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‘डुबिन्छ’ भन्ने थाहा हुँदाहुँदै किन बन्छन् फिल्म ?

‘डूबने’ का अंदेशा होते हुए भी फिल्में क्यों बनती हैं?

समाचार सारांश

  • नेपाल में 30 लाख की लागत से बनी फिल्म जब 1 करोड़ की ग्रॉस कलेक्शन करती है, तब भी निर्माता का वास्तविक मुनाफा लगभग 2 लाख 25 हजार होता है।
  • चलचित्र विकास बोर्ड के अनुसार ‘परालको आगो’ ने 4 करोड़ 25 लाख, ‘राम नाम सत्य’ ने 3 करोड़ 40 लाख और ‘पहाड’ ने 63 लाख की कमाई की है।
  • नेपाल की फिल्म इंडस्ट्री में नए निर्माता लगातार आ रहे हैं, लेकिन कई बार उद्योग की वास्तविकता न समझ कर निवेश करने से घाटा होता है।

एक फिल्म ने 15 करोड़ की कमाई की। करोड़ के आंकड़े सुनते ही कई लोगों को लगता है — बाकी सब छोड़कर फिल्म बनाना बड़ा लाभकारी काम है।

2-3 करोड़ की लागत वाली फिल्म ने 10 करोड़ की कमाई की तो हमारे कान खड़े हो जाते हैं। मन में एक पल के लिए यही विचार आता है कि फिल्म से करोड़ों की कमाई होती है।

लेकिन वास्तविकता कुछ अलग होती है। मान लीजिए किसी फिल्म ने 1 करोड़ की कमाई की, अब उसका हिसाब लगाते हैं।

सबसे पहले 13 प्रतिशत वैट कटौती होती है, जिसके बाद लगभग 87 लाख बचते हैं। फिर 5 प्रतिशत स्थानीय विकास कर देना होता है, जिससे लगभग 82 लाख तक पहुंचती है।

अब इस राशि को हल संचालक और निर्माता के बीच 50-50 प्रतिशत बांटा जाता है, जिससे निर्माता को 41 लाख मिलते हैं। इसके बाद वितरक का हिस्सा आता है, जिसने एडवांस लिया हो तो कटौती होती है, अन्यथा कम से कम 5 प्रतिशत कमीशन जाता है। इस प्रक्रिया के बाद निर्माता के पास लगभग 36 लाख रुपये बचते हैं।

इसके अलावा हल में फिल्म रिलीज के लिए लगने वाले सर्वर चार्ज, तकनीकी शुल्क आदि खर्च जुड़ते हैं। मान लें 3 लाख का खर्च हुआ, तो आखिरकार निर्माता के पास लगभग 33 लाख रुपये रहते हैं।

अगर फिल्म बनाने में 30 लाख खर्च हुए हों, तो मुनाफा सिर्फ 3 लाख होगा, जिस पर 25 प्रतिशत मुनाफा कर देने के बाद निर्माता का असली मुनाफा लगभग 2 लाख 25 हजार रुपये होता है।

इसी प्रकार, ग्रॉस कलेक्शन की रकम फिल्म रिलीज के बाद एक-दो हफ्ते में निर्माता को नहीं मिलती, कई बार यह प्रक्रिया 1 से 6 महीने तक भी चल सकती है।

फिर सोचिये — फिल्म निर्माण से पहले व दौरान निर्माता द्वारा महीनों किया गया श्रम, लगाई गई पूंजी पर ब्याज, विभिन्न स्थानों पर घूमना-फिरना, भोजन, आवास तथा अन्य खर्चों को जोड़कर कुल लागत कितनी होगी? आप अंदाजा लगा सकते हैं।

नेपाल में 30 लाख की लागत वाली फिल्म यदि 1 करोड़ की ग्रॉस कलेक्शन भी करे, तब भी कई बार निर्माताओं को घाटा उठाना पड़ता है।

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अब २०७९ वैशाख में रिलीज हुई कुछ फिल्मों की कमाई देखें।

चलचित्र विकास बोर्ड के अनुसार, ‘परालको आगो’ ने 4 करोड़ 25 लाख 466 रुपए का ग्रॉस कलेक्शन किया है। ‘राम नाम सत्य’ ने 3 करोड़ 40 लाख 81 हजार 691 रुपए और ‘पहाड’ ने 63 लाख 93 हजार 152 रुपए कमाए हैं। ‘लालीबजार’ की आधिकारिक आय अभी तक उपलब्ध नहीं है।

