
विद्यार्थी संगठन समाप्त होने की संभावना: सरकार का फैसला और विरोध प्रदर्शन
प्रधानमंत्री बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने ६० दिनों के भीतर स्कूल और विश्वविद्यालयों से राजनीतिक विद्यार्थी संगठनों को हटाने का निर्णय लिया है। सरकार ने ९० दिनों के अंदर गैर-राजनीतिक विद्यार्थी काउंसिल या स्टूडेंट वॉइस स्थापित करने की योजना बनाई है। विद्यार्थियों के संगठनों ने इस निर्णय को तानाशाही क़रार देते हुए इसका विरोध किया है और आंदोलन की चेतावनी दी है। १६ चैत, काठमांडू। प्रधानमंत्री नियुक्ति के बाद से ही अपने ‘दृढ़ निर्णयों’ और उनकी लागू करने के लिए बालेन शाह की आलोचना और प्रशंसा दोनों हुई हैं। १३ चैत को बालेन की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की बैठक में १०० महत्वपूर्ण कार्यों की सूची को मंजूरी मिली। इस सूची में सरकार की उस योजना को भी शामिल किया गया जिसमें ६० दिनों के अंदर स्कूल और विश्वविद्यालय से राजनीतिक छात्र संगठनों को हटाने का प्रावधान है। बालेन सरकार की इस कार्यतालिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ६० दिनों के भीतर दलीय संगठन हटाने होंगे। दलीय संगठनों ने शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट को रोकने के लिए इस कदम की आवश्यकता बताई है। इसी संदर्भ में सरकार ने विकल्प स्वरूप ९० दिनों में गैर-दलीय ‘विद्यार्थी काउंसिल’ या ‘स्टुडेंट वॉइस’ जैसी वैकल्पिक संरचना स्थापित करने का निर्णय लिया है।
सोशल मीडिया पर इस कदम का अधिकांश जनता ने स्वागत किया, लेकिन छात्र संगठनों ने असहमति व्यक्त की है। नेविसंघ के पूर्व अध्यक्ष दुजाङ शेर्पा ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘आग के घेरे में हाथ न डालें, यह जलाकर नष्ट कर सकता है।’ नेविसंघ के नेता दावा करते हैं कि बालेन शाह को ‘रैप गाने का अधिकार नेविसंघ ने ही दिया था।’ एमाले से जुड़े अनेरास्ववियु और माओवादी से जुड़े अखिल क्रांतिकारी ने भी सरकार के इस निर्णय का विरोध किया है। वहीं, सरकार ने तर्क दिया है कि शिक्षा क्षेत्र से राजनीतिक हस्तक्षेप हटाना आवश्यक है। ‘शिक्षा में दलीय हस्तक्षेप के कारण छात्रों की वास्तविक आवाज़ दब रही है और शैक्षिक गुणवत्ता गिर रही है। इसलिए ६० दिनों में स्कूल/विश्वविद्यालय से दलीय विद्यार्थी संगठन हटाकर ९० दिनों के भीतर विद्यार्थी काउंसिल या स्टूडेंट वॉइस संचालित करने का निर्णय लिया गया है।’
नेपाल में छात्र आंदोलनों का इतिहास २००४ साल के ‘जयतु संस्कृतम्’ आंदोलन तक जाता है, जो राणा शासन के खिलाफ पहला संगठित छात्र विद्रोह था। २००६ में अखिल नेपाल विद्यार्थी फेडरेशन (अनेविफे) की स्थापना हुई। २०२२ में स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन (स्ववियु) का गठन हुआ। नेपाल विद्यार्थी संघ (नेविसंघ) की आधिकारिक स्थापना ६ वैशाख २०२७ को हुई थी। बीपी कोइराला और कृष्णप्रसाद भट्टराई की पहल पर पंचायती व्यवस्था के खिलाफ भूमिगत संघर्ष के लिए यह संगठन बनाया गया था। पिछले दशक में छात्र संगठनों की विचलित प्रवृत्ति ने शैक्षिक माहौल को प्रभावित किया है। स्ववियु चुनाव, शुल्क वृद्धि या राजनीतिक मांगों के नाम पर तोड़फोड़, आगजनी व अन्य उग्र घटनाएँ आम हो गई हैं।
छात्र संगठनों के अराजकतावाद से आम जनता और छात्र ही नहीं बल्कि उनके नेतृत्व भी परेशान हैं। त्रिभुवन विश्वविद्यालय में छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने उपकुलपति प्रो. खड्ग केसी के कार्यालय को तोड़फोड़ किया और शिक्षाध्यक्ष प्रो. दुविनन्द ढकाल के कार्यालय में तालाबंदी की। वार्षिक कैलेंडर के अनुसार स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर की प्रवेश प्रक्रिया, पढ़ाई-लिखाई व परीक्षा फॉर्म भरने का काम चल रहा था, ऐसे संवेदनशील समय में पदाधिकारियों पर शारीरिक हमले की धमकी और सोशल मीडिया पर चरित्र हत्या के प्रयास से प्रशासनिक कामों पर गंभीर असर पड़ा है, त्रिवि प्रवक्ता ने बताया।
छात्र नेता इस अस्तित्व संकट और विरोध के बीच सरकार के इस निर्णय से असहमत और असंतुष्ट हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक दलों और संगठनों को खोलने की स्वतंत्रता से छेड़छाड़ कर सरकार संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए छात्र संगठनों को खत्म करने का प्रयास कर रही है। नेविसंघ के प्रवक्ता सूरज सेजुवाल ने कहा, ‘गंभीर मामला है। संविधान को नजरअंदाज करते हुए सुधार किया गया है। राजनीतिक विचार रखने का अधिकार मौलिक है। वर्तमान स्ववियु संरचना को हटाया नहीं जाना चाहिए। यह तानाशाही की ओर जाना है।’
विद्यार्थी संगठन के समाप्ति की संभावना और उसके प्रभावों पर शिक्षाशास्त्री विद्यानाथ कोइराला ने कहा, ‘विद्यार्थी संगठनों को बंद न करते हुए किस प्रकार सुधार संभव है, इस पर अपनी ऊर्जा केंद्रित करनी चाहिए।’ इस प्रकार, विद्यार्थी संगठनों के भविष्य और सरकार के फैसले के कार्यान्वयन पर गहरी निगाह रखी जा रही है।