
पत्रकार गिरीसहित ६ व्यक्तियों को ८ करोड़ रूपए का भुगतान कर जमानत पर रिहा करने का आदेश
जेठ २७, पोखरा। पोखराका मित्रमिलन बचत तथा ऋण सहकारी संस्था लिमिटेड के ठगी प्रकरण में पूरक अभियोग लगे ६ व्यक्तियों को धरौटी पर रिहा करने का आदेश कास्की जिला अदालत ने दिया है।
जिला न्यायाधीश श्यामप्रसाद श्रेष्ठ की अदालत ने मंगलवार को प्रतिवादियों से दावा किए गए बिगो के बराबर नगद या बैंक जमानत लेकर रिहा करने का आदेश दिया।
६ व्यक्तियों से कुल ८ करोड़ २४ लाख ६२ हजार २०३ रुपए का बिगो दावा किया गया था। कास्की जिला अदालत के सूचना अधिकारी रामबहादुर किसान ने बताया कि बिगो के बराबर राशि जमा कर रिहा करने का आदेश हुआ है।
अदालत ने सहकारी के धन हिनामिना में शामिल भरत भट्टराई से ३ करोड़ ५१ लाख ६३ हजार २०४ रुपए बिगो भरने को कहा है।
पत्रकार अर्जुन गिरी के लिए ३ करोड़ १८ लाख ६ हजार २५२ रुपए का बिगो तय किया गया है। सहकारी के उपाध्यक्ष विजय लम्साल से ६३ लाख ११ हजार २३३ रुपए भरकर रिहा करने का आदेश हुआ है।
सहकारी के शेयर सदस्य और संचालन समिति से सम्बंधित राजु बराल से ३६ लाख ८० हजार २३९ रुपए, राष्ट्रिय सहकारी बैंक के कर्मचारी संतोष घिमिरे से ३१ लाख १ हजार २७५ रुपए और शेयर सदस्य बुद्धिसागर पौडेल से २४ लाख रुपए का बिगो तय किया गया है।
बचतकर्ताओं का पैसा वापस करने की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उन्होंने अपनी चल-अचल व पैतृक संपत्तियों से भी रकम लौटाने को तैयार रहने की बात कही है, जो आदेश में उल्लेखित है।
सहकारी ठगी का मामला २०८० साल में अदालत में दायर किया गया था। अध्यक्ष रमण पौडेल, व्यवस्थापक किरण अधिकारी समेत वे फिलहाल पुर्पक्ष के लिए जेल में हैं।
अदालत ने बिगो अलग करने के बाद पूरक अभियोग दायर करने का आदेश दिया था। विशेषज्ञों से प्रत्येक प्रतिवादी के बिगो का खुलासा कराया गया और ऋणी को भी प्रतिवादी बनाया गया, जिससे आगे के अभियोग लगाए गए, क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने बयान दिया।
कुछ लोगों ने सक्षम राशि भी जांच के दौरान जमा कराई है, यह जानकारी जिला न्यायधिवक्ता कमला काफ्ले ने दी।
मित्रमिलन सहकारी में बचतकर्ताओं के पैसों के हिनामिने की शिकायत के बाद नेपाल सरकार ने सहकारी ठगी का केस दर्ज किया। पहले दायर मामले में ये आरोपी २०८० मंसिर के आसपास गिरफ्तार होकर जेल में बंद थे।
मित्रमिलन सहकारी प्रकरण में गण्डकी प्रदेश के पूर्व सहकारी रजिस्ट्रार उदयबहादुर पराजुली को उच्च अदालत पोखरा के आदेश पर २० लाख रुपए धरौटी देकर २०८० चैत में रिहा किया गया था।
अदालत के आदेश में उल्लेख है कि वे लंबे समय से जेल में थे, लेकिन मामले की अंतिम सुनवाई और गवाहों के बयान अभी बाकी हैं।
अदालत ने आदेश में बताया कि प्रतिवादियों ने सहकारी से जुड़ी कारोबार, शेयर सदस्यता तथा संचालन समिति में होने को स्वीकार किया, परंतु सहकारी ठगी का दोष अस्वीकार किया।
वे बचतकर्ताओं के पैसे वापस करने के लिए अपनी चल-अचल व पैतृक संपत्तियों से दायित्व उठाने को तैयार हैं, यह भी बयान आदेश में शामिल है।
आदेश में यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रतिवादी भागने, सबूत मिटाने या जांच प्रभावित करने का कोई खतरा फिलहाल नहीं है। अदालत ने सहकारी ऐन संशोधन के तहत सहकारी ठगी मामलों में मिलापत्र की व्यवस्था तथा राशि लौटने की संभावना को भी ध्यान में रखा है।
मित्रमिलन बचत तथा ऋण सहकारी में बचतकर्ताओं के पैसे वापस न मिलने, निक्षेपकों की मांग पूरी न होने और संस्थान की वित्तीय स्थिति खराब होने की शिकायतें सामने आने के बाद मामला उजागर हुआ। बचतकर्ताओं की शिकायत पर जांच शुरू हुई।
जांच में सहकारी के धन जोखिम में होने, संचालन और प्रबंधन स्तर के लोगों की भूमिका पर सवाल उठने तथा बचतकर्ताओं को पैसा वापस न मिला पाने पर सहकारी ठगी का मामला दर्ज किया गया। बाद में विस्तृत जांच से कुछ अन्य व्यक्तियों की भूमिका सामने आई, इसलिए पूरक अभियोग दायर किए गए।
जांच रिपोर्ट में सहकारी की बचत राशि सुरक्षित न होने, निक्षेपकों के पैसों पर खतरा होने और वित्तीय कारोबारी अनियमितताओं का उल्लेख था। बचतकर्ताओं को वापस रकम नहीं मिलने के कारण शिकायतकर्ताओं की दावों को आधार बनाकर अभियोजन शुरू किया गया।
अदालत ने पूरक अभियोग की सुनवाई में प्रतिवादियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी खुलने, बिगो चुकाने की प्रतिबद्धता जताने तथा मामला अंतिम परिणाम तक पहुंचने में समय लगने के कारण निरंतर हिरासत आवश्यक नहीं समझी।
अगर धरौटी या बैंक जमानत नहीं दी गई तो प्रतिवादियों को पूर्ववत् जेल में ही रखने और कास्की कारागृह भेजने का आदेश दिया गया।
मित्रमिलन सहकारी में ऋणियों को भी विपक्षी बनाकर पूरक अभियोग लगाया गया। इस सहकारी में ६० लोगों को विपक्षी बनाकर पूरक अभियोजन दर्ज किया गया था।
मित्रमिलन सहकारी प्रकरण में ७१४ बचतकर्ताओं ने ३१ करोड़ ७८ लाख रुपए वापस न मिलने की शिकायत की, जिसके आधार पर संचालक, पदाधिकारी, कर्मचारी और ऋणियों सहित शुरु में ३३ लोगों के खिलाफ सहकारी ठगी का मामला दर्ज हुआ था। बाद में ६ और लोगों के खिलाफ पूरक अभियोग दायर कर ८ करोड़ २४ लाख ६२ हजार २०३ रुपए का बिगो दावा किया गया।