
प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह : बालेन के न बोलने से संसद की सहजता में कमी
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बुधवार प्रतिनिधि सभा के कार्यसूची आने के बाद प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह ‘बालेन’ के संसद में जवाब देने की चर्चा हुई।
प्रधानमंत्री ने ‘नीति तथा कार्यक्रम पर आधारित चर्चा शुरू करने का प्रस्ताव प्रस्तुत करने और उस दौरान उठे प्रश्नों के उत्तर देने’ की बात कही गई थी।
‘अगर बोलना होगा तो बालेन’ जैसे प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर आईं। लेकिन वह ज्यादा समय तक नहीं टिकीं। प्रतिनिधि सभा की बैठक शुरू हो गई, पर सिंहदरबार के अंदर ही मंत्रिपरिषद की बैठक जारी थी।
सभापति डोलप्रसाद अर्याल से आकस्मिक समय में कांग्रेस संसदीय दल के सचेतक निश्कल राई ने याद दिलाया कि उनके दल के नेता ने मंगलवार की बैठक में सदन में प्रधानमंत्री की मौजूदगी की मांग की थी।
“आज भी स्थिति वैसी ही है, संसद में माननीय प्रधानमंत्री नजर नहीं आ रहे,” उन्होंने मांग की, “इसलिए मैं सभापति महोदय से हार्दिक अनुरोध करता हूँ कि तत्काल माननीय प्रधानमंत्री को रूलिंग देकर सभापति के सामने बुलाया जाए।”
‘प्रधानमंत्री कहाँ हैं?’: बैठक में विपक्षी का प्रश्न
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मंत्रिपरिषद की बैठक खत्म होने के बाद भी प्रधानमंत्री बालेन संसद की बैठक में नहीं पहुंचे। तब तक अर्थमंत्री स्वर्णिम वाग्ले पहुंच चुके थे। सभापति अर्याल ने प्रधानमंत्री की ओर से उन्हें चर्चा शुरू करने का प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति दी।
फिर विपक्षी दल के सांसदों ने बैठक अवरुद्ध कर दी, उन्होंने प्रधानमंत्री की मौजूदगी बिना बैठक चलने नहीं देने का अड़ान लिया।
“क्या प्रधानमंत्री को यहां आने से किसी ने रोका है? वे कहाँ हैं? पहले तो ये सारी बातें सदन को पता होनी चाहिए थीं,” एमाले सांसद गुरुप्रसाद बराल ने कहा, “अगर प्रधानमंत्री के आने में कोई उचित कारण है तो उन्होंने जिस व्यक्ति को तोंका है वही प्रस्ताव प्रस्तुत करे।”
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राप्रपा संसदीय दल के नेता ज्ञानेन्द्रबहादुर शाही ने भी कहा कि प्रधानमंत्री संसद की बैठक में न आ सकने के लिए व्यस्त तो होना चाहिए, कोई और काम तो नहीं हो सकता, इसलिए उपस्थित कराना जरूरी है और सभापति को रूलिंग करनी चाहिए।
“नीति और कार्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा छोड़कर, प्रधानमंत्री यहां से व्यस्त कहां होंगे? यदि उन्होंने अपनी स्वयं की नीति और कार्यक्रम पर चर्चा नहीं सुननी है तो यह प्रश्न उठता है कि इसे किसने प्रस्तुत किया?” सांसद शाही ने कहा।
“इससे बड़ा कोई काम नहीं हो सकता।”
कांग्रेस सांसद अर्जुननरसिंह केसी ने संसद की नियमावली का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने जो मंत्री तोकते हैं, उन्हें प्रस्ताव प्रस्तुत करने दिया जाना चाहिए।
लेकिन बहस और विवाद के बढ़ने पर कांग्रेस संसदीय दल के नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने अवरोध का समाधान निकालने के लिए कुछ समय के लिए बैठक स्थगित करने का सुझाव सभापति को दिया।
प्रधानमंत्री का चेहरा देखना है?
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सभापति अर्याल ने बैठक को 15 मिनट के लिए स्थगित किया। बैठक निर्धारित समय से देरी से शुरू हुई, विपक्षी ने अर्थमंत्री को प्रस्ताव प्रस्तुत करने की सहमति दी तब जाकर बैठक आगे बढ़ी।
लेकिन कांग्रेस संसदीय दल के नेता आङ्देम्बे ने कहा कि चर्चा के दौरान उठे प्रश्नों के उत्तर देने में प्रधानमंत्री की अनिवार्य उपस्थिति के लिए सभापति को रूलिंग करनी चाहिए, इस पर लंबी बहस हुई।
नियमावली में लिखा है, “प्रश्नों के जवाब चर्चा के अंत में प्रधानमंत्री या उनकी अनुपस्थिति में उनसे अधिकृत मंत्री द्वारा दिये जायेंगे।”
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी रास्वप के प्रमुख सचेतक कविंद्र बुर्लाकोटी ने इसी को आधार बना कर चर्चा आगे बढ़ाने का तर्क दिया।
स्थगन के दौरान उस अनुसार चर्चा आगे बढ़ाने की सहमति हुई, बुर्लाकोटी ने बताया, “या तो प्रधानमंत्री का चेहरा देखना चाहिए, नहीं तो प्रस्ताव प्रस्तुत करने देना चाहिए और चर्चा को अवरुद्ध न करना चाहिए। मिश्रित दृष्टिकोण आवश्यक नहीं है।”
‘समाज चाहता है प्रधानमंत्री की बात सुने, पांच साल तक चुप रहेंगे?’
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सभापति ने नियमावली का हवाला देते हुए विपक्ष से अनुरोध किया कि अवरोध न करें, लेकिन उनकी बात न सुनते हुए बैठक फिर से स्थगित हो गई।
माओवादी केंद्र के सांसद युवराज दुलाल ने कानूनी तर्क देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को संसद से नहीं हटाया जा सकता।
“क्या नियमावली दिखाने के बाद भी संसद में माननीय प्रधानमंत्री की आवाज़ पांच साल तक नहीं सुनी जाएगी?” उन्होंने कहा, “हम ही नहीं, पूरा जनता और समाज प्रधानमंत्री की आवाज सुन रहा है।”
उन्होंने संविधान की धारा ७६ (१०) का हवाला दिया, जिसमें लिखा है कि “प्रधानमंत्री और मंत्री सामूहिक रूप से संघीय सांसदों के प्रति उत्तरदायी होते हैं।”
“क्या कहीं इस व्यवस्था का मज़ाक नहीं उड़ाया जा रहा?”
प्रधानमंत्री शाह अपनी पार्टी रास्वप की बैठक में भी उपस्थित नहीं नजर आए।
सभापति अर्याल ने नीति तथा कार्यक्रम पर चर्चा के बाद प्रधानमंत्री से परामर्श करने का आश्वासन दिया है।
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