
लिपुलेक से संबंधित कूटनीतिक नोट पर चीन की मौनता बरकरार
समाचार सारांश समीक्षा सामग्री। नेपाल सरकार ने इस साल वैशाख में भारत और चीन को लिपुलेक पास के उपयोग के विरुद्ध कूटनीतिक नोट भेजा था। भारत ने लिपुलेक मार्ग को सन् 1954 से प्रयोग में होने का दावा करते हुए कुछ ही घंटों में नोट का जवाब दिया है। चीन ने मौनता बनाए रखा है तथा नेपाल ने त्रिपक्षीय वार्ता के माध्यम से समस्या के समाधान की मांग की है। 8 जेठ, काठमाडौँ। भारत और चीन द्वारा लिपुलेक पास का प्रयोग शुरू करने के बाद नेपाल सरकार ने गत वैशाख में दोनों देशों को कूटनीतिक नोट भेजा था। भारत ने कुछ ही घंटों में इसका जवाब दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जैसवाल ने कहा कि लिपुलेक मार्ग सन् 1954 से प्रयोग में है और यह कोई नया विकास नहीं है। उन्होंने नेपाल के दावों को ऐतिहासिक तथ्यों व प्रमाणों पर आधारित नहीं मानते हुए अस्वीकार किया, हालांकि उन्होंने द्विपक्षीय वार्ता के लिए दरवाजे खुले रहने की बात कही। वहीं, उत्तरी पड़ोसी चीन ने इस बार भी परंपरागत मौनता अपनाई है। चीन की ओर से कोई जवाब न मिलने पर विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि चीन के साथ लगातार संवाद जारी है। ‘हम उत्तरी पड़ोसी के साथ सतत संपर्क और संवाद में हैं,’ मंत्री खनाल ने संसदीय समिति को बताया, ‘हमारी प्राथमिकताओं में उनकी रुचि है, और नई सरकार बनने के बाद कौन से विषय प्राथमिकता पाएंगे, इस पर उनकी चासनी बनी हुई है। इसलिए हम लगातार संपर्क में हैं।’ नेपाल, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। लेकिन विवाद सतह पर आने के बावजूद नेपाल के वार्ता प्रयासों को अपेक्षित गंभीरता नहीं मिली। भारत और चीन ने सन् 2015 में भी लिपुलेक मार्ग के उपयोग के लिए तीर्थयात्रियों और व्यापार के संबंध में सहमति बना रखी थी। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. सुशील कोइरालाको के कार्यकाल में भी लिपुलेक को लेकर दोनों पड़ोसियों को कूटनीतिक नोट भेजे गए थे, लेकिन उस समय भी चीन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। नेपाल की पश्चिमी सीमा सन् 1816 की सुगौली संधि के अनुसार तय हुई थी। यह संधि अंग्रेजो–नेपाली युद्ध के अंत का संकेत थी लेकिन नेपाल को बड़ा भूभाग गंवाना पड़ा। इस संधि की धारा 5 ने काली (महाकाली) नदी के पश्चिमी क्षेत्र में नेपाल के दावे को खत्म किया था, पर कपटपूर्ण नदी का स्रोत अस्पष्ट होने के कारण विवाद आज भी बना हुआ है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग के नक्शों में काली नदी के उद्गम स्थल विभिन्न रूप में दिखाए गए हैं, जिससे विवाद गहरा गया है। इस उद्गम स्थान के फेरबदल और कूटनीतिक असंगतियों के चलते कालापानी क्षेत्र दो पड़ोसी के बीच सबसे जटिल भू-राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। सन् 1961 में नेपाल और चीन के बीच सीमा संधि के समय भारत-नेपाल-चीन के बीच पश्चिमी अंतिम बिंदु स्पष्ट नहीं था। राजा महेन्द्र ने चीन के साथ सीमा समझौता किया था, लेकिन कालापानी और लिपुलेक के त्रिदेशीय बिंदु भारत की संवेदनशीलता के कारण खुला रखा गया माना जाता है। विदेश नीति विशेषज्ञ डा. युवराज सङ्ग्रौलाले कहते हैं कि त्रिदेशीय बिंदु के अस्पष्ट होने से सीमा विवाद और जटिल हो गया है। वे बताते हैं, ‘त्रिदेशीय बिंदु तो तय हो गया, किंतु वहाँ कोई सीमा स्तंभ नहीं रखा गया, न ही पहचान के कोई संकेत हैं, जिससे अनिश्चितता बढ़ी है।’ नेपाल और चीन के बीच संधिपत्र में इस पश्चिमी अंतिम बिंदु को ‘नेपाल-चीन सीमा के पश्चिमी हद की प्रारंभिक स्थिति’ कहा गया है। उस समय की साझा नक्शे और दस्तावेजों से लिपुलेक क्षेत्र नेपाल का हिस्सा होने का चीन ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था, ऐसा नेपाल दावा करता है। भारतीय पक्ष ने कूटनीतिक नोट के जवाब में दावा किया है कि लिपुलेक सन् 1954 से उपयोग में है, जबकि उस समय नेपाल और चीन के औपचारिक संबंध भी नहीं थे। सन् 2019 में भारत ने नई राजनीतिक नक्शा में कालापानी क्षेत्र शामिल किया था, तब नेपाल ने कूटनीतिक नोट के माध्यम से विरोध जताया था, लेकिन संवाद अस्वीकार कर दिया गया। सन् 2020 में भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेक मार्ग के तहत कैलाश मानसरोवर जाने वाली 79 किलोमीटर सड़क का उद्घाटन किया, तब भी नेपाल ने विरोध जताया था। नेपाल ने बार-बार संवाद की अपील की लेकिन उसे नजरअंदाज किया गया। नेपाल ने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेक को मिलाकर नया ‘चुच्चे नक्सा’ जारी किया था, जिसे संसद ने पारित कर संवैधानिक अंग घोषित किया। भारत ने इसे ‘कृत्रिम’ और ‘एकपक्षीय’ करार दिया। सन् 2025 अगस्त में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के भारत दौरे के दौरान दोनों पड़ोसियों ने लिपुलेक पास से सीमा व्यापार शुरू करने पर सहमति व्यकत की। नेपाल के दावे वाले क्षेत्र में उनकी अनुपस्थिति में लिए गए फैसलों ने नेपाली संप्रभुता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। नेपाल का विरोध करने वाला कूटनीतिक नोट भारत ने दशकों पुराना व्यापार चलने का हवाला देकर खारिज किया, जबकि चीन मौन रहा। इसी संदर्भ में पूर्व प्रधान मंत्री केपी शर्मा ओली ने सन् 2025 सितंबर में चीन भ्रमण के दौरान राष्ट्रपति शी चिनफिंग से लिपुलेक मुद्दा उठाया। राष्ट्रपति शी ने कहा कि यह नेपाल और भारत का द्विपक्षीय मसला है और यह दोनों को ही सुलझाना होगा। चीन ने मौखिक रूप से अपनी धारणा प्रस्तुत करने का संकेत दिया। तीनों राष्ट्र अगर एक साथ बैठकर त्रिदेशीय बिंदु का आधिकारिक निर्धारण नहीं करते, तो लिपुलेक विवाद लगातार बढ़ता रहेगा। डा. भट्टराई कहते हैं, ‘हालांकि कूटनीतिक नोट का जवाब नहीं मिला, लेकिन बातचीत में राय देखी गई, और शी का जवाब भी इसी तरह का था।’ डा. सङ्ग्रौलाले तर्क दिया कि भारत और चीन के द्विपक्षीय शिखर वार्ताओं में नेपाल की सीमा विवाद का समावेश होना कूटनीतिक दृष्टि से थोड़ा असामान्य है। उन्होंने कहा कि नेपाल लंबे समय से अपनी भौगोलिक दावा नहीं छोड़ पा रहा है और कूटनीतिक प्रक्रियाओं में व्यवस्थित नहीं रहने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा। सुगौली संधि का ऐतिहासिक प्रमाण नेपाल के पास होने के बावजूद, भारत लंबे समय तक प्रशासनिक और सैन्य अभ्यास को ही मुख्य आधार मानता रहा है। यह ऐतिहासिक प्रमाण और प्रशासनिक अभ्यास के बीच टकराव है। चीन में पूर्व राजदूत महेन्द्र पांडे कहते हैं, ‘चीन अंतरराष्ट्रीय मामलों में कतई भी जल्दबाजी नहीं करता और हमेशा गंभीर रूप से संवाद करने को तैयार रहता है।’ लेकिन लिपुलेक पास से भारत के साथ व्यापार और तीर्थाटन होने पर चीन को नेपाल की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सीमा संधि उल्लंघन करते हुए बिना नेपाल से संवाद किए भूटान में सड़क बनाना अस्वीकार्य है। पांडे कहते हैं, ‘चीन की मौनता भी एक कूटनीतिक संदेश है। इस संवेदनशील विषय पर निर्णय से पहले नेपाल से अनिवार्य परामर्श किया जाना चाहिए।’ पूर्व राजदूत पांडे ने इस जटिल समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए नेपाल, भारत और चीन के बीच ‘त्रिपक्षीय वार्ता’ को ही एकमात्र ठोस एवं व्यावहारिक विकल्प बताया। तीनों राष्ट्र अगर एक जगह बैठकर त्रिदेशीय बिंदु का आधिकारिक निर्धारण नहीं करते, तो लिपुलेक विवाद निरंतर जटिल होगा, लेकिन संवाद से ही समाधान ढूँढा जाना चाहिए।