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यात्रा से पहले दही खिलाने की परंपरा: अंधविश्वास या वैज्ञानिक तथ्य?

समाचार सारांश

समीक्षा की गई।

  • आयुर्वेद के अनुसार दही उष्णवीर्य, रुचिकर, ग्राही, वातनाशक और पुष्टिवर्धक गुणों से यात्राकाल में पाचन में सुधार और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

हमारी नेपाली संस्कृति में यात्रा शुरू करने से पहले दही खिलाने की परंपरा बहुत पुरानी और लोकप्रिय है। यात्रा से पहले दही खिलाने से शुभ लाभ होने, यात्रा सफल और कार्य सिद्ध होने का विश्वास प्रचलित है। हालांकि इसमें वैज्ञानिक आधार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार दही के गुण इस प्रकार हैं:

आयुर्वेद शास्त्रों में दही को ‘दधि’ कहा गया है और इसके गुणों का विस्तृत वर्णन किया गया है। यात्रा के संदर्भ में आयुर्वेद दही को क्यों महत्वपूर्ण मानता है, यह निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है:

१. उष्णवीर्य

कई लोग दही खाने पर ठंडक महसूस करते हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार दही उष्ण (गर्म) प्रकृति का वीर्य होता है। यह शरीर की जठराग्नि अर्थात पाचन अग्नि को प्रज्ज्वलित करता है और यात्रा के दौरान अपच होने से बचाता है।

२. रुचिकर

शास्त्रीय ग्रंथों में दही को ‘रुच्य’ कहा गया है, जिसका अर्थ है दही खाने की इच्छा बढ़ाता है और मुँह के स्वाद को बेहतर बनाता है। यात्रा के तनाव के कारण कभी-कभी भूख कम होने की स्थिति में दही भूख बढ़ाने में सहायक होता है।

३. ग्राही

दही का एक विशेष गुण ‘ग्राही’ है, जिसका मतलब है यह आंत से अतिरिक्त पानी सोखने और दस्त को रोकने में उपयोगी होता है। यात्रा के दौरान सामान्य दस्त या पेट की गड़बड़ी को रोकने में यह गुण बहुत महत्वपूर्ण है।

४. वातनाशक

यात्रा के दौरान शरीर में ‘वात’ दोष बढ़ सकता है, जिससे शरीर में दर्द, गैस बनना और थकावट होती है। दही वात दोष को शांत करता है जिससे यात्रा आरामदायक बनती है।

५. पुष्टिवर्धक

आयुर्वेद के अनुसार दही शरीर के धातुओं को पोषण देता है और ओज या रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, जिससे यात्रा के लिए आवश्यक शारीरिक बल मिलता है।

आयुर्वेद में दही और पानी के मिश्रण से विभिन्न प्रकार के दही बनाए जाते हैं। पानी की मात्रा और मंथन प्रक्रिया के आधार पर दही के गुण बदलते हैं। यात्रा या दैनिक जीवन के लिए किस प्रकार का दही उपयुक्त है, यह वर्गीकरण जानना लाभकारी है।

आयुर्वेद के अनुसार पानी की मात्रा और चलाने की विधि के आधार पर दही के प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं:

१. तक्र

इसे पाचन का अमृत माना जाता है। आयुर्वेद में कहा गया है “भोजनान्ते पिबेत तक्रं” अर्थात भोजन के अंत में तक्र (मोही) पीना चाहिए। १ भाग दही में १/४ भाग पानी मिलाकर तक्र बनाया जाता है। यह लघु (पचाने में आसान) प्रकार का होता है और ग्रंथि, पाइल्स तथा पेट फूलने की समस्या को दूर करता है। यात्रा के दौरान पेट भारी होने की समस्या हो तो तक्र सबसे अच्छा माना गया है।

२. घोल

दही को केवल फेंटकर बनाया गया घोल वात और पित्त नाशक होता है। यह थोड़ा गाढ़ा होता है और पचाने में समय लगता है।

३. छच्छिका

दही में पर्याप्त पानी मिलाकर छाछ बनाई जाती है। यह बहुत पतली और पेय पदार्थ के रूप में उपयोग होती है। यह तुरंत तृष्णा को शांत करता है और लंबी पैदल यात्रा या कठोर परिश्रम से पहले शरीर में पानी की कमी से बचाता है।

सावधानी

आयुर्वेद दही खाने के समय कुछ नियमों का पालन करने की सलाह देता है। रात के समय दही का सेवन कम करने की सलाह दी जाती है। दही में हमेशा चीनी, शहद, घी या मूंग दाल मिलाकर लेने की परंपरा अच्छी मानी जाती है। यात्रा से पहले दही में चीनी मिलाकर खाने की हमारी परंपरा भी है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी दही को ‘सुपरफूड’ के रूप में स्वीकार किया है। इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्व और प्रोबायोटिक्स के कारण दही स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है।

आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक अनुसार दही के लाभ इस प्रकार हैं:

१. प्रोबायोटिक्स और आंत का स्वास्थ्य

दही में पाए जाने वाले जीवित संस्कृतियों को प्रोबायोटिक्स कहा जाता है। ये बैक्टीरिया आंत में माइक्रोबायोम का संतुलन बनाए रखते हैं और गैस्ट्रिक, कब्जियत तथा दस्त जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती प्रदान करता है।

२. पोषक तत्वों का भंडार

दही में लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। कैल्शियम और फास्फोरस हड्डी और दांतों को मजबूत करने के लिए उपयोगी हैं, विटामिन बी12 और राइबोफ्लेविन हृदय रोग और तंत्रिका तंत्र की सुरक्षा करते हैं और पोटैशियम एवं मैग्नीशियम रक्तचाप नियंत्रित करने में मदद करते हैं।

३. प्रोटीन का उत्कृष्ट स्रोत

दही में आसानी से पचने वाला प्रोटीन होता है। यह मांसपेशियों की मरम्मत में मदद करता है और पेट को लंबे समय तक तृप्त रखता है जिससे वजन नियंत्रण में सहायता मिलती है।

४. लैक्टोज इनटॉलरेंस में उपयोगी

कई लोगों को दूध पचाने में समस्या होती है, लेकिन दही के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले बैक्टीरिया दूध में मौजूद लैक्टोज को लैक्टिक एसिड में परिवर्तित करते हैं जिससे दूध न पचा सकने वाले लोगों के लिए भी दही सुरक्षित और उचित विकल्प बनता है।

५. मानसिक स्वास्थ्य और ‘गट-ब्रेन एक्सिस’

हाल के अनुसंधानों ने पेट के स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध दिखाया है। दही में पाए जाने वाले प्रोबायोटिक्स तनाव और अवसाद के लक्षणों को कम करने में सहायक पाए गए हैं।

(लेखक डॉ. देवराज क्षेत्री, दाङ स्थित नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय केन्द्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के उपप्राध्यापक हैं)

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