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भिटामिन बी-७ की कमी से कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकने में सफलता: नया शोध

स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लोजन के शोधकर्ताओं ने भिटामिन बी-७ की कमी से कैंसर कोशिकाओं द्वारा ऊर्जा प्राप्त करने के वैकल्पिक मार्ग को अवरुद्ध किया जा सकता है। इस अध्ययन में कैंसर कोशिकाओं की ‘मेटाबोलिक’ लचीलापन कम करने के नए तथ्य सामने आए हैं, जो ‘मोलिक्युलर सेल’ जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। ‘एफबीएक्सडब्ल्यू७’ जीन में उत्परिवर्तन के कारण कैंसर कोशिकाएं केवल ग्लूटामाइन पर निर्भर हो जाती हैं और ग्लूटामाइन को रोकने वाली दवाएं प्रभावी हो सकती हैं। ७ वैशाख, काठमाडौं।

कैंसर के उपचार में वैज्ञानिकों ने एक नई और महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लोजन के शोधकर्ताओं के मुताबिक़, भिटामिन बी-७ (बायोटिन) की कमी से कैंसर कोशिकाएं ऊर्जा प्राप्त करने के वैकल्पिक रास्ते बंद कर सकती हैं, जिससे उनकी वृद्धि रुक सकती है। ‘मोलिक्युलर सेल’ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन ने कैंसर कोशिकाओं की मेटाबोलिक लचीलापन को कैसे कम किया जा सकता है, इस पर नया प्रकाश डाला है।

आम तौर पर कई कैंसर कोशिकाएं ‘ग्लूटामाइन’ नामक अमीनो एसिड पर निर्भर होती हैं, जिसे वैज्ञानिक ‘ग्लूटामाइन एडिक्शन’ कहते हैं। जब कैंसर उपचार के दौरान ग्लूटामाइन की आपूर्ति रोकी जाती है, तब कई कैंसर कोशिकाएं पाइरूवेट जैसे अन्य पोषक तत्वों को ऊर्जा के रूप में उपयोग कर जीवित रह सकती हैं और बढ़ सकती हैं। लेकिन इस वैकल्पिक मार्ग के लिए कोशिकाओं को ‘पाइरूवेट कार्बोक्सिलेज’ एंजाइम सक्रिय करना ज़रूरी होता है, जिसके सक्रियण के लिए भिटामिन बी-७ आवश्यक होता है।

शोध के अनुसार, भिटामिन बी-७ की कमी होने पर यह एंजाइम निष्क्रिय हो जाता है और कैंसर कोशिकाएं वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत प्राप्त करने में असमर्थ रह जाती हैं, जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है। इससे कैंसर से जुड़े ‘एफबीएक्सडब्ल्यू७’ नामक विशेष जीन की भूमिका भी स्पष्ट हुई है। कई कैंसर रोगियों में इस जीन में उत्परिवर्तन पाया जाता है। अध्ययन में यह देखा गया कि इस जीन में खराबी होने पर पाइरूवेट एंजाइम की मात्रा कम हो जाती है, जिससे कैंसर कोशिकाएं पूरी तरह ग्लूटामाइन पर निर्भर हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में ग्लूटामाइन को रोकने वाली दवाएं अधिक प्रभावी साबित हो सकती हैं। इस खोज ने यह न केवल स्पष्ट किया कि कुछ मामलों में कैंसर दवाएं क्यों असर नहीं दिखातीं, बल्कि भविष्य में मेटाबोलिक कमजोरी पर केंद्रित नए और प्रभावकारी उपचार विकसित करने का मार्ग भी खोल दिया है।

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