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कार्यदल ने इन्टर्न चिकित्सकों को २४ हजार भत्ता देने की सिफारिश की

सरकार ने एमबीबीएस और बीडीएस इन्टर्न चिकित्सकों को कम से कम आठवीं तहर के मेडिकल अधिकृत के प्रारंभिक वेतन का ५० प्रतिशत के बराबर भत्ता देने की सिफारिश की है। वर्तमान में इन्टर्न चिकित्सकों को प्रति माह केवल १० हजार रुपैयाँ निर्वाह भत्ता मिलता है और वे अत्यधिक कार्यभार के बीच काम कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने श्रम शोषण की शिकायत की है। बाराकोटी प्रतिवेदन ने इन्टर्न चिकित्सकों को मेडिकल अधिकृत के शुरूआती वेतन के ५० प्रतिशत के बराबर भत्ता देने की सलाह दी थी, लेकिन यह अभी तक लागू नहीं हो पाया है। ४ वैशाख, काठमाडौं। मेडिकल कॉलेजों के इन्टर्न डॉक्टर न्यून निर्वाह भत्ते और अत्यधिक काम के दबाव के बीच अस्पतालों में सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। मरीजों के उपचार से लेकर वार्ड प्रबंधन तक की जिम्मेदारियाँ संभालते हुए, उन्हें प्रति माह १० हजार मात्र निर्वाह भत्ता प्राप्त होता है। लंबे समय से इन्टर्न चिकित्सक श्रम शोषण का आरोप लगाते हुए भत्ता बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

सरकार द्वारा गठित एक कार्यदल ने एमबीबीएस और बीडीएस इन्टर्न चिकित्सकों को कम से कम आठवीं तहर के मेडिकल अधिकृत के प्रारंभिक वेतन के ५० प्रतिशत के बराबर भत्ता देने का सुझाव दिया है। शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय ने इन्टर्न चिकित्सकों के मासिक निर्वाह भत्ते संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु सहसचिव एवं प्राविधिक शिक्षा महाशाखा प्रमुख चन्द्रकान्त पौडेल की अध्यक्षता में सात सदस्यों वाला कार्यदल गठित किया था।

एमबीबीएस और बीडीएस इन्टर्न चिकित्सकों के मासिक निर्वाह भत्ते के बारे में राय एवं सुझाव देने के लिए मंत्रालय ने १४ वैशाख को उक्त कार्यदल का गठन किया था। ३० वैशाख को प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में निजी और सरकारी सभी कॉलेजों और प्रतिष्ठानों को निर्वाह भत्ता प्रदान करने की सिफारिश की गई है। ‘इन्टर्न चिकित्सकों को सरकारी स्तर के आठवीं तहर के प्रारंभिक वेतन स्केल के आधे (५० प्रतिशत निर्वाह भत्ता) सभी सार्वजनिक तथा निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा प्रदान करना उचित होगा,’ प्रतिवेदन में कहा गया है, ‘इस व्यवस्था को एक वर्षे इंटर्नशिप वाले चिकित्सा शिक्षा के अन्य कार्यक्रमों के शिक्षार्थियों पर भी लागू किया जा सकता है।’

समिति ने इस राय को लागू करने हेतु राष्ट्रीय शिक्षा कानून २०७५ की धारा ६ के अनुरूप आयोग के कार्यों और अधिकारों के तहत कार्रवाई करने की बात कही है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली चिकित्सा शिक्षा बैठक में उपयुक्त निर्णय करने की सिफारिश भी की गई है।

एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने में लगभग डेढ़ ५ वर्ष लगते हैं, जिसमें करीब डेढ़ ४ वर्ष का अध्ययन और एक वर्ष का अनिवार्य इंटर्नशिप शामिल है। इंटर्नशिप के दौरान विभिन्न अस्पतालों के विभागों में ड्यूटी करनी होती है जहां रात-दिन की पालियों में काम करना होता है। डॉक्टर बनने की प्रक्रिया में इंटर्न डॉक्टरों से अस्पताल में अधिक समय बिताने की अपेक्षा रखी जाती है। लेकिन नेपाल में निर्वाह भत्ता वैज्ञानिक आधार पर निर्धारित न होने के कारण सेवा सुविधाएं कम होने की शिकायत चिकित्सकों ने की है।

