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२४ भदौमा फर्काउने यो नाटक, कसले जन्माउँदै छ लुसिफर !

२४ भदौ की याद में नाटक ‘लुसिफर’, किसने रचा?

नाटक ‘लुसिफर राइज़िंग’ ने २४ भदौ को काठमाडौं के राजनीतिक संघर्ष और इंसान की मानसिक स्थिति को एक ही कमरे से उजागर किया है। यह नाटक सवाल उठाता है कि इंसान कब शक्तिशाली होता है? क्या शक्ति एक भ्रम है या सच्चाई? इंसान कब शरण मांगता है? अराजकता के बीच इंसान कैसा होता है? ऐसे सवालों का जवाब इस नाटक ने मंच पर प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

नाटक दर्शकों को २४ भदौ के माहौल में ले जाता है। उस दिन काठमाडौं रणभूमि जैसा था। प्रदर्शनकारियों की मानसिक स्थिति कैसी थी? पुलिस किस पक्ष में थी? जेल से निकले कैदी की मनःस्थिति क्या थी? इन तमाम सवालों के जवाब एक ही कमरे के माध्यम से प्रस्तुत किए गए हैं। एलिसा सुकुम्बासी बस्ती की युवती है, जो नागरिकता बनवाने में असमर्थता की पीड़ा झेल रही है।

नाटक में कुल सात पात्र हैं, जो २४ भदौ के कई व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि, नाटक की यह विशेषता दर्शकों को दो हिस्सों में बाँटती भी है। नाटक धर्म को विश्वास या अंधविश्वास के रूप में प्रस्तुत करता है और गंभीर प्रश्न भी उठाता है।

नाटक के शीर्षक में राजनीतिक अर्थ निहित है, क्योंकि हाल के समय में ‘लुसिफर’ शब्द राजनीतिक रूप से प्रचलित होता जा रहा है। नाटक ने इंसान के भीतर छिपी लुसिफर प्रवृत्ति को प्रभावशाली तरीके से प्रदर्शित किया है। निर्देशक ने इसमें सुधार की संभावनाएं भी छोड़ी हैं। मौलिकता और सीमित पात्रों के बीच कहानी कहने की क्षमता नाटक की सबसे बड़ी विशेषताएं हैं।

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