
मानवाधिकार आयोग की सिफारिशें लागू करना कितना संभव होगा?
१३ जेठ, काठमांडू। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पिछले भाद्र २३ और २४ की घटनाओं के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और आगे की जांच की सिफारिश की है। जेनजी आंदोलन के दौरान छात्रों, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जेल में बंदी बनाये जाने के कारण ७६ लोगों की मौत हुई थी।
आयोग की सदस्य लिली हजुर बस्न्यात थापा की अध्यक्षता में गठित समिति ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और पूर्व सूचना एवं संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरूंग को मानवाधिकार उल्लंघन का दोषी माना है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान किसी भी कानून में मानवाधिकार उल्लंघन के लिए सजा का प्रावधान नहीं है। अतः मानवता और मानवाधिकार के अपराधों पर पश्चातदर्शी कानून (ऐसा कानून जो कानून बनने से पहले हुए अपराधों पर भी लागू हो) बनाकर कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
आयोग ने बुधवार को यह सिफारिश प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी, जिसमें अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री सुशील कार्की, निवर्तमान गृह मंत्री सुधन गुरुङ समेत अन्य से और जांच करने को कहा गया है।
साथ ही, सत्ता संपन्न राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के अध्यक्ष रवि लामिछाने को जेनजी आंदोलन के दौरान कैदियों को बाहर निकालने के मामले में संलिप्त पाया गया है। रास्वपा के सांसद मनिष झा, हरि ढकाल और नख्खु कारागार प्रशासक सत्यराज जोशी को भी जांच के लिए सिफारिश की गई है।
जेनजी आंदोलन दमन के लिए पुलिस महानिरीक्षक दानबहादुर कार्की, सशस्त्र पुलिस बल के आईजीपी नारायणदत्त पौडेल, डीआईजी ओमविक्रम राणा, एसएसपी विश्व अधिकारी, सशस्त्र बल के एसपी जीवन केसी, राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के निदेशक कृष्ण खनाल और काठमांडू के मुख्य जिला अधिकारी छविलाल रिजाल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
भाद्र आंदोलन के दौरान सिंहदरबार, सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति भवन में हुई तोड़फोड़ और आगजनी में नेपाली सेना की भी कमजोरी पाई गई है, लेकिन आयोग ने सेना के खिलाफ कोई कार्रवाई की सिफारिश नहीं की है।
आयोग ने अपना पूर्ण रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं किया है। आयोग ने बताया कि हजार पृष्ठों के रिपोर्ट के आधार पर ये निर्णय लिए गए हैं।
पूर्व मानवाधिकार आयोग सदस्य गौरीशंकरलाल दास का मानना है कि किसी भी संवैधानिक आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी होती हैं।
वह कहते हैं, “अपने लोकतंत्र मजबूत देश में आयोग ने जब मानवाधिकार उल्लंघन नहीं बताया है तब ही पदोन्नति होती है, पर वास्तविकता यह है कि आयोग की सिफारिशों का केवल १० प्रतिशत भी लागू नहीं होता।”
जांचबुझ आयोग अधिनियम २०२६ के अनुसार, सार्वजनिक महत्व के विषयों पर जांच करने के लिए आयोग गठित किया जा सकता है। ऐसे आयोगों को घटनाओं से संबंधित तथ्य एकत्र करने का अधिकार होता है।
अधिनियम के अनुसार इन आयोगों को अपनी रिपोर्ट देना अधिकार है, लेकिन अंतिम फैसला सरकार का होता है।
आम तौर पर ऐसे आयोग आगे की कार्रवाई और जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई करने की सिफारिश करते हैं।
पूर्व मानवाधिकार आयोग सदस्य मोहना अन्सारी कहती हैं कि संवैधानिक आयोग और अन्य अधिनियम के तहत गठित आयोगों के कार्य आदेश अलग होते हैं।
