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बैंकरों ने कर्ज़ा देने में दिखाया डर

१४ जेठ, काठमाडौं। कुछ समय से बैंकर स्वयं कर्ज़ा प्रवाह करने में हिचकिचाने लगे हैं। बढ़ती हुई खराब कर्ज़े, ऋण दुरुपयोग की घटनाएं तथा पुलिस द्वारा बैंकरों पर कड़ी कार्रवाई के कारण वे कर्ज़ा देने में संकोच कर रहे हैं।

इसी कारण बैंक और वित्तीय संस्थान में कर्ज़ा लेने आने वाले ऋणी की स्क्रीनिंग करते हुए प्रक्रियात्मक जटिलताएं दर्शाई जाती हैं और कर्मचारी भी निरुत्साहित करते हैं, जिसके कारण कर्ज़ा विस्तार मांग के अनुसार नहीं हो पा रहा है, ऐसा बैंकर बताते हैं।

ऋण वसूली में आई समस्याओं और सरकारी नीतियों के चलते बैंकर कर्ज़े की मांग होते ही स्वीकृति नहीं दे रहे हैं। एक वाणिज्य बैंक के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने बताया कि पहले जोखिम विश्लेषण किए बिना कर्ज़ा देने की प्रवृत्ति के कारण दुरुपयोग और डिफ़ॉल्ट बढ़ा, जिससे अब बैंकर कर्ज़ा विस्तार में हतोत्साहित हैं।

इसके अतिरिक्त हाल ही में सरकार की नीति का रवैया ‘दबाने और सुनने’ वाला होने के कारण भी बैंकरों का मनोबल कमजोर हुआ है, उनका दावा है।

कोरोना महामारी से अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए नेपाल राष्ट्र बैंक ने कर्ज़ा नीति में ढील दी थी। इसके साथ ही कर्ज़ा सीमा और प्रक्रिया भी सरल बनाए गए थे। बैंक और वित्तीय संस्थान ग्राहकों के घर तक जाकर भी कर्ज़ा देने लगे थे।

बैंक और वित्तीय संस्थानों ने आक्रामक तरीके से कर्ज़ा निवेश किया जिससे अर्थव्यवस्था चालू रही, लेकिन उत्पादन बढ़ा नहीं। इससे अनुत्पादक क्षेत्र का कारोबार असामान्य रूप से बढ़ गया।

‘इज़ी मनी’ बनने वाले क्षेत्र (सेयर और घरजग्गा) में आई असामान्य वृद्धि को सही करने के लिए भी कर्ज़ा नीति में कड़ाई की गई, राष्ट्र बैंक के एक अधिकारी ने बताया।

बैंक और वित्तीय संस्थान जोखिम विश्लेषण से ज्यादा कर्ज़ा निवेश बढ़ाने पर ध्यान देने के कारण कर्ज़ा दुरुपयोग और डिफ़ॉल्ट बढ़ा है, और इसका प्रभाव कुछ वर्षों तक बना रहेगा, उनका मानना है।

‘कर्ज़ा निवेश बढ़ाने और मुनाफा बढ़ाने की दौड़ में बैंक और वित्तीय संस्थान के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण खराब कर्ज़ा बढ़ा, अर्थात् संपत्ति की गुणवत्ता कम हो गई,’ वह अधिकारी कहते हैं, ‘अब के डिफ़ॉल्ट, वसूली की समस्या तथा कर्ज़ा न चुकाने का अभियान भी बैंकों की ही कमजोरी के कारण हैं।’

केन्द्रीय बैंक की कर्ज़ा दुरुपयोग रोकने की नीतियों ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया। साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध एवं इजरायल-ईरान युद्धों ने भी आर्थिक गतिविधि में गिरावट का योगदान दिया।

केन्द्रीय बैंक ने कर्ज़ा सीमा घटाने के साथ क्षेत्र विशेष के कर्ज़ों पर भी सीमा कड़ी कर दी। साथ ही कर्ज़ा उपयोग को उसी उद्देश्य के लिए सीमित करने का प्रावधान किया। चालू पूंजी कर्ज़ा दुरुपयोग रोकने हेतु मार्गदर्शन लागू किया।

कर्ज़ों की किस्त चुकाने, रीफाइनेंसिंग आदि क्रियाकलापों पर भी नियंत्रण लगाने से बैंक और वित्तीय संस्थान को कर्ज़ा निवेश से ज्यादा वसूली बढ़ाने की स्थिति सामने आई। आर्थिक मंदी के कारण ऋणी किस्त नहीं चुका पाए जिसके चलते डिफ़ॉल्ट बढ़ने लगे।