चिकित्सा शिक्षा के स्नातक स्तर पर अध्ययनरत इंटर्न डॉक्टरों को विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में मरीजों का इलाज करना होता है। भर्ती और आकस्मिक उपचार के रोगियों के स्वास्थ्य जांच, भर्ती, वार्ड प्रबंधन और डिस्चार्ज तक की जिम्मेदारी उन्हें दी जाती है। सिनामंगल स्थित काठमाडौं मेडिकल कॉलेज में इंटर्नशिप कर रहे एक डॉक्टर के अनुसार रोजाना १० से १२ घंटे काम करना पड़ता है, लेकिन वेतन उचित न मिलने से वे श्रम शोषण का शिकार हो चुके हैं। कई इंटर्न न्यून भत्ते के कारण जीविकोपार्जन में कठिनाई झेल रहे हैं, उनमें से कुछ पर परिवारिक आर्थिक उत्तरदायित्व भी है।

अधिकांश इंटर्नों को अस्पताल केवल १३ हजार रुपये मासिक निर्वाह भत्ता देते हैं। ‘हम जो काम करते हैं, उसके हिसाब से यह राशि बहुत कम है,’ उस चिकित्सक ने बताया, ‘हमें वार्ड, ओपीडी, ऑपरेशन थिएटर में भर्ती रोगियों की जिम्मेदारी संभालनी होती है।’ विशेषज्ञ चिकित्सकों के निर्देशन में ही भले हो, लेकिन रोजाना इलाज में इंटर्नों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

उन्होंने बताया कि मेडिकल अध्ययन की अवधि लंबी होती है और एमबीबीएस की पढ़ाई लगभग ६ वर्ष की होती है। कॉलेज के प्रक्रियाओं में देरी के कारण यह सात वर्ष तक भी पहुंच सकती है। एमबीबीएस पढ़ाई में लगभग ४० लाख रुपये खर्च होते हैं। ‘अधिकांश छात्र २५ वर्ष की उम्र पार कर चुके होते हैं, तब भी उन्हें घर से खर्च मांगना पड़ता है,’ उन्होंने कहा, ‘इसी वजह से इंटर्नशिप के दौरान अपना खर्च चलाने के पर्याप्त भत्ता की मांग की जाती है।’

सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जितना भत्ता मिलता है, वैसा ही निजी मेडिकल कॉलेजों में भी लागू होना चाहिए, यह इंटर्न चिकित्सकों का आग्रह है। ‘हम तलब नहीं, सिर्फ स्टाइपेंड मांग रहे हैं, लेकिन वह भी श्रम कानून के अनुसार होना चाहिए,’ वे कहते हैं, ‘सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में भत्ते में भेदभाव नहीं होना चाहिए।’

बाराकोटी प्रतिवेदन अल्पवित्तीय स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल संघर्ष समिति और सरकार के बीच हुए समझौते के आधार पर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के इंटर्न चिकित्सक, मेडिकल अधिकृत, आवासीय चिकित्सकों सहित स्वास्थ्यकर्मियों की सेवा सुविधाओं में न्यूनतम सरकारी समानता बनाए रखने के उद्देश्य से अध्ययन कर २०८१ साल में प्रस्तुत किया गया था। उस समिति के संयोजक तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव डॉ. टंकप्रसाद बाराकोटी थे।

बाराकोटी प्रतिवेदन ने भी इंटर्न चिकित्सकों को मेडिकल अधिकृत के प्रारंभिक वेतन के ५० प्रतिशत और वार्षिक १३ महीने के निर्वाह भत्ते का निर्धारण करने की सिफारिश की थी। इंटर्नों को न्यूनतम सरकारी स्तर की सेवा सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए, ऐसा प्रतिवेदन में उल्लेख है। चूंकि इंटर्न नियमित चिकित्सकीय सेवा देते हैं, इसलिए उनका भत्ता अत्यंत कम होना श्रम और सेवा के मूल्यांकन में त्रुटि माना गया है।