अन्सारी का कहना है कि संवैधानिक आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी होते हुए भी मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट का कोई खास पालन नहीं होता।
वह कहती हैं, “हमारे कार्यकाल में की गई सिफारिशें भी लागू नहीं हुईं। अगर ये सिफारिशें लागू होतीं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की प्रतिष्ठा बढ़ती।”
सिफारिशों के अवहेलना से होने वाले नकारात्मक प्रभाव का उदाहरण लेते हुए बताया गया कि दशक लंबी माओवाद सशस्त्र संघर्ष के दौरान गोरुसिंगे बैरक में जनकबहादुर राउत को अत्याचार करने के मामले में नेपाली सेना के महासेनानी कुमार लामालाई विभागीय कार्रवाई और पीड़ित को मुआवजा देने की सिफारिश की गई थी।
लेकिन सरकार ने लामालाई कोई दंडित नहीं किया। दक्षिण सूडान तैनात लामा छुट्टियां लेकर इंग्लैंड गए थे और २०६९ पुष में पकड़े गए थे। तब वह कर्नल पद पर थे।
२०७१ में संसद की सामाजिक न्याय एवं मानवाधिकार समिति की बैठक में तत्काल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल समेत सदस्यों ने लामालाई नेपाल लाकर कानून अनुसार जांच कराने की मांग की थी।
‘‘अगर आयोग की रिपोर्ट लागू होती तो लामा को बचाने के लिए इतनी सरकारी मशीनरी सक्रिय नहीं होती। उन्हें विदेशों में ऐसा अपमान भी नहीं सहना पड़ता,’’ आयोग के एक सदस्य ने कहा।
२०७२ माघ में मोरंग के रंगेली में नेकपा (एमाले) और संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प में पुलिस गोलीबारी से तीन लोगों की मौत हुई। सुरक्षा अधिकारियों की चूक से यह घटना हुई, आयोग ने निष्कर्ष निकाला।

आयोग ने दोषियों को कानून के अनुसार दंडित करने और मृतकों के परिवारों को उचित राहत तथा मुआवजा देने की सिफारिश की है। उस समय कार्रवाई की सिफारिश में शामिल अधिकारियों ने पुनर्विचार का अनुरोध किया था लेकिन आयोग ने अपने फैसले पर अडिग रहा।
आयोग की पूर्व सदस्य अन्सारी कहती हैं, “मानवाधिकार आयोग के सिफारिशों का पुनर्विचार या संशोधन का कोई प्रावधान नहीं है।”
संविधान के अनुच्छेद २४९ के तहत आयोग को मानवाधिकार उल्लंघन करने वाले व्यक्ति या संस्थाओं के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश करने का अधिकार दिया गया है।
आयोग मानवाधिकार उल्लंघन करने वालों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और सजा के लिए संबंधित अधिकारियों के सामने सिफारिश कर सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी आयोग की सिफारिशों को बिना कोई ‘‘अगर’’ या ‘‘परंतु’’ के लागू करने का आदेश दिया है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता चरण प्रसाईं का कहना है कि जेनजी आंदोलन संदर्भ में आयोग ने जो सिफारिशें की हैं, उनमें कुछ कमियां हैं।
उन्होंने कहा कि कमियों के बावजूद आयोग की सिफारिशें लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ‘‘जैसे कि निवर्तमान गृह मंत्री को फिर से गृह मंत्री बनाने की चर्चा है, तो आयोग की सिफारिशों के अनुसार उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए।’’
अधिकार प्राप्त है कि आयोग को तीन-तीन महीने के अंतराल पर पता चलता रहे कि उसकी सिफारिशें लागू हुईं या नहीं। संविधान की व्यवस्था को याद दिलाते हुए वे कहते हैं, ‘‘आयोग की सिफारिशें लागू करना वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है। अगर अधिकारी इसका पालन नहीं करते हैं तो आयोग उन्हें मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता के रूप में सार्वजनिक करने का अधिकार रखता है।’’