
‘सरकार पर भरोसा नहीं, सड़क नहीं छोड़ेंगे’
४ जेठ, बुटवल । कैलाली के बाद सबसे अधिक अव्यवस्थित आवासीय और भूमिहीन सुकुमवासी होने वाले रुपन्देही में रास्वपा के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद रविवार को दूसरी बार बड़ा प्रदर्शन आयोजित हुआ। इससे पहले वैशाख २४ को विरोध प्रदर्शन किया गया था। सरकार ने सार्वजनिक जमीन संरक्षण के लिए डोजर चलाने के बाद अव्यवस्थित आवासीय व भूमिहीन लोग आक्रोशित हो गए हैं। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की अध्यक्षता वाली सरकार द्वारा स्वीकृत १०० बिंदुओं वाली कार्यसूची में सुकुमवासी समस्या को १००० दिनों में हल करने का उल्लेख है। चैत १३ को सरकार ने ६० दिनों के भीतर प्रमाणीकरण पूर्ण करने की प्रतिबद्धता जताई थी। सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से भूमि समस्या समाधान आयोग को भी समाप्त कर दिया है।
पूर्व आयोगों द्वारा किए गए कार्यों को मान्यता न देने तथा अव्यवस्थित आवासीय और भूमिहीन सुकुमवासी की व्याख्या और वर्गीकरण गलत तरीके से किए जाने के कारण सरकार पर भरोसा न कर आंदोलन की राह चुननी पड़ी, यह सरोकारवालों का कहना है। सर्वोच्च अदालत ने वैशाख २५ को अंतरिम आदेश दिया था कि सुकुमवासी बस्तियों में डोजर न चलाया जाए, लेकिन २६ को कोहलपुर में डोजर चलाए जाने से अव्यवस्थित व भूमिहीन सुकुमवासी में संदेह और डर पैदा हुआ है। लगभग दो तिहाई बहुमत वाली मजबूत सरकार के पास पाँच साल काम करने का अवसर होते हुए भी बस्तियों में डोजर चलाना, अदालत के आदेश का उल्लंघन करना और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थाओं की सिफारिशों को नजरअंदाज करते हुए सरकार के आगे बढ़ने से लाखों नागरिक आतंकित हो गए हैं, बुटवल के भूमिहीन वीरेन्द्र विक ने बताया।
‘पाँच साल काम करने का जनादेश पाने वाली सरकार ने बिना उचित प्रबंधन की तैयारी के जल्दबाजी में ऐसा कदम उठाया जिससे इस सरकार का सही दिशा में चलना संभव नहीं लगा,’ विक ने कहा, ‘अदालत के आदेश, संयुक्त राष्ट्र संघ के सुझावों को न सुनने और न मानने वाली सरकार अव्यवस्थित आवासीयों का प्रबंधन नहीं कर पाएगी, इसलिए आंदोलन करना पड़ा।’ उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश से समस्या और जटिल होने का संदेह है, राज्य पक्ष से ही अदालत के आदेश का उल्लंघन होने के कारण सरोकारवालों के साथ चर्चा कर न्यायसंगत समाधान न मिलने तक आंदोलन जारी रहेगा।
दाङ के हरिस गिरि ने भी कहा कि सरकार ने जो अध्यादेश लाया है उसमें अव्यवस्थित आवासीय और भूमिहीन सुकुमवासियों की व्याख्या और वर्गीकरण गलत है, जिससे फिर लाखों लोग सुकुमवासी बनेंगे। ‘संसद को छलकर लाए गए अध्यादेश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें अव्यवस्थित और भूमिहीन सुकुमवासियों की व्याख्या और वर्गीकरण गलत है,’ गिरि ने कहा। उन्होंने कहा कि तीन पीढ़ियों तक जमीन न होने वाले लोगों को ही जमीन मिलने का प्रावधान अव्यवहारिक, अवैज्ञानिक और अन्यायपूर्ण है।
