने वाली उन्होंने बिना जूते के दौड़ लगाकर प्रथम स्थान प्राप्त किया।

अपने पति को खो चुकी ४७ वर्षीय रामाबाई का एकमात्र उद्देश्य अगस्ट महीने में आयोजित ३ किलोमीटर की दौड़ में भाग लेकर पुरस्कार जीत कर अपनी दो बेटियों की पढ़ाई का खर्च जुटाना था।

दूसरों से पहले दौड़ पूरी करने पर वे अत्यंत खुश हुईं। उन्होंने 3,000 भारतीय रुपये अर्थात लगभग 4,800 नेपाली रुपये के पुरस्कार जीते, जो उनकी बेटियों की किताबें और पढ़ाई की सामग्री खरीदने में थोड़ी सहायता कर सकता था।

उनके लिए पुरस्कार की राशि ज्यादा नहीं थी। यह भारत में उच्च शिक्षा के खर्च का एक अंश भी पूरा नहीं करता। उनकी एक बेटी सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रही है, जिसका शुल्क भी उस पुरस्कार से पूरा नहीं हो पाता।