
संविधान संशोधन के लिए प्रमुख दलों के नेताओं के सुझाव
७ जेठ, काठमाडौं। संविधान संशोधन के लिए बहसपत्र तैयार करने हेतु गठित कार्यदल ने गुरुवार प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ चर्चा की। कार्यदल के संयोजक असिम शाह ने प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद्को कार्यालय में विभिन्न दलों के नेताओं को आमंत्रित करके संवाद किया। इस बैठक में उन्होंने कहा कि सरकार एकतरफा संविधान संशोधन नहीं करना चाहती बल्कि राष्ट्रीय सहमति से साझा बिंदु खोजने की कोशिश कर रही है। उन्होंने संविधान जारी होने के समय के राजनीतिक संघर्ष, जनआन्दोलन, मधेश आन्दोलन तथा शहीदों के बलिदान से मिले उपलब्धियों के प्रति सरकार की गंभीरता भी व्यक्त की।
चर्चा में शामिल दलों के नेताओं ने संविधान संशोधन पर अपनी और अपने दल की राय प्रकट की। जनमत पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सीके राउत ने कहा कि संविधान संशोधन से गणतंत्र को और मजबूत बनाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने संरचनात्मक सुधारों पर विशेष जोर दिया। राउत ने प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति तथा प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रदेश प्रमुख की व्यवस्था लागू करने की मांग की। उन्होंने संवैधानिक निकायों के प्रमुखों को भी निर्वाचित करने, महंगे निर्वाचन प्रणाली को बदलने, साथ ही ‘राइट टू रिजेक्ट’ (अस्वीकार करने का अधिकार) और ‘राइट टू रिकॉल’ (प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार) को संविधान में गारंटी देने का सुझाव दिया।
नेपाली कांग्रेस के नेता मीन विश्वकर्मा ने संविधान के मूलभूत विषय एवं प्रस्तावना में बदलाव न करने की बात कही। उन्होंने गणतंत्र, संघीयता, समावेशिता तथा राष्ट्रीय सार्वभौमिकता जैसी मूलभूत उपलब्धियों में हस्तक्षेप को स्वीकार्य नहीं बताया। अधिक जनप्रतिनिधियों की संख्या के विषय में उन्होंने कहा कि इसे प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के भीतर समावेशिता के संतुलन से भी संतुष्ट किया जा सकता है।
नेकपा एमाले के नेता कृष्णभक्त पोखरेल ने कहा कि संविधान संशोधन के दौरान संविधान की मूल आधारशिला को नुकसान पहुँचाने वाली कोई बात एमालेलिए स्वीकार्य नहीं होगी। उन्होंने राष्ट्रीय सभा के सदस्यों की संख्या कम करने, उपराष्ट्रपति को राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष का दायित्व सौंपने का सुझाव दिया। साथ ही प्रदेश में अधिकतम पाँच से सात मंत्री रखने और गैरआवासीय नेपाली नागरिकों को राजनीतिक अधिकारों के अलावा अन्य अधिकार देने में विलंब न करने की बात कही।
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेता माधव सापकोटाले पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली और प्रत्यक्ष कार्यकारी प्रमुख की व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया। उन्होंने मंत्रियों का चयन विशेषज्ञों से करने, राष्ट्रप्रमुख को स्वेच्छाचारी बनने से रोकने हेतु महाभियोग और नियंत्रण संतुलन के स्पष्ट प्रावधान होने पर भी बल दिया।
पूर्व विदेश मंत्री रमेशनाथ पाण्डे ने पूर्वाग्रह रहित दृष्टिकोण से सातों संविधान के मजबूत और कमजोर पहलुओं का समीक्षा करने के बाद ही दीर्घकालीन संविधान संशोधन का मार्गचित्र तैयार करने को कहा। उन्होंने हड़बड़ी में निर्णय लेने से संविधान निर्जीव साबित होने के खतरे की ओर सचेत करते हुए सावधानीपूर्वक व परिपक्वता के साथ काम करने का आग्रह किया। रास्वपाका महामंत्री कवीन्द्र बुर्लाकोटी ने कहा कि संविधान संशोधन के लिए वर्तमान समय उपयुक्त है और आम नागरिकों की राय समेटते हुए कार्य शीघ्र आगे बढ़ाना चाहिए।
राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी नेपाल के केशवकुमार झा ने वर्तमान संविधान में नेपाल की मौलिकता, दर्शन एवं संस्कृति की अनुपस्थिति की आलोचना करते हुए व्यापक संशोधनों की जरूरत बताई। पूर्व मंत्री कल्पना धमला ने मौलिक अधिकारों के क्रियान्वयन तथा मातृ नाम से सहज नागरिकता प्राप्ति की व्यावहारिक व्यवस्था पर जोर दिया। उन्होंने समानुपातिक समावेशी कोटे में एक से अधिक बार दोहराव न होने का प्रावधान सुझाया।