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विधायिका को छल गर्दै कर दरों में मनमानी संशोधन

१९ जेठ, काठमाडौं। सरकार की कर नीति और दरों से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है – आर्थिक विधेयक। इसी विधेयक में उल्लिखित नीति और दरों के अनुसार सरकार ने १५ जेठ से कर वसूली शुरू कर दी है।

लेकिन संसद में १५ गते पेश किए गए आर्थिक विधेयक और अर्थ विभाग ने अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक किए गए आर्थिक विधेयक में कर संबंधी व्यवस्थाओं में व्यापक अंतर है। नेपाल सरकार ने संसद में ४६७ पृष्ठों का आर्थिक विधेयक दर्ता कराया है, जबकि अर्थ विभाग ने एकतरफा चार बार बदलाव कर अपनी साइट पर ४५० पृष्ठों का संशोधित दस्तावेज अपलोड किया है।

संसद सचिवालय के पूर्व सचिव, सोमबहादुर थापा के अनुसार संसद में दर्ता हो चुके विधेयक में कोई भी विषय में सुधार करना हो तो संसद की अनुमति अनिवार्य होती है। उन्होंने कहा, ‘संसद में पेश किए गए आर्थिक विधेयक में संशोधन लाने के लिए पहले संसद में मंजूरी लेना जरूरी है। अर्थ मंत्रालय को स्वयं संशोधन करने का कानूनी अधिकार नहीं है। यदि कर की दरों के विषय पर ही बिना मंजूरी संशोधन किया गया है तो यह एक गंभीर मामला है।’

हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि अर्थ मंत्रालय ने कर दरों और नीति में मामूली नहीं बल्कि गंभीर बदलाव किए हैं।

एक पूर्व अर्थ सचिव ने कहा, ‘संसद में दर्ता हो चुके आर्थिक विधेयक में इस तरह मनमानी संशोधन होना स्वाभाविक नहीं है। चाहे कितनी भी सामान्य भूल हो, उसे संसद में चर्चा कर ही संशोधित किया जाना चाहिए।’ उन्होंने भले ही अर्थ मंत्री को मामूली संशोधन करने का बयान दिया हो, लेकिन इस विषय को लेकर उन्हें आश्चर्य हुआ है।

पहला– संसद सचिवालय में दर्ता आर्थिक विधेयक की अनुसूची १ में वैट छूट देने वाली वस्तुओं की सूची में ‘गृह उपयोग के लिए ५० यूनिट तक बिजली पर कर छूट’ का प्रावधान था। लेकिन मंत्रालय की वेबसाइट पर संशोधित विधेयक में इस व्यवस्था में बड़ा फर्क है। अब विद्युत व्यवसायी द्वारा बेची गई तथा घरेलू उपयोग के लिए ५० यूनिट तक की बिजली पर कर छूट का प्रावधान है, जिससे विद्युत आयोजना प्रवर्धकों को कर-मुक्ति देने की संभावना है।

पहले के विधेयक के अनुसार ५० यूनिट से कम खपत करने वाले ग्राहकों को छोड़कर सभी पर वैट लागू था। बिजली उत्पादन कंपनी यदि प्राधिकरण को बेचती तो भी वैट लगता। लेकिन संशोधित प्रावधान ने विद्युत आयोजना प्रवर्धकों को कर से अलग छूट दे दी है।

दूसरा– संसद में दर्ता विधेयक में महानगरपालिका और उपमहानगरपालिका के बाहर सिनेमा हॉल संचालित करने पर आयकर में कोई छूट का प्रावधान नहीं था। लेकिन अर्थ मंत्रालय ने आयकर कानून में संशोधन करते हुए ‘महानगरपालिका और उपमहानगरपालिका के बाहर स्थापित सिनेमाघरों को व्यवसाय शुरू करने की तिथि से १० वर्ष तक कर छूट’ प्रदान करने की व्यवस्था जोड़ी है।

चलचित्र क्षेत्र मनोरंजन के लिए है, परोपकार के लिए नहीं। यह छूट विशेष व्यक्तियों को ही लाभ पहुंचाने वाली दिखती है।

तीसरा– संसद में दर्ता विधेयक में व्यक्तियों को अपनी संतान के शिक्षण शुल्क भुगतान पर उस राशि को आयकर योग्य आय से घटाने का प्रावधान नहीं था। लेकिन मंत्रालय ने संशोधित विधेयक में ‘प्राकृतिक व्यक्तियों को संतान की शिक्षा के लिए किए गए भुगतान का २५ प्रतिशत या २५ हजार रुपये तक आय से घटाने’ की व्यवस्था की है।

चौथा– संसद में दर्ता विधेयक में ब्रिफकेस, वॉलेट, और सूटकेस पर लगने वाले कस्टम ड्यूटी की दर १५ प्रतिशत थी। लेकिन मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर मौजूद संशोधित विधेयक में इसे ३० प्रतिशत बढ़ा दिया है।

पाँचवां– संसद में दर्ता विधेयक के सड़क निर्माण दस्तूर में सभी विद्युत चालित वाहन पर ५ प्रतिशत दस्तूर लगाने का उल्लेख था। लेकिन अर्थ मंत्रालय ने नई छूट व्यवस्था के तहत २० लाख तक मूल्य वाली कुछ मोटर गाड़ियों पर केवल २.५ प्रतिशत दस्तूर लगाने की व्यवस्था की है।

छठा– आर्थिक विधेयक की धारा ११ में विद्युतीय वाहनों पर लगने वाले स्वच्छ पूर्वाधार निवेश शुल्क में संशोधन कर पैठारी बिंदु पर अंतःशुल्क देने वाले वाहनों पर शुल्क न लगने का प्रावधान जोड़ा गया है।

संसद में दर्ता विधेयक में बिना सांसदों को जानकारी दिए सरकार द्वारा संशोधन करना उचित नहीं है, संसद सचिवालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा। उन्होंने कहा, ‘त्रुटि सुधारना भी हो तो संसद प्रक्रिया के तहत ही किया जाएगा।’

नाम न छापने की शर्त पर बोले पूर्व अर्थ सचिव ने कहा, ‘हमारे समय में विधेयक में त्रुटि हो तो भी स्वतः संशोधन की अनुमति नहीं होती थी।’

संसद सचिवालय के सहसचिव तथा प्रवक्ता एकराम गिरि ने भी बताया कि आर्थिक और बजट से संबंधित विधेयक पारित और संशोधन की स्पष्ट प्रक्रिया होती है। उन्होंने कहा, ‘पहले विनियोजन विधेयक पर चर्चा होती है, फिर बजट आधारित विधेयकों पर चर्चा और संशोधन होता है। सांसदों को ७२ घंटे का संशोधन समय दिया जाता है।’

बजट आधारित विधेयक केवल मंत्रिपरिषद और राष्ट्रपतीय प्रमाणीकरण के बाद लागू होता है।

चार्टर्ड एकाउंटेंट शेषमणि दाहाल ने कहा है कि कर नीतियों में संशोधन के लिए नियमित संसदीय प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

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