
सांसदों को भ्रष्टाचार के मामलों से अब नहीं छुआ जाएगा
समाचार सारांश
- प्रतिनिधि सभा नियमावली–२०८३ के मसौदे में भ्रष्टाचार और संपत्ति शोधन के आरोपित सांसदों को निलंबित न करने का प्रावधान है।
- नियमावली के नियम २४७ (३) के अनुसार तीन वर्ष या अधिक कैद की सजा वाले फौजदारी मामले में सांसद थाने में बंद होने पर ही निलंबित होंगे।
- नियमावली ने प्रचलित कानून से भिन्न होने पर स्वयं को संघीय कानून और विशेषाधिकार माना है।
9 वैशाख, काठमांडू। सुशासन के नारों के बीच शुरू हुए जनाकाल आन्दोलन ने जनता जनार्दन (जेनजी) आंदोलन को जन्म दिया। उसके बाद के आम चुनावों में भी सुशासन का नारा प्रमुख था। प्रतिनिधि सभा में आए जनता समाजवादी पार्टी (रास्वपा) के लगभग दो तिहाई सांसद भ्रष्टाचार और अनुचितता के अंत को अपना मुख्य लक्ष्य बताते रहे हैं।
वे आरोप लगाते हैं कि पुराने दलों ने नियमों को तोड़ा-मरोड़ा है और संसदीय विशेषाधिकार का दुरुपयोग किया है। वर्तमान सांसदों में से कई रास्वपा नेता कांग्रेस, एमाले, माओवादी जैसे दलों और उनके नेताओं पर खुद के अनुसार कानून बनवाने और गठबंधन संस्कृति से भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते रहे।
लेकिन जब उन्हें प्रतिनिधि सभा में विशाल बहुमत मिला तो उन्होंने अपने वादों को उलटते हुए खुद के अनुकूल, देश के प्रचलित कानून के खिलाफ नियमावली का मसौदा बनाया।
इस मसौदे में भ्रष्टाचार और संपत्ति शोधन के आरोपित सांसदों को निलंबित न करने का प्रावधान है।
यदि यह नियमावली पारित हो जाती है, तो भ्रष्टाचार के आरोप वाले सांसद बिना रोक-टोक कार्य कर सकेंगे।
सबसे बड़ा लाभार्थी इस व्यवस्था का रास्वपा अध्यक्ष रवि लामिछाने होंगे।
उन पर कास्की जिला अदालत में संपत्ति शोधन का मुकदमा चल रहा है, पर नई नियमावली के चलते वे प्रतिनिधि सभा के सदस्य बने रहेंगे। भविष्य में भी कोई भी सांसद भ्रष्टाचार के आरोप में पड़ने पर निलंबित नहीं होगा।
विवादास्पद दो प्रावधान
प्रतिनिधि सभा नियमावली मसौदा समिति ने तैयार किया गया मसौदा दो अहम प्रावधानों के साथ है जो सांसदों को राज्य शक्ति और अधिकारों के दुरुपयोग में संरक्षण देगा।
नियम २४७ (३) में निलंबन के लिए प्रचलित कानून से भिन्न नियम है: तीन वर्ष या अधिक कैद का अपराध हो और सांसद थाने में बंद हो तभी निलंबन होगा।
यह दो शर्तें हैं: पहला, सजा तीन वर्ष या अधिक हो; दूसरा, सांसद थाने में हो। निलंबन अवधि थाने में रहने तक सीमित होगी।

यह व्यवस्था अनेक प्रचलित कानूनों से टकराती है। नियमावली में यह भी कहा गया है कि प्रचलित कानून से भिन्न स्थिति में यह नियमावली संघीय कानून और विशेषाधिकार के रूप में लागू होगी।
नियम २५९ के अनुसार, ‘प्रचलित कानून कुछ भी कहे, यह नियमावली संघीय कानून और सदस्यों के विशेषाधिकार के रूप में जारी रहेगी।’
यदि कोर्ट ने किसी सांसद को थाने में भेजा, लेकिन वे फरार हैं, तब भी वे निलंबन में नहीं आएंगे। इस नियम में विशेष अदालत का उल्लेख नहीं है, जो भ्रष्टाचार मामलों की सुनवाई करती है।
विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए सांसद निलंबन से बच पाएंगे क्योंकि नियमावली में उनका समावेश नहीं है।
तीन प्रचलित कानूनों से टकराते नियम
मसौदा समिति ने मंगलवार को प्रस्तुत नियमावली प्रचलित तीन कानूनों के साथ टकराती दिख रही है। इनमें से दो कानूनों में लगभग समान प्रावधान हैं और तीसरा थोड़ा भिन्न है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, २०५९ के धारा ३३(१) के अनुसार, भ्रष्टाचार के आरोपित व्यक्ति निलंबन में आते हैं। इसमें थाने में बंद प्रवक्ता या प्रक्रिया पूरी होने तक स्वतः निलंबन होगा। सारे सांसद इस अधिनियम के तहत ‘राष्ट्रसेवक’ वर्ग में आते हैं।
अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग अधिनियम, २०४८ के धारा १७ में भी सार्वजनिक पदाधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित होते हैं। थाने में बंदी बनाए जाने पर अवधि तक स्वतः निलंबन होगा।