‘जनता ने रास्वपाल को सुकुमवासी की दुविधा बनाने और आत्महत्या के लिए मजबूर करने के लिए मत नहीं दिया है,’ गिरि ने कहा। वर्षों से बस्तियों में सरोकारवालों के साथ संवाद और सहमति के बिना डोजर चलाने का काम नहीं रुका तो पूरे देश के सुकुमवासी और अव्यवस्थित आवासीय सिंहदरबार केंद्रित आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। बुटवल के रिसब पोखरेल ने बताया कि शुरू में सभी जमीनें सरकारी थीं, लेकिन न्यायसंगत वितरण न होने के कारण भूमिहीन और अव्यवस्थित आवासीयों की समस्या हुई, इसलिए जोत-भोग के आधार पर तत्काल लालपुर्जा न देने पर आंदोलन तेज होगा।
संघर्ष समिति के सचिव राजकुमार भट्टराई ने दशकों से बसे हुए घरों को सरकार हटाने की धमकी से लाखों नागरिकों में मानसिक पीड़ा और तनाव फैलने का उल्लेख करते हुए सरकार पर दबाव डालने के लिए आंदोलन हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुकुमवासी बस्तियों में पुलिस ने घेराबंदी कर डराने-धमकाने और जबरदस्ती शासन लागू करने की कोशिश की है, इसलिए आंदोलन तेज होता जा रहा है। अधिकारकर्मी व नागरिक नेता पदम कार्की ने कहा कि सरकार ने वैकल्पिक व्यवस्था के बिना डोजर चलाकर संविधान और मानवता का उल्लंघन किया है, इसलिए विरोध हो रहा है।
हालिया आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में १२ लाख ७१ हजार ५५७ परिवार भूमिहीन और अव्यवस्थित आवासीय हैं। इनमें ९६ हजार ३३९ भूमिहीन दलित, १ लाख ७५ हजार १०५ भूमिहीन सुकुमवासी और ९ लाख १४ हजार ६१८ परिवार अव्यवस्थित आवासीय हैं। भूमिहीन और अव्यवस्थित आवासीयों ने राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष समिति बनाकर बुटवल में राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया है। चार जेठ को बुटवल में होने वाले सम्मेलन में भूमिहीन और अव्यवस्थित आवासीय समस्याओं के न्यायसंगत समाधान के लिए विशेषज्ञों की भागीदारी से चर्चा कर ठोस निष्कर्ष निकाला जाएगा, संघर्ष समिति के सचिव भट्टराई ने बताया।
संघर्ष समिति ने सरकार के सामने मुख्यतः ११ मांगें रखी हैं और आंदोलन जारी रखा है। इनमें भूमिहीन सुकुमवासी व अव्यवस्थित आवासीयों के खिलाफ डोजर चलाकर जबरन निष्कासन, घर ध्वस्त करने तथा अमानवीय व्यवहार तत्काल बंद करने की मांग शामिल है। साथ ही दमन, गिरफ्तारी, धमकी, हिंसा तथा मानवाधिकार उल्लंघन रोककर उनकी संवैधानिक और मानव अधिकारों की पूर्ण रक्षा करने की भी मांग की गई है। भूमि ऐन के अनुसार नाप-नक्शा पूर्ण किए हुए क्षेत्रों में बाकी प्रशासनिक व कानूनी प्रक्रिया पूरी कर जल्द लालपुर्जा वितरण की आवश्यकता है।
साबिक भूमि ऐन के तहत भूमिहीन दलित सुकुमवासियों को आवास और कृषि प्रयोजन के लिए आवश्यक जमीन की लालपुर्जा नि:शुल्क उपलब्ध कराने, अव्यवस्थित आवासीयों को भूमि ऐन द्वारा निर्धारित अधिकतम क्षेत्रफल के भीतर आवास प्रयोजन के लिए मालपोत में रजिस्ट्रेशन शुल्क से प्राप्त राजस्व का १० प्रतिशत शुल्क लेकर लालपुर्जा देने की मांग संघर्ष समिति ने की है। इसी तरह अव्यवस्थित आवासीयों को कृषि प्रयोजन के लिए राजस्व का ५ प्रतिशत शुल्क लेकर लालपुर्जा उपलब्ध कराने तथा नेपाल के संविधान की धारा ३७ में वर्णित नागरिकों के आवास के मौलिक अधिकार को प्रभावी रूप से लागू करने की भी मांग की गई है।