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युवा पीढ़ी द्वारा परंपरागत बाँसुरी बजाने की रक्षा में बढ़ती सक्रियता

काठमांडू। नेवार समुदाय में परंपरागत बाँसुरी बजाने की परंपरा काफी प्रसिद्ध है। इस परंपरा को निरंतर बनाए रखने के लिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कौशल का हस्तांतरण आवश्यक होता है। इसी क्रम में मध्यपुर थिमी–१ लोकन्थली स्थित सिद्धि गणेश दाफा भजन खलः ने बाँसुरी बजाने का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था। ९ महीने के प्रशिक्षण के बाद बाँसुरी बाजा वादन प्रशिक्षण का समापन और प्रदर्शन कार्यक्रम (बाजा पिथनेगु ज्याझ्वः) आयोजित किया गया। प्रशिक्षण समापन कार्यक्रम के अवसर पर रविवार को बाजा के साथ प्रदर्शन किया गया और नगर परिक्रमा भी की गई। ११ प्रशिक्षार्थी इस प्रशिक्षण में शामिल थे, जिनमें आठ वर्ष से लेकर ६० वर्ष तक के आयु वर्ग के लोग शामिल थे। परंपरागत बाजा सीखने को लेकर हम बेहद उत्साहित हैं, ऐसा प्रशिक्षण में भाग लेने वाले युवाओं ने बताया।

प्रशिक्षक साहिल द्वारे ने कहा, ‘अगर हम युवा पीढ़ी इसे संरक्षित नहीं करेंगे तो कौन करेगा? नेवारी संस्कृति, बाजा और परंपरा की रक्षा हमारा दायित्व है।’ २३ वर्षीय गुरु द्वारे इस प्रशिक्षण के शिक्षक हैं। उन्होंने बताया, ‘मैं जो परंपरागत कौशल जानता हूं, उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से प्रशिक्षण दे रहा हूं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘युवा वर्ग को संगीत की रक्षा करनी चाहिए, इसी सोच के साथ मैं केवल नेपाली गीत ही नहीं, बल्कि संगीत के कई पक्ष भी सिखा रहा हूं। राग, सुर, तानपुरा, नोटेशन और बीट कैसे गिनें, इसे भी सिखा रहा हूं।’ द्वारे ने बताया कि आधुनिक तकनीक को पुराने संगीत के साथ जोड़कर सिखाने का प्रयास चल रहा है। ‘बाँसुरी केवल एक कला नहीं बल्कि आजीविका का साधन भी बन सकती है, इसलिए इसे सिखाया जा रहा है,’ उन्होंने कहा।

नेवारी परंपरा में महत्वपूर्ण माने जाने वाले धाः बाजा का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। फिलहाल आठ लोग धाः बाजा प्रशिक्षण ले रहे हैं। सीखने इच्छुकों को ही यह प्रशिक्षण दिया जाता है और सभी का काम समाप्त होने के बाद शाम को प्रशिक्षण आयोजित किया जाता है, उन्होंने बताया। ‘प्रशिक्षार्थियों के साथ बैठकर बाजा बजाना एक अलग ही आनंद देता है,’ द्वारे ने कहा, ‘सभी आयु वर्ग के लोग आते हैं, जिन्हें सिखाते समय अलग-अलग अनुभव होते हैं।’ कुछ समय पहले तक नेवार समुदाय में बाजा बजाने का अर्थ महर्जन अर्थात ज्यापु लोगों से होता था, लेकिन अब इस प्रवृत्ति में परिवर्तन आया है। परंपरागत बाजा सीखने को लेकर युवा वर्ग बहुत उत्साहित और आकर्षित हो रहा है, ऐसा द्वारे ने साझा किया।

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