संपत्ति शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) निवारण अधिनियम में भी सार्वजनिक पदाधिकारी के मुकदमे पर स्वचालित निलंबन का प्रावधान है। धारा २७ के अनुसार, आरोप लगते ही निलंबन लागू होगा।
इसका मतलब वे अधिकारी जो थाने में हैं या आरोपित हैं, स्वचालित रूप से निलंबित होंगे।
वरिष्ठ अधिवक्ता टीकाराम भट्टराई का कहना है कि संविधान के विपरीत अधिनियम और नियमावली नहीं बनाई जानी चाहिए। संविधान, अधिनियम, नियमावली और निर्देशिकाएं सर्वोच्चता के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए।
वे कहते हैं, ‘संघीय अधिनियम सार्वजनिक पदाधिकारियों के स्वचालित निलंबन का प्रावधान करता है, जबकि संसद के बनाए नियमावली से वह प्रभावहीन बनता है। यह संवैधानिक दृष्टि से गलत है।’
नियमावली का प्रभाव
नए नियमावली के अनुसार, सांसद थाने में बंद नहीं हैं तो निलंबित नहीं होंगे, और विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने पर भी कैद की सजा तक निलंबन नहीं होगा।
इससे राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने को सबसे अधिक फायदा होगा, क्योंकि वे कास्की जिला अदालत में संपत्ति शोधन के मामले में आरोपित हैं, पर नियमावली उन्हें निलंबन से बचाएगा।
अधिवक्ता भट्टराई के अनुसार, देश के सभी नागरिकों को समान कानूनी व्यवहार मिलना चाहिए, लेकिन नियमावली सांसदों को विशेष सुविधा दे रही है, जो समानता के सिद्धांत का हनन है।
कानून के प्राध्यापक और अधिवक्ता अपूर्व खतिवड़ा का कहना है कि नियमावली में सांसद स्वयं को विशेष दर्जा देना चाहते हैं।
वे कहते हैं, ‘यदि सांसद निलंबन से बचना चाहते हैं तो संबंधित अधिनियमों को संशोधित करना होगा। नियमावली प्रचलित कानूनों को कमजोर करने का प्रयास करती है।’
रास्वपा की भारी बहुमत के कारण ये प्रावधान आसानी से पारित हो सकते हैं, जो भ्रष्टाचार और संपत्ति शोधन के आरोपित सांसदों को सुविधाएं प्रदान करेंगे।
दो साल पहले भ्रष्टाचार के कारण दोषी पाए गए मनाङ के सांसद टेकबहादुर गुरुङ निलंबित नहीं हुए थे, जिसकी सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की थी, जिसे व्यापक आलोचना मिली थी।

अख्तियार ने उस निर्णय को पलटने के लिए पुनरावलोकन की मांग सुप्रीम कोर्ट में की है, जो अभी विचाराधीन है।
अख्तियार की मांग से आगे बढ़कर नई नियमावली सांसदों को भ्रष्टाचार और संपत्ति शोधन के मामलों में निलंबन से बचाने की व्यवस्था करती है, जिससे सांसद भ्रष्टाचार नियंत्रण कानून की बहस और निगरानी में सहजता से रह सकेंगे।
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. भीमार्जुन आचार्य का कहना है कि संविधान, अधिनियम, नियमावली, निर्देशिका सभी में सर्वोच्चता होनी चाहिए।
वे कहते हैं, ‘संसद में जनप्रतिनिधि जनता के अधिकारों का प्रदर्शन करते हैं, नियमावली इसलिए बनाई गई कि उनके अधिकारों का हनन न हो।’
लेकिन वे कहते हैं कि जनता ने किसी दल को इतना अधिकार नहीं दिया कि वे सभी कुछ कर सकें। यह नियमावली संविधान और कानूनों के सिद्धांतों से टकराती है।
डॉ. आचार्य कहते हैं, ‘लोकतंत्र में इस तरह के विषयों पर व्यापक चर्चा और बहस होनी चाहिए, अदालत के जरिए सीमित करने का प्रयास नहीं होना चाहिए।’