कर्ज़ा मांग पर बिना जोखिम को देखे निवेश करने वाले बैंक और वित्तीय संस्थान वसूली में दिक्कत आने पर नए कर्ज़ों पर कम जोखिम के आधार पर चयन करना मजबूर हुए, सीईओ ने बताया।

‘कर्मचारी ऋणी से मिलने वाली कमिशन के कारण जोखिमों को अनदेखा करते हुए कर्ज़ा देते थे,’ सीईओ ने कहा, ‘जोखिम विश्लेषण के बिना कर्ज़ा देने की प्रवृत्ति नियंत्रित होने पर चयनात्मक प्रक्रिया शुरू हुई। कर्ज़ा दुरुपयोग पर कड़ी कार्रवाई के कारण बैंक ग्राहक चयन कर ही कर्ज़ा दे रहे हैं।’

आर्थिक वर्ष २०७७/७८ के बाद से बैंक और वित्तीय संस्थानों द्वारा निजी क्षेत्र को जारी कर्ज़ा में वृद्धि स्पष्ट देखी जा सकती है।

चालू वर्ष चैत तक बैंक और वित्तीय संस्थानों द्वारा ३ खरब १२ अर्ब कर्ज़ा प्रवाह किया गया। इस अवधि में लगभग ११ अर्ब बैंकिंग प्रणाली की अधिक तरलता राष्ट्र बैंक में जमा है।

आर्थिक वर्ष २०८०/८१ में २ खरब ७६ अर्ब ९४ करोड़ और २०८१/८२ में ४ खरब २४ अर्ब रूपये कर्ज़ा निवेश किया गया है, राष्ट्र बैंक द्वारा बताया गया है।

वित्तीय क्षेत्र में कर्ज़ा की मांग कम होने की बात नेपाल बैंकर्स संघ के अध्यक्ष सन्तोष कोइराला ने कही। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं लगता कि बैंकरों ने कर्ज़ा को नियंत्रित किया हो।

‘आगामी आर्थिक वर्ष के बजट को देखने के बाद आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी,’ कोइराला ने कहा, ‘अभी बैंकर लोग प्रतीक्षा की नीति पर हैं।’

व्यापारियों का भी कहना है कि वे आगामी बजट की दिशा पर नजर रखे हैं। ‘कर्ज़ा देते समय बैंक योजना और क्षेत्र के अनुसार सीमाएं तय करते हैं,’ कोइराला ने कहा, ‘हालांकि वसूली में दिक्कतें आना सामान्य है और जोखिम कम करने पर ध्यान देना आवश्यक है।’

कर्ज़ा न देने की मंशा से नहीं, बल्कि जोखिम न्यूनीकरण कारण ग्राहक चयन की स्थिति को लेकर लोगों में गलतफहमी पैदा हो सकती है, कोइराला ने समझाया।

दूरसंचार, जलविद्युत् और बैंकिंग सम्बन्धी कानूनों में अस्पष्टता है, जिसे सरकार को स्पष्ट करना चाहिए, बैंक एवं वित्तीय संस्था परिसंघ के अध्यक्ष प्रचण्डबहादुर श्रेष्ठ ने कहा।

उन्होंने कहा कि कर्ज़ा प्रवाह रोकना या सरकार के प्रति असहयोग करना उचित नहीं है। ‘दूरसंचार कंपनियों और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में बैंकिंग क्षेत्र का बड़ा निवेश है। ये योजनाएं निश्चित समय के बाद सरकार को हस्तांतरित होती हैं, इसलिए कर्ज़ा के संबंध में स्पष्टता जरूरी है।’

कर्ज़ा प्रवाह में बैंक सुरक्षित क्षेत्र और व्यक्तियों का चयन करते हैं ताकि पिछले गलतियों को दोहराया न जाए, इस बात पर श्रेष्ठ ने सहमति जताई।

राष्ट्र बैंक के प्रवक्ता गुरु पौडेल ने भी स्वीकार किया कि कुछ हद तक कर्ज़ा नियंत्रण हुआ है।

‘छोटे कर्ज़ों के संबंध में बैंक थोड़ा अनिच्छुक दिखते हैं,’ पौडेल ने कहा, ‘बैंकिंग क्षेत्र पर बढ़ते विरोधी गतिविधियों और कर्ज़ा न चुकाने की धमकी के कारण उनके लिए कर्ज़ा नियंत्रण आवश्यक हो गया है।’

उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र के अभिभावक सरकार है, लेकिन व्यवहारात्मक स्तर पर इस भावना का अनुभव न होना कर्ज़ा मांग में कमी का कारण है। साथ ही कर्ज़ा दुरुपयोग नियंत्रण नीतियों से बैंकिंग अभ्यास में जोखिम विश्लेषण और स्वीकृति प्रक्रिया पर जोर दिया जाता है, जिसे वैकल्पिक नहीं माना जाना चाहिए।

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