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प्रधानमंत्री बालेन के बयान से कर्मचारी नेताओं में असंतोष

प्रधानमंत्री वलेन्द्र शाह (बालेन) ने मंगलवार सुबह सोशल मीडिया के माध्यम से अपने कर्मचारियों को आश्वस्त करने का प्रयास किया, लेकिन वे उन्हें संतुष्ट नहीं कर सके। नेपाल निजामती कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष उत्तमकुमार कटुवाल ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “फेसबुक के जरिए आश्वासन दिया गया है, लेकिन अधिकारों को कम करने के लिए अध्यादेश लाया गया है। यह वैसा ही है जैसे पहले खाने दिया जाए और फिर गोलियां चलाई जाएं, अगर मारना ही है तो भूखे मरने दो।”
सरकार के अध्यादेश द्वारा कर्मचारियों के आधिकारिक ट्रेड यूनियन को खत्म किए जाने के बाद छह कर्मचारी संघों ने सोमवार को अदालत जाने की घोषणा की थी। अध्यक्ष कटुवाल ने अपनी दृढ़ता जाहिर करते हुए कहा, “बोलने और अधिकार मांगने का अधिकार होना चाहिए, कोई भी देश ऐसे अधिकार नहीं छीनता, नेपाल में ऐसा होना दुःखद है। इसके लिए हम कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।”
नेपाल निजामती कर्मचारी संगठन की अध्यक्ष भगवती न्यौपाने दाहाल ने भी बताया कि कानूनी सलाह और तैयारी चल रही है और जल्द ही अदालत का सहारा लिया जाएगा। उन्होंने कहा, “बोलने दो सरकार कहने वाले व्यक्ति प्रधानमंत्री बने, मुझे नहीं लगा था कि वे हमारे बोलने के अधिकार को इस तरह काटेंगे।” कर्मचारी संस्थाएं अधिकार छीनने का आरोप लगा रही हैं, जो संविधान, नियम, कानून, अंतरराष्ट्रीय मान्यता, अभ्यास, संधि और महासंधि के खिलाफ है, उनका दावा है।
हालांकि प्रधानमंत्री बालेन का कहना है कि अध्यादेश से कर्मचारियों के अधिकार छिने नहीं जाएंगे। अध्यादेश के तहत किए गए कानून संशोधन में निजामती कर्मचारियों की शिकायत सुनवाई की व्यवस्था की गई है। इसमें किसी भी कर्मचारी को समस्या होने पर लिखित या मौखिक रूप से कार्यालय प्रमुख के समक्ष शिकायत दर्ज करने का प्रावधान है। यदि निर्णय से संतुष्टि नहीं होती है तो पुनरावलोकन कराया जा सकता है और फिर भी समस्या बनी तो कानून के अनुसार कदम उठाए जाएंगे। प्रधानमंत्री ने इस विषय पर कहा, “यह अधिकार नहीं छिनाता, बल्कि पेशागत स्वतंत्रता को मजबूत करता है। अब नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति का आधार दलगत नजदीकता नहीं बल्कि विधि, क्षमता और दक्षता होगा।”

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