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क्या ममता बनर्जी का किला बीजेपी तोड़ पाएगी?


१० वैशाख, काठमाडौं। असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और एक केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। सभी राज्यों में आज (२३ अप्रैल) और अंतिम चरण २९ अप्रैल को मतदान होगा।

इन चार राज्यों में सबसे ज्यादा ध्यान इस बार पश्चिम बंगाल पर है। पहले पश्चिम बंगाल में ६ से ८ चरणों में मतदान होता था, लेकिन इस बार चुनाव कार्यक्रम काफी छोटा रखा गया है।

पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट गढ़ को तोड़कर १५ साल शासन कर चुकी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच इस बार कड़ी प्रतिस्पर्धा है, इसलिए यहां का चुनाव सबसे रोचक माना जा रहा है। भारतीय मीडिया, टेलीविजन और समाचार माध्यम इस चुनाव को व्यापक रूप से कवर कर रहे हैं।

चुनावी माहौल

पहला चरण गुरुवार सुबह ७ बजे से शुरू हुआ मतदान शाम ५ बजे तक लगभग ९० प्रतिशत वोटिंग हुई, जिसे भारतीय मीडिया ने बताया है।

इस चरण में १६ जिलों के १५२ निर्वाचन क्षेत्रों में ३.६ करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। जिसमें १४७८ उम्मीदवार हैं, जिनमें १६७ महिला उम्मीदवार शामिल हैं। चुनाव को निष्पक्ष और सुरक्षित बनाने के लिए आयोग ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। २४५० कंपनियों के केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात किए गए हैं।

रानीनगर क्षेत्र में मतदान के लिए लाइन में लगी महिला मतदाता। तस्वीर सौजन्य: द इंडियन एक्सप्रेस

हिंसात्मक घटनाएँ

मतदान के दौरान कुछ जगहों पर हिंसात्मक घटनाएँ हुई हैं। मुर्शिदाबाद के नाउदा में तनाव उत्पन्न हुआ, जहां आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं क़बीर के आने पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। मुर्शिदाबाद के डोमकल में कुछ मतदाताओं ने धमकियों और दहशत का आरोप लगाया है।

बीजेपी उम्मीदवार अग्निमित्रा पौल की गाड़ी पर आसनसोल दक्षिण में पत्थर फेंके गए। कुमारगंज के बीजेपी उम्मीदवार सुभेंदु सरकार ने भी तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा हमला होने का दावा किया है। ये घटनाएं वहां चुनावी हिंसा की परंपरा को दर्शाती हैं।

पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले, दौरान और बाद में राजनीतिक हिंसा आम बानी है। आंकड़े भी चुनाव के दौरान होने वाले राजनीतिक हमलों में सबसे अधिक मौतें पश्चिम बंगाल में ही होने को सत्यापित करते हैं। ग्रामीण इलाकों में हारने वाले दल के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को उनके घरों से निकाल कर महीनों तक कहीं और रहना पड़ता है, जिसे सामान्य माना जाता है।

यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है?

इस चुनाव को भारतीय राजनीति के निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रीय राजनीतिक दृष्टिकोण से यह बीजेपी की दक्षिण और पूर्व भारत में विस्तार की दीर्घकालीन रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा। बीजेपी लंबे समय से पश्चिम बंगाल को अपनी मुख्य राजनीतिक आधार बनाने का प्रयास कर रही है। इस चुनाव से निर्धारित होगा कि वह कितनी सफलता पा पाती है।

ममता बनर्जी

यह चुनाव केवल हार-जीत का विषय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच कड़ा संघर्ष है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस खुद को बंगाली संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता की प्रमुख रक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वहीं बीजेपी राष्ट्रीय एकता, हिंदुत्व और विकास के एजेंडे के जरिये ममता के क्षेत्रीय राजनीतिक किले को तोड़ने का प्रयास कर रही है।

भारतीय राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव को 2029 के लोकसभा चुनाव के ‘सेमीफाइनल’ के रूप में देख रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ४२ लोकसभा सीटें हैं, जो केंद्र सरकार के सत्ता समीकरण को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि दिल्ली की सत्ता के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है।

पश्चिम बंगाल में १५ साल मुख्यमंत्री के रूप में शासन कर चुकी ममता के लिए यह चुनाव यह साबित करने का मौका भी है कि उनका किला सुरक्षित है या नहीं। तृणमूल कांग्रेस लगातार तीन बार वहां सत्ता में रही है। अगर चौथी बार भी सत्ता में आती हैं तो ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाली Powerful बनने वाली हैं।

प्रतिस्पर्धा कैसी है?