चिकित्सा शिक्षा आयोग को इंटर्न चिकित्सकों के भत्ते के मानक स्थापित करने की सिफारिश की गई है। वर्तमान में आठवीं तहर के मेडिकल अधिकृत को ४८ हजार रुपये मिलते हैं, जिनमें से ५० प्रतिशत अर्थात २४ हजार रुपये इंटर्न चिकित्सकों को दिया जाना चाहिए, यह कार्यदल का सुझाव है। विश्वविद्यालयों, प्रतिष्ठानों और निजी मेडिकल कॉलेजों को नियमित मासिक इंटर्न भत्ता देने के निर्देश देना भी प्रतिवेदन में शामिल है।

प्रतिवेदन में कहा गया है कि भत्ते को सरकारी दर के बराबर कर विद्यार्थियों के दाखिले शुल्क में अनावश्यक वृद्धि न होने देने हेतु नीतियां बननी चाहिए। भत्ते को पारदर्शी बनाए रखने तथा बैंक के माध्यम से भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए जाने चाहिए। स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीकरण तथा नवीनीकरण में इंटर्न चिकित्सकों के सेवा-सुविधाओं के कार्यान्वयन की जांच भी जरूरी है।

हालांकि बाराकोटी प्रतिवेदन में दी गई सलाह एक वर्ष से अधिक हो चुकी है, फिर भी यह लागू नहीं हो सकी है। श्रम रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय ने ४ वैशाख २०८३ को विज्ञप्ति जारी कर श्रम कानून २०७४ के अंतर्गत न्यूनतम पारिश्रमिक और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पालन करने के निर्देश दिए थे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने २ माघ २०७९ को चिकित्सा शिक्षा आयोग को स्वास्थ्यकर्मियों के निर्वाह भत्ते में असमानता समाप्त करने हेतु परिपत्र भी जारी किया था।

२१ कात्तिक को स्वास्थ्य संस्थानों में कार्यरत नर्स और स्वास्थ्यकर्मियों को न्यूनतम वेतन देने के लिए विभिन्न संघों के बीच सहमति बनी थी। इसके आधार पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने २० चैत को मेडिकल तथा डेंटल कॉलेज एसोसिएशन को पुनः परिपत्र भेजा था। गोष्ठी और सहमति के कारण इंटर्न चिकित्सकों के भत्ते को बढ़ाने की सलाह दी गई है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में दक्ष जनशक्ति उत्पादन के लिए इंटर्नशिप चरण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अवधि में चिकित्सक प्रत्यक्ष रूप से रोगियों के साथ कार्य अनुभव प्राप्त करते हैं। पर सेवा-सुविधाएं कम होने से मनोबल गिरता है और पेशेवर असंतुष्टि बढ़ने के जोखिम विशेषज्ञों ने बताया है।

इंटर्न चिकित्सकों के अभियान संयोजक डिल्ली हरिजन कहते हैं, ‘हम अस्पताल में नियमित चिकित्सकों के समान जिम्मेदारी निभाते हैं। हम लगातार आवाज उठा रहे हैं और प्रतिवेदन को लागू करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय में प्रक्रिया कर रहे हैं। वर्तमान में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी चर्चा हो रही है।’

लेकिन निजी मेडिकल कॉलेज संचालक इस बात का तर्क देते हैं कि इंटर्नों को तलब देना आवश्यक नहीं है। उनका कहना है कि इंटर्नशिप चिकित्सा शिक्षा का एक हिस्सा है और यह सीखने की प्रक्रिया है, काम नहीं। इंटर्न चिकित्सक इसे श्रम शोषण बताते हैं।

इंटर्न चिकित्सकों की मुख्य असंतुष्टि सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के बीच भत्ते में असमानता को लेकर है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्नों को २३ हजार तक भत्ता मिलता है, जबकि निजी कॉलेजों में कई जगह केवल १० हजार रुपैयाँ भत्ता मिलता है। डिल्ली हरिजन कहते हैं, ‘पहले भी समितियां बनीं और प्रतिवेदन तैयार हुआ लेकिन कोई कार्यान्वयन नहीं हुआ। इस बार सरकार ने प्रतिबद्धता व्यक्त की है, इसलिए हम विश्वास के साथ अंतिम तक संघर्ष कर रहे हैं।’

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