निर्माताओं को असली लागत का अंदाजा होगा, पर चलचित्र विकास बोर्ड द्वारा जारी वार्षिक आय के आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं।

अब स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है — इन आय से निर्माताओं को कितना लाभ हुआ होगा? इसका उत्तर इतना जटिल नहीं है। प्रारंभिक आय को समझने के बाद निर्माता की असली कमाई का अंदाजा करना आसान होता है।

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दुनिया भर में फिल्म उद्योग जोखिम भरा माना जाता है, लेकिन विकसित देशों में निर्माता विभिन्न आर्थिक स्रोतों के सहारे आगे बढ़ते हैं।

ओटीटी अधिकार, सैटेलाइट, टीवी राइट्स, डिजिटल स्ट्रीमिंग, विदेशी प्रदर्शन अधिकार, ब्रांड साझेदारी, म्यूजिक राइट्स, यूट्यूब आय, वितरण समझौते, अग्रिम निवेश और साझेदारी से निर्माता सुरक्षित रहते हैं।

लेकिन नेपाल में ऐसी सुविधाएं सीमित हैं। सोशल मीडिया और मीडिया पर नजर डालें तो लगता है कि यहां करोड़ों की कमाई होती है, पर ये कमाई सुपरहिट फिल्मों को छोड़कर कम फिल्में ही जुटा पाती हैं। बाहर दिखने वाली कमाई और वास्तविक कमाई में बड़ा फर्क है।

फिर भी, नेपाल में फिल्म निर्माण कभी बंद नहीं हुआ। कई निर्माता घाटे में हैं; कुछ कर्ज के जाल में फंसे हैं, कुछ संपत्ति बेच कर कर्ज चुकाने की कोशिश में हैं, और कुछ भागती-दौड़ती हालत में हैं।

तो आखिर क्यों बनने लगती हैं फिल्में? कौन और किस कारण ऐसे जोखिम उठाता है? निर्माता शुरुआत में सब समझकर फिल्म बनाते हैं या बाद में असली हालात पता चलते हैं?

ये सवाल गंभीर हैं। इन्हें नजरअंदाज किया गया तो नेपाली फिल्म उद्योग में निर्माताओं की आपबीती लंबे समय तक चलेगी और उद्योग को प्रगति मुश्किल होगी।

यहां बनने वाली फिल्मों की चर्चा आम होती है, लेकिन असफलता के बाद निर्माताओं की कहानी आमतौर पर बाहर नहीं आती। इसलिए नए चेहरे लगातार फिल्म उद्योग में आ रहे हैं।

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नेपाली फिल्म उद्योग में निवेश करने वाले निर्माता मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं — एक जो क्षेत्र को अच्छी तरह समझकर सालों से फिल्में बना रहे हैं, और दूसरा जो सुनकर, दूसरों के प्रभाव या उत्साह में आकर निवेश करते हैं, जिन्हें उद्योग की वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता।

नए निर्माता लगातार आ रहे हैं, लेकिन उनकी उम्मीदें क्या हैं और बाद में वे क्या स्थिति में हैं, इस पर गंभीर चर्चा कम होती है।

एक निर्माता दो-तीन फिल्मों के बाद हार मानने वाला कम ही होता है, जबकि निर्देशक या लेखक यह कहते हैं कि ‘फिल्मों से करोड़ों कमाई होती है,’ ‘हमारे दोस्त तो कमा चुके हैं,’ जिससे नए निवेशक उत्साहित हो जाते हैं।

फिल्म क्षेत्र के जानकार कहते हैं कि यह वास्तविकताओं को निवेशकों से छिपाना ठीक नहीं। झूठे सपने दिखाने से नहीं, बल्कि यथार्थ सामने रख कर ही स्वस्थ उद्योग विकसित किया जा सकता है।

स्क्रिप्ट लेखक प्रदीप भारद्वाज के अनुसार नए निर्माता आना समय के साथ बदलाव का परिचायक है। ‘आज के पुराने निर्माता भी कभी नए थे,’ वह कहते हैं। पुराने रास्ते छोड़कर समाचार का रास्ता चुना, जिसका समय अधिक लगा।

फिल्म लेखक और निर्देशक मनोज पंडित की राय में यह स्थिति भिन्न है। वे मानते हैं कि नए निर्माताओं की लगातार बढ़ती संख्या को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, पर यह दुर्भाग्यपूर्ण रूप से कम होती है।

उनके अनुसार, ‘निर्माता डूब रहे हैं, कई उद्योग की स्थिति नहीं समझते, फिर भी नए लगातार आ रहे हैं। यह अजीब स्थिति है।’