मुख्यमंत्री बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अपना पुराना नारा “माँ, माटी, मानुष” को चुनावी अभियान का केंद्र बनाया है।

पार्टी ने खासकर महिलाओं के लिए लाए गए नकद हस्तांतरण योजना, युवाओं के लिए रोजगार कार्यक्रम और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मुख्य चुनावी एजेंडा बनाया है।

ममता की पकड़ इतनी मजबूत है कि वर्षों की कोशिशों के बावजूद बीजेपी पश्चिम बंगाल में उनके विकल्प के रूप में कोई विश्वसनीय चेहरा पेश नहीं कर पाई है। तृणमूल सरकार पर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे हैं, लेकिन ममता की व्यक्तिगत लोकप्रियता में विशेष कमी नहीं आई है।

मोदी की बीजेपी खुद को वहाँ परिवर्तन का वाहक प्रस्तुत कर रही है। मोदी ने चुनावी सभाओं में दावा किया है कि इस बार बंगाल की जनता परिवर्तन का जनादेश देगी। बीजेपी ने सुवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और अग्निमित्रा पौल जैसे प्रभावशाली नेताओं को मैदान में उतारकर सुशासन, कानून-व्यवस्था सुधार और घुसपैठ रोकने को प्रमुख मुद्दा बनाया है।

2014 से लगातार केंद्र में बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद बीजेपी ममता की लोकप्रियता के सामने पश्चिम बंगाल में विस्तार नहीं कर पाई है। 2021 के विधानसभा चुनाव में अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में २०० से अधिक सीट जीतने का लक्ष्य रखा था, लेकिन मात्र ७७ सीटों पर सीमित रही।

उस चुनाव में बिना सीट हासिल किए वामपंथी दल और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी खोई प्रतिष्ठा वापस पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी बहरामपुर से चुनावी मोर्चे पर हैं जबकि वाम मोर्चा हर परिवार को स्थायी रोजगार देने का वादा कर रहा है।

चुनावी इतिहास

भारत के स्वतंत्र होने के बाद पश्चिम बंगाल में ३० वर्षों तक कुछ कमजोर गठबंधन सरकारों को छोड़कर अधिकांश भाग राष्ट्रीय कांग्रेस के शासन में रहा। 1977 के चुनाव में पश्चिम बंगाल पहली बार वाम मोर्चे के कब्जे में आया।

इसके बाद ३४ वर्षों तक कम्युनिस्टों ने लाल किले की तरह पकड़ बनाई रही। 2011 में बदलाव के नारे के साथ ममता बनर्जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन करके कम्युनिस्टों का किला तोड़ दिया। उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन ने २९४ सीटों में से २२५ सीटें जीत लीं, जबकि वाम मोर्चा केवल ६२ सीटों तक सीमित रहा और बीजेपी ने मात्र २ सीटों पर जीत हासिल की।

2016 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने अकेले २११ सीटों पर जीत हासिल कर अपनी मजबूत स्थिति बनाई। भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद जनता ने ममता को ही चुना। बीजेपी ने वोट प्रतिशत 10.17 तक बढ़ाया।

2021 में बीजेपी ने ‘अबकी बार, 200 पार’ का नारा लगाया लेकिन सफलता नहीं मिली। तृणमूल ने 215 सीटें जीतीं और बीजेपी ने वोट प्रतिशत 38.13 तक पहुंचाया, परंतु सीट संख्या 77 ही रही।

2021 के नतीजों में सबसे चौंकाने वाला था भारतीय कांग्रेस और वामपंथी दल का शून्य सीट पर आना, जो लंबे समय तक राज्य सरकार का नेतृत्व करते आए थे।

सर्वेक्षण क्या कहते हैं?

इस बार भी तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है, विभिन्न सर्वेक्षणों में देखा गया है। अधिकतर सर्वेक्षणों में तृणमूल कांग्रेस को बढ़त मिलती दिख रही है।

‘मॅट्राइज’ अनुमान के अनुसार तृणमूल कांग्रेस को ४३ प्रतिशत और बीजेपी गठबंधन को ४१ प्रतिशत वोट मिलेंगे। ‘सी-भोटर’ सर्वेक्षण के मुताबिक तृणमूल को ४४ प्रतिशत और बीजेपी को ४० प्रतिशत वोट प्राप्त होंगे।

बीजेपी के नेता सुवेंदु अधिकारी और तृणमूल कांग्रेस के नेता एवं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

‘वोट भाइब’ और ‘सीएनएन–न्यूज़ १८’ के सर्वेक्षणों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस १८४ से १९४ सीटें हासिल कर आरामदायक बहुमत पा सकती है, जबकि बीजेपी ९८ से १०८ सीटें जीतने का अनुमान है।

मुख्यमंत्री पद के लिए अभी भी ममता बनर्जी मतदाताओं की पहली पसंद हैं, सर्वेक्षण दिखाते हैं। लगभग ४८.५ प्रतिशत मतदाताओं ने ममता का समर्थन किया जबकि ३३.४ प्रतिशत ने बीजेपी के नेता सुवेंदु अधिकारी को चुना। यह दर्शाता है कि ममता प्रदेश में अभी भी लोकप्रिय हैं।

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