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उठिवासको भयमा ५० लाख भूमिहीन – Online Khabar

उठिवास के डर से 50 लाख भूमिहीन परिवार प्रभावित

बर्दिया के सभी स्थानीय निकायों ने गैरकानूनी बस्तियों को खाली न करने के लिए संयुक्त विज्ञप्ति जारी की है। काठमांडू में डोजर चलाए जाने के बाद जिला प्रशासन ने वैशाख 18 से सुकुमवासी बस्तियों को खाली करने का निर्देश दिया है। भूमि समस्या समाधान आयोग ने 12 लाख 9 हजार 585 भूमिहीन परिवारों का लगत संग्रह पूरा होने की जानकारी दी है। 16 वैशाख, काठमांडू। बुधवार को बर्दिया के सभी स्थानीय तहों ने संयुक्त बयान जारी करते हुए गैरकानूनी बस्तियां खाली नहीं करने की चेतावनी दी। लुम्बिनी प्रदेश वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत डिवीजन वन कार्यालय ने वैशाख 14 को अतिक्रमित वन क्षेत्र खाली कराने का निर्देश दिया था। ‘संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत जारी यह सूचना लंबे समय से वन क्षेत्र के भीतर बसे नागरिकों के आवास अधिकार पर सीधा प्रभाव डालेगी,’ आठ पालिकाओं द्वारा जारी संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है। इस विज्ञप्ति पर मधुवन नगरपालिकाका मेयर तेजबहादुर भाट ने हस्ताक्षर किए जिन्होंने भूमिहीनों के आवास की रक्षा के लिए बार-बार अनुरोध किए जाने की बात कही। मधुवन नगरपालिकामें साढे चार हजार से अधिक भूमिहीन दलित, सुकुमवासी और अव्यवस्थित रूप से बसे परिवार हैं। ‘काठमांडू में डोजर चलने के बाद कई लोग जिज्ञासा व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश के चेहरे पर चिंता साफ झलकती है,’ मेयर भाट ने कहा। यह समस्या केवल बर्दिया की नहीं है, बल्कि रुपन्देही के देवदह नगर पालिका में भी मौजूद है। देवदह ने वैशाख 14 को 15 दिनों की सूचना जारी करते हुए तय समय में भूमि खाली न करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। देवदह के मेयर ध्रुवप्रसाद खरेल ने बताया कि काठमांडू से आए डोजरों के भय को देखकर उनके कार्यालय में भी भूमिहीन और अव्यवस्थित बस्तियों के निवासियों की चिंता बढ़ी है। ‘जिला प्रशासन कार्यालय द्वारा जारी सूचना सभी निवासियों के लिए नहीं है, यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं,’ खरेल ने कहा। मधेश प्रदेश के धनुषा के गणेशमान चारनाथ नगरपालिका-7 के कमला बाजार में सुकुमवासी लोगों को कमला सिंचाई कार्यालय ने 15 दिन के भीतर बस्ती खाली न करने पर कानूनी कदम उठाने की सूचना जारी की है। इसके अतिरिक्त पोखरा महानगरपालिकाने भी वैशाख 4 को सार्वजनिक जमीन और बिना अनुमति के अतिक्रमण करने वाले व्यक्तियों या परिवारों को 35 दिनों में हटने का निर्देश दिया था। काठमांडू में डोजर के चलने के बाद पोखरा की स्थिति भी भयभीत हो गई। जिला प्रशासन कार्यालय ने काठमांडू के सभी सुकुमवासी बस्तियों में वैशाख 18 से डोजर चलाने की सूचना जारी की है। सहायक प्रमुख जिल्ला अधिकारी मुक्तिराम रिजाल ने वैशाख 17 की शाम तक बस्ती खाली करने का आदेश दिया है। संयुक्त राष्ट्रीय सुकुमवासी मोर्चा के अध्यक्ष कुमार कार्की ने कहा कि काठमांडू की बस्तियां हटाए जाने के बाद पूरे देश में डर फैल गया है। उनके अनुसार, जो परिवारों के पास कोई जमीन का प्रमाणपत्र नहीं है, उनकी संख्या 70 लाख के करीब है जो गंभीर चिंता में हैं। ‘सेना परिचालन के कारण बस्तियां हटाए जाने से मानसिक रूप से हमें गहरा दर्द हुआ है। हमारा घर ही नहीं, मन भी टूट गया है,’ कार्की ने कहा, ‘देशभर के 70 लाख से अधिक लोग भयभीत हैं।’ भूमि समस्या समाधान आयोग के अनुसार 12 लाख 9 हजार 585 भूमिहीन और व्यवस्थित परिवारों से लगत संग्रह पूरा हो चुका है। राष्ट्रीय जनगणना 2078 के अनुसार देश में औसत परिवार आकार 4.37 है, जिससे अनुमानित 12 लाख परिवारों में 52 लाख से अधिक सदस्य होंगे। पुराने आयोगों द्वारा किया गया, लेकिन अधूरा प्रोसेस शामिल 86 हजार 400 परिवार की संख्या इसमें नहीं जोड़ी गई है। ‘यदि उन अधूरे रिकॉर्डों को भी जोड़ा जाए तो कुल समस्या प्रभावित परिवार 13 लाख तक पहुंच सकती है,’ आयोग के अध्यक्ष हरिप्रसाद रिजाल ने बताया। संयुक्त सुकुमवासी मोर्चा के अध्यक्ष कार्की ने बताया कि सेना और पुलिस द्वारा लगत संग्रह की जानकारी मिलने के बाद उनकी चिंता बढ़ी है। उन्होंने कहा, ‘हम सदैव संवाद और सहमति से समस्या का समाधान खोजने के पक्ष में हैं। भूमि सुधार कार्य को जबरन नहीं बल्कि कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया अपनाकर किया जाना चाहिए।’ बर्दिया के पालिकाओं ने भी सेना के परिपत्र का विरोध किया है। उन्होंने संयुक्त विज्ञप्ति में कहा है, ‘नेपाल सेना द्वारा वैशाख 12 को भेजा गया पत्र जिसमें सुकुमवासी बस्तियों के अद्यतन विवरण की मांग की गई है, वह कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया प्रतीत होता है।’ काठमांडू में डोजर चलने के बाद आयोग के सदस्य गोवर्धन कोली ने बताया कि भूमिहीन लोग जिलास्तर और केंद्र के कार्यालयों में आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। कोली ने सलाह दी कि सरकार को इस समस्या को गंभीरता से लेकर दीर्घकालीन समाधान तलाशना चाहिए। भूमिहीन दलित और सुकुमवासी को जमीन उपलब्ध कराने तथा अव्यवस्थित बस्तियों को व्यवस्थित करने के लिए संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था मौजूद है। भूमिहीनों को जमीन मिलने पर शुल्क देना होता है और अव्यवस्थित निवासियों को निर्धारित दस्तूर दिया जाना चाहिए। धार्मिक, सांस्कृतिक और सामरिक महत्व वाले क्षेत्र, नदियां, नहरें, निकुञ्ज, जंगल, प्राकृतिक जोखिम वाले क्षेत्र और जिन पर नामांकित मालिकी प्रमाणपत्र हैं, कानून के अनुसार ‘नकारात्मक सूची’ माने जाते हैं। ऐसे स्थानों को छोड़कर जहां वे निवास करते हैं, वहीं जमीन उपलब्ध कराना आयोग की मांग है। ‘जो लोग सभी प्रक्रियाएं पूरी करते हैं, उन्हें जमीन अवश्य दी जानी चाहिए, इसलिए नकारात्मक सूची में आने वालों को छोड़कर सभी को उनकी वर्तमान जगह ही जमीन देना सबसे बेहतर विकल्प है,’ कोली ने कहा। आयोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार भूमिहीन दलित 98,502, भूमिहीन सुकुमवासी 1,80,293 और अव्यवस्थित बस्ती के 9,30,790 परिवार हैं। सरकार ने 60 दिनों के भीतर लगत संग्रह और प्रमाणीकरण एवं 1000 दिनों में वास्तविक भूमिहीनों को जमीन उपलब्ध कराने का वचन दिया है। आयोग के अध्यक्ष रिजाल ने कहा कि इस कार्यान्वयन में संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। ‘देशभर के भूमिहीन लोग अभी भयभीत और चिंतित हैं,’ रिजाल ने कहा, ‘सरकार को सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर उचित व्यवस्थापन करना चाहिए।’ संयुक्त राष्ट्रीय सुकुमवासी मोर्चा के अध्यक्ष कार्की ने अपील की है कि कुछ सर्वोच्च अधिकारियों को दिखा कर पूरे देश के लाखों असली सुकुमवासियों को भ्रमित न किया जाए।

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