‘यदि नेताओं ने कहा कि हम मिल गए हैं तो कांग्रेस बड़ा दल नहीं रह जाएगा’
सात दशकों का इतिहास लिए नेपाली कांग्रेस अब सबसे गंभीर स्थिति में पहुंच चुका है। २०१५ साल के चुनाव में दो-तिहाई सीटें जीतने वाली कांग्रेस २०८२ में लगभग ३८ सीटों तक सिमित हो गई है। आगामी चुनाव की पूर्व संध्या पर हुए विशेष महाधिवेशन में पार्टी के भीतर विवाद अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च अदालत ने विशेष महाधिवेशन को मान्यता दी है फिर भी संस्थापन पक्ष पूर्णतया संतुष्ट नहीं है। २०४८ और २०५६ में एकल बहुमत पाने वाली तथा २०७० और २०७९ में सबसे बड़ा दल बनने में सफल कांग्रेस अब एक छोटे दल में परिवर्तित हो चुकी है, लेकिन आंतरिक विवाद लगातार चालू हैं। इस ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो पुरानी लोकतांत्रिक पार्टी कांग्रेस आगे कैसे बढ़ेगी? क्या कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से किसी बड़े परिवर्तन की राह पर है या नेताओं के कार्यशैली सुधार से ही काम चल जाएगा? इस तरह के सवालों के साथ कांग्रेस राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले प्राध्यापक कृष्ण खनाल से संत गाहा मगर और केशव साव्द ने बातचीत की है।
असोज २०७९ में उन्होंने कहा था, “इस बार महामंत्री गगन थापा और विश्वप्रकाश शर्मा को कांग्रेस पर कब्जा करना चाहिए।” विशेष महाधिवेशन के बाद गगन सभापति और विश्वप्रकाश उपसभापति बने। अब देखते हैं कांग्रेस की यात्रा कैसी दिखती है? मैंने ‘कब्जा’ कहकर यह अभिप्रेत किया था कि पुराना नेतृत्व आसानी से छोड़ता नहीं है, नेतृत्व को जबरदस्ती लेना पड़ता है। उस वक्त कई लोगों ने कहा, ‘कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है, जहां कब्जा नहीं होता।’ यह भी सत्य है। लेकिन ऐसी स्थिति में नेतृत्व छोड़ने की इच्छा नहीं होती और यह आवश्यक हो जाता है कि नेतृत्व को ग्रहण किया जाए। निश्चित रूप से यही वजह है कि गगन और विश्वप्रकाश नेतृत्व में आए हैं। हालांकि नेतृत्व की राह आसान नहीं है। आगामी चुनाव के परिणाम उनके नेतृत्व के लिए चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं। पार्टी के भीतर असहमति की आवाजें शर्मनाक रूप से तीव्र हो गई हैं। ‘गगन नेतृत्व को सफलता नहीं मिली, सीटें घट गईं’ की आलोचना नेतृत्व को आंतरिक चुनौती दे रही है। राजनीतिक दृष्टिकोण से केवल किसी चुनाव की जीत या हार को समग्र मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। २०७४ के चुनाव में भी कांग्रेस हार गई थी, लेकिन अब कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। सीटें थोड़ी कम हुई हैं फिर भी कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल है। इसका राजनीतिक दल के रूप में महत्त्व बना रहता है। बावजूद इसके, विशेष महाधिवेशन से निर्वाचित नेतृत्व को कांग्रेस के भीतर आधिकारिक स्वीकार्यता कम मिली है। पूर्व सभापति शेरबहादुर देउवा और शेखर कोइराला के निकट समूह ने गगन को स्थिर समर्थन नहीं दिया है। यह समस्या सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं है, नेपाल के कई राजनीतिक दलों में स्थापना संबंधी चुनौतियां नजर आती हैं।