
सुडान में यौन हिंसा का युद्ध में हथियार के रूप में उपयोग, गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न
सुडान में जारी संघर्ष में यौन हिंसा का सुनियोजित उपयोग गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन रहा है। जनवरी 2024 से नवंबर 2025 तक 3396 यौन हिंसा पीड़ितों ने उपचार प्राप्त किया है, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने का अनुमान है। सुरक्षा जोखिम और संसाधनों की कमी के कारण उपचार सेवा सीमित हो गई है, जिससे आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं, ऐसा संयुक्त राष्ट्र के निकायों ने बताया है। 16 अप्रैल, जिनेवा । सुडान में जारी संघर्ष के दौरान यौन हिंसा का युद्ध में हथियार के रूप में इस्तेमाल उसके शारीरिक प्रभावों से बढ़कर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट में परिवर्तित हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एजेंसियों तथा स्थानीय सहायता समूहों ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पीड़ितों के लिए तत्काल तथा दीर्घकालीन मनोसामाजिक समर्थन आवश्यक होने पर जोर दिया है।
अप्रैल 2023 से सूडानी सेना और अर्धसैनिक त्वरित सहायता बल (आरएसएफ) के बीच जारी भीषण संघर्ष में दसियों हजार लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि लगभग 11 मिलियन लोग विस्थापित हुए हैं। इसी हिंसात्मक माहौल में यौन अपराधों, जैसे बलात्कार को युद्ध का हथियार बनाया गया है, जैसा कि कई रिपोर्टों में उजागर किया गया है। चिकित्सा चैरिटी ‘डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ (एमएसएफ) के मुताबिक, जनवरी 2024 से नवंबर 2025 तक डारफर के उत्तर और दक्षिण क्षेत्रों में उनके संचालित स्वास्थ्य केंद्रों में कम से कम 3396 यौन हिंसा से बचे लोग इलाज के लिए आए। इनमें अधिकांश महिलाएं और किशोरियां हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस संख्या को वास्तविक स्थिति का केवल एक छोटा अंश बताया है।
डब्ल्यूएचओ के लैंगिक हिंसा विभाग की प्रमुख अवनी अमिन ने कहा कि यौन हिंसा के पीड़ितों को इलाज पाने में अत्यंत कठिनाई हो रही है। असुरक्षा, स्वास्थ्य संस्थाओं तक पहुंच में बाधा और इस प्रकार के मामलों से निपटने के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी ने समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। सामाजिक कलंक के कारण कई पीड़ित अपने अनुभव सार्वजनिक करने में असमर्थ हैं। उन्होंने कहा, ‘जब एक मामला सार्वजनिक होता है, तो बहुत सी महिलाएं चुपचाप दर्द सहते हुए रह जाती हैं।’
डारफर वुमन एक्शन ग्रुप की निमत अहमदी ने हिंसा के बाद उपचार खोजने वाली महिलाओं की भयावह स्थिति का वर्णन किया। सामूहिक बलात्कार के बाद बहुत सी महिलाएं गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं, विशेष रूप से फिस्टुला जैसी समस्याओं से पीड़ित हो जाती हैं। उन्होंने कहा, ‘‘शांतिपूर्ण समय में भी इन रोगियों के लिए पर्याप्त चिकित्सक नहीं थे, आज स्थिति लगभग जीरो हो गई है।’’ कई स्वास्थ्य संस्थान योद्धा समूहों के नियंत्रण में हैं, जिससे अपहरण और बलात्कार से बची महिलाएं अस्पताल जाने में डरती हैं। एक अस्पताल में आरएसएफ के लड़ाकुओं द्वारा स्वास्थ्यकर्मियों पर गोलीबारी और बलात्कार की घटना का उल्लेख करते हुए, उन्होंने बताया कि इसी दौरान इलाज के दौरान एक प्रसूता की मौत भी हुई।
सुरक्षा खतरों के कारण कई अंतरराष्ट्रीय सहायता संस्थान वापस लौट गए हैं और मानवीय सहायता में कटौती हुई है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है। संसाधनों की कमी के बावजूद, केवल कुछ छोटे स्थानीय महिला संगठन ही सेवाएं प्रदान कर पा रहे हैं, जो जोखिम को बढ़ा रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) ने भी सेवा अभाव के कारण पीड़ितों पर गंभीर प्रभाव होने की पुष्टि की है। यूएनएफपीए के मानवीय प्रतिक्रिया प्रमुख सोको अराकाकी ने कहा कि यौन हिंसा के बाद 72 घंटों के भीतर उपचार अत्यंत आवश्यक होता है, लेकिन फिलहाल दवाओं और सेवाओं की अभाव है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता विशेष रूप से बढ़ गई है। अराकाकी ने बताया कि ‘‘आत्महत्याओं की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।’’ ऐसी घटनाओं के आधिकारिक आंकड़ों को इकट्ठा करना कठिन है, लेकिन स्थानीय स्रोतों ने संकेत दिए हैं कि बलात्कार के डर या सामाजिक बहिष्कार से बचने के लिए महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं। डब्ल्यूएचओ की अवनी अमिन ने कहा कि जीवन रक्षा प्रयासों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य सहायता को प्राथमिकता देना आवश्यक है। ये संघर्ष के प्रभाव केवल तत्काल नहीं, बल्कि दीर्घकालीन और कई पीढ़ियों तक रहने वाले हैं, इसलिए व्यापक तैयारी और समर्थन प्रणाली का विकास तत्काल करना होगा।