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भारत और दक्षिण कोरिया की रक्षा साझेदारी पर बीजिंग की चिंता

१२ वैशाख, काठमाडौं। भारत और दक्षिण कोरिया ने अपनी रक्षा और आर्थिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के उद्देश्य से ऐतिहासिक रणनीतिक साझेदारी का विस्तार किया है। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्यांग की हाल ही की तीन दिवसीय भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हुई उच्च स्तरीय वार्ता ने दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत किया है। इस यात्रा के दौरान खास तौर पर जहाज निर्माण, रक्षा सामग्री उत्पादन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे भविष्य के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। राष्ट्रपति ली ने भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति का पूर्ण समर्थन करते हुए भारतीय रक्षा उपकरणों के उत्पादन, संचालन और तकनीक विकास में दक्षिण कोरिया की सक्रिय भूमिका निभाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

दोनों देशों के रक्षा सहयोग का सबसे सफल और सशक्त उदाहरण ‘के–९ वज्र’ १५५ एमएम सेल्फ-प्रोपेल्ड हाउइत्जर तोप को माना जाता है। दक्षिण कोरिया के ’के–९ थंडर’ डिजाइन पर आधारित यह तोप दक्षिण कोरियाई कंपनी हनवा एरोस्पेस से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के बाद भारत में ही उत्पादन किया जा रहा है। वर्तमान में भारतीय सेना के पास लगभग १०० ऐसे अत्याधुनिक तोपें हैं और अतिरिक्त १०० तोपें खरीदने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। भारतीय सेना की आवश्यकताओं के अनुसार मरुभूमि और लद्दाख जैसे उच्च हिमालयी इलाकों के लिए विशेष रूप से संशोधित इस तोप ने भारत की सैन्य क्षमता को बेहद मजबूत बनाया है।

भारत और दक्षिण कोरिया के बीच तोपखाना और विमान-रोधी तोपों के क्षेत्र में जारी इस सहयोग को चीन काफी ‘संवेदनशील’ नजरिए से देख रहा है, ऐसा विश्लेषकों का कहना है। हिमालय क्षेत्र में भारत और चीन के बीच लंबित सीमा विवाद के मद्देनजर दक्षिण कोरियाई अत्याधुनिक सैन्य तकनीक के जरिए भारतीय सेना का सशस्त्रीकरण बीजिंग के लिए रणनीतिक चुनौती बन गया है। भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता में वृद्धि और दक्षिण कोरिया जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश का भारत को समर्थन देना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में नए आयाम जोड़ने वाला पाया जा रहा है, जिसके कारण चीन इस संबंध को संशय की दृष्टि से देख रहा है।

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