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महासचिव शङ्कर पोखरेल ने संसद् अधिवेशन स्थगन और प्रधानन्यायाधीश सिफारिश पर की आलोचना

नेकपा एमाले के महासचिव शङ्कर पोखरेल ने संसद् अधिवेशन को स्थगित कर अध्यादेश के माध्यम से प्रधानन्यायाधीश की सिफारिश को संवैधानिक परिषद के निर्णय का नतीजा बताया है। पोखरेल ने कहा कि सरकार द्वारा वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी कर प्रधानन्यायाधीश की सिफारिश की गई है, जो न्यायालय को अपनी प्रभावक्षेत्र में रखने का प्रयास है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस कदम से संसदीय लोकतंत्र में शक्ति संतुलन कमजोर होगा और देश अधिनायकवादी मार्ग पर प्रवेश करने का जोखिम बढ़ाएगा। २५ वैशाख, काठमाडौं।

पोखरेल ने कहा कि पहले से आह्वान किए गए संसद् अधिवेशन को स्थगित कर अध्यादेश के माध्यम से निर्णय लेना केवल प्रक्रिया के विषय नहीं बल्कि इसके उद्देश्य पर भी सवाल उठता है। उन्होंने कहा, ‘इसका स्पष्ट संकेत संवैधानिक परिषद के निर्णय में परिलक्षित हुआ।’ न्यायालय जैसी गरिमामय संस्था में तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी कर प्रधानन्यायाधीश की सिफारिश असामान्य घटना है। यह दर्शाता है कि सरकार न्यायालय को स्वतंत्र निकाय की बजाय अपने प्रभाव के तहत रखने की कोशिश कर रही है।

‘पिछले दिनों जब न्यायालय पर राजनीतिकरण का आरोप लगता रहा, तब न्यायिक सक्रियता अधिकतर सरकार के विरुद्ध दिखी,’ पोखरेल ने कहा, ‘शायद वर्तमान सरकार अब न्यायालय में अपने पक्ष में न्यायिक पक्षपात स्थापित करने की कोशिश कर रही है।’ उन्होंने कहा कि इससे संसदीय लोकतंत्र में शक्ति संतुलन कमजोर होगा और देश अधिनायकवादी पथ पर फंसने का खतरा बढ़ेगा। वे पिछले राजनीतिक घटनाक्रम को याद करते हुए बोले, ‘भाद्र २३ और २४ की गलत प्रवृत्तियों के खिलाफ समय रहते दृढ़ता से खड़ा न हो पाने के कारण समाज और राष्ट्र को इसका दुख अभी भी भुगतना पड़ रहा है।’

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