
अमेरिका नेवाड़ा में भूमिगत बड़े विस्फोट का क्या कारण था?
१५ असोज, काठमाडौं । अमेरिका ने बुधवार नेवाड़ा में भूमिगत एक बड़े विस्फोट को अंजाम दिया है। हालांकि इस विस्फोट में परमाणु बम का उपयोग नहीं किया गया था। वैज्ञानिकों ने शक्तिशाली रासायनिक विस्फोटक पदार्थों के उपयोग से उत्पन्न कम्पन और अन्य संकेतों को दर्ज किया है। इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि यदि कोई देश भूमिगत छोटे परमाणु धमाके करके उसके संकेतों को छुपाने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे पहचाना जा सकता है। यह परीक्षण इस समय किया गया है जब अमेरिका चीन पर गुप्त परमाणु परीक्षण करने का आरोप लगा रहा है। २०२० में चीन के शिनजियांग स्थित लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र में ऐसे गुप्त परीक्षण का आरोप लगाया गया था।
शीत युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने नेवाड़ा के नेशनल सिक्योरिटी साइट पर सैकड़ों परमाणु परीक्षण किए थे, और अब उसी स्थल पर नया प्रयोग किया गया है। जमीन से लगभग ९०० फीट नीचे यह परीक्षण नेवाड़ा नेशनल सिक्योरिटी साइट के पी-टनेल क्षेत्र में किया गया था, जो सुरंग जमीन से लगभग ९०० फीट नीचे है और वर्षों से राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी प्रयोगों के लिए उपयोग में है। वैज्ञानिकों ने सुरंग के अंदर रासायनिक विस्फोटक पदार्थ स्थापित किए थे और विस्फोट के बाद उत्पन्न कम्पन, ध्वनि तथा अन्य संकेत रिकॉर्ड करने के लिए विभिन्न प्रकार के सेंसर लगाए गए थे। प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कंप्यूटर मॉडल तैयार किया जाएगा और परमाणु विस्फोट पहचान प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिलेगी। इससे अमेरिका को विश्व के किसी भी स्थान पर होने वाले संभावित परमाणु धमाकों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
परमाणु बम का उपयोग क्यों नहीं किया गया? अमेरिका का उद्देश्य परमाणु विस्फोट करना नहीं था, बल्कि भूमिगत विस्फोट से होने वाले बाहरी संकेतों का अध्ययन करना था। इसलिए वैज्ञानिकों ने परमाणु बम के बजाय रासायनिक विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल किया। गुप्त परमाणु धमाके का पता लगाना क्यों कठिन होता है? आमतौर पर भूमिगत परमाणु विस्फोट तीव्र कम्पन उत्पन्न करते हैं, जो भूकंप जैसे संकेत देते हैं। विश्व भर के सेंसर ऐसे कम्पनों को रिकॉर्ड करते हैं और वैज्ञानिक उन संकेतों का अध्ययन करके परमाणु परीक्षण की पुष्टि करने की कोशिश करते हैं। लेकिन समस्या तब होती है जब विस्फोट के संकेत जानबूझकर कमजोर कर दिए जाते हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में “डिकपलिंग” कहा जाता है। इसका मतलब है कि विस्फोट को ऐसी जगह कराना (जैसे भूमिगत बड़ी गुफा) जहां इसका प्रभाव सतह तक कम पहुंचे। इससे सेंसर द्वारा रेकॉर्ड किए गए कम्पन कम हो जाते हैं और परीक्षण का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका का नया प्रयोग ऐसे निहित संकेतों वाले विस्फोटों का पता लगाने के लिए किया गया है।
चीन द्वारा अमेरिकी आरोपों का खंडन अमेरिका ने २२ जून २०२० को चीन पर शिनजियांग के लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र में गुप्त भूमिगत परमाणु परीक्षण करने का आरोप लगाया था। अमेरिकी अधिकारियों ने वहां २.७५ मैग्नीट्यूड के भूकंपीय झटका दर्ज होने की बात कही थी और इसे सामान्य भूकंप या खदान विस्फोट नहीं माना था। चीन ने ‘‘डिकपलिंग’’ तकनीक का प्रयोग कर भूमिगत बड़ी गुफा में विस्फोट किया और इसलिए निगरानी प्रणाली में बड़ा झटका दर्ज नहीं हुआ, यह अमेरिकी दावा खारिज किया है। चीन ने कहा है कि उसने कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया और अमेरिका ने बिना प्रमाण के आरोप लगाए हैं। इसके बीच व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन ने अपनी निगरानी प्रणाली में उस दिन परमाणु परीक्षण के स्पष्ट संकेत नहीं पाए हैं। हालांकि दो छोटे भूकंपीय झटके दर्ज हुए लेकिन वे सामान्य भूकंप, अन्य विस्फोट या परमाणु परीक्षण कारण हुए, यह निश्चित नहीं किया जा सका। (एजेंसी सहयोग से)