रविंद्रसिंह बानियाँ भी फिल्म उद्योग की असली स्थिति को कई लोग नहीं समझते बताते हैं। बाहरी कलेक्शन और असली कमाई में बड़ा अंतर होता है। आमतौर पर 10 करोड़ की ग्रॉस कलेक्शन में निर्माता के हाथ में लगभग 3 करोड़ ही आते हैं।

उद्योग में निवेश शारीरिक जोखिम की तरह है। अगर रेस्तरां डूब जाए तो कम से कम टेबल-फर्नीचर बेचकर निवेश वापस किया जा सकता है, लेकिन फिल्म डूबे तो अंत में हार्डडिस्क बचती है, बानियाँ कहते हैं।

यदि उद्योग में मुनाफा आसान होता, तो बड़े कारोबारी खुलकर इस क्षेत्र में क्यों नहीं आ रहे? सफलता की संभावना बहुत कम है। जुआ खेलने में जीतने की संभावना अधिक है, फिल्म उद्योग में 5 प्रतिशत से भी कम।

यह वास्तविकता स्पष्ट हुए बिना नए निर्माता आने का सिलसिला नहीं रुकेगा, उनकी सोच है।

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नेपाल में हर साल करीब 70 से 100 फिल्में बनती हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही व्यावसायिक सफलता पाती हैं। बाजार के अनुसार 5 से 8 प्रतिशत फिल्मों का ही निवेश उठ पाता है, बाकी घाटे में जाती हैं।

ऐसे में सवाल उठता है — इतनी ज्यादा निवेश डूबने की संभावना होने के बाद भी निर्माता फिल्म बनाने क्यों आते हैं?

पुराने और अनुभवी निर्माता ही सीमित निवेश दोहराते हैं, नई फिल्मों में नए निर्माता मिलते हैं। एक- दो ब्लॉकबस्टर फिल्मों से ‘फिल्म में पैसा है’ का भ्रम फैलता है, लेकिन वास्तविकता कड़ी है।

एक फिल्म असफल होने पर सामान्य घाटा नहीं बल्कि 1 से 3 करोड़ तक का नुकसान होता है। नेपाल जैसे अर्थव्यवस्था में यह राशि बड़ी होती है। कुछ निर्माता फिर कभी वापस नहीं आ पाते, और जो आते हैं वे भी दयनीय स्थिति में होते हैं।

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फिल्म निवेश सुरक्षित नहीं है, इसकी मुख्य वजह व्यवस्थित बाजार का अभाव है। पूरे नेपाल में कुछ ही सिनेमाघर हैं। मौजूदा हल में भी नेपाली फिल्मों को टिकने संघर्ष करना पड़ता है। हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों का प्रभुत्व अधिक है। दर्शकों की पसंद भी जल्दी बदल रही है, पर नेपाली फिल्मकर्मी इसके साथ तालमेल बिठा पाने में असमर्थ हैं।

कई निर्माता ग्लैमर, चर्चा, फोटो और नाम कमाने का सपना लेकर इस क्षेत्र में आते हैं, लेकिन फिल्म उद्योग गहराई से अध्ययन, बाजार की समझ और रणनीति के साथ आगे बढ़ने वाला व्यवसाय है। भावनात्मक निर्णय से निवेश जोखिमपूर्ण हो जाता है।

अंतरराष्ट्रीय फिल्म उद्योग से तुलना करने पर नेपाल की स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। हॉलीवुड, बॉलीवुड, दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में भी फिल्में असफल होती हैं, लेकिन उनके पास बड़ा बाजार, मजबूत वितरण प्रणाली, डिजिटल प्लेटफॉर्म और विश्वव्यापी पहुंच होती है। एक बार असफल होने पर भी जोखिम प्रबंधन के विकल्प मौजूद होते हैं।

नेपाल में बाजार छोटा, निवेश सीमित और दर्शक कम हैं। कई निर्माता बिना व्यवसाय योजना के भावनात्मक निर्णय पर चलते हैं।

इन्हीं कारणों से कई निर्माता एक बार असफल होने पर लौट नहीं पाते। पुराने निर्माता गायब हो रहे हैं, नए लगातार आ रहे हैं। फिल्म की असली आमदनी और घाटे के आंकड़े सार्वजनिक नहीं होने से भ्रम बना रहता है।

कुछ लोग यह आरोप भी लगाते हैं कि व्यक्तिगत स्वार्थ और संबंधों के कारण ऐसा संवेदनशील विषय खुलकर नहीं उठाया जाता।

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