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तीन वटा निर्वाचनमा दलित उम्मेदवार जिताएको बाँके–३

तीन बार दलित उम्मीदवारों को विजयी बनाने वाला बाँके–३ निर्वाचन क्षेत्र

समाचार सारांश

  • बाँके क्षेत्र नम्बर ३ से राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी के खगेन्द्र सुनार तीसरी बार दलित समुदाय के उम्मीदवार के रूप में विजयी होकर प्रतिनिधि सभा पहुंचे हैं।
  • प्रतिनिधि सभा में प्रत्यक्ष क्षेत्र से दलित समुदाय का एकमात्र विजेता खगेन्द्र सुनार हैं, जो दलित प्रतिनिधित्व केवल ०.६१ प्रतिशत तक सीमित होने को दर्शाता है।
  • दलित अधिकारकर्मी जेबी विश्वकर्मा ने संविधान की धारा ४० के तहत अधिकारों के कार्यान्वयन के लिए एकीकृत कानून न बनाए जाने और दलित-मित्र नीतियों के अभाव को प्रमुख समस्या बताया है।

१० चैत, नेपालगंज। बाँके क्षेत्र नम्बर ३ ने तीसरी बार दलित समुदाय के उम्मीदवार को जिताकर प्रतिनिधि सभा भेजा है। २१ फागुन को संपन्न चुनाव में राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के उम्मीदवार खगेन्द्र सुनार ने बाँके–३ से विजयी हासिल की।

प्रतिनिधि सभा के प्रत्यक्ष चुनाव क्षेत्र १६५ में से दलित समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में केवल खगेन्द्र सुनार ही विजेता हैं। दलित कार्यकर्ता सुनार २९ पुस २०८२ को राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी में शामिल हुए थे।

नेपाल में कुल जनसंख्या का लगभग १३.४ प्रतिशत दलित समुदाय है, लेकिन इस बार प्रत्यक्ष चुनाव में एकमात्र दलित उम्मीदवार की जीत से दलित प्रतिनिधित्व केवल ०.६१ प्रतिशत तक सीमित हो गया है।

नेपाल के संविधान २०७२ की प्रस्तावना में समानुपातिक समावेशी और सहभागिता सिद्धांत को आधार मानकर समानता और समावेशन का निर्माण करने का दावा किया गया था, लेकिन प्रत्यक्ष मत के परिणाम ने संविधान के उद्देश्य को पूरा नहीं किया है।

इस चुनाव में नेपाली कांग्रेस ने बझाङ से सहमहामन्त्री और दलित समुदाय के प्रकाश रसाइली स्नेही को केवल उम्मीदवार बनाया था, जबकि एमाले ने डडेल्धुरा–१ से चक्र स्नेही और बर्दिया–२ से विमला विक को उम्मीदवार बनाया था।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने स्याङ्जा–२ से पदम विश्वकर्मा और कञ्चनपुर–३ से मानबहादुर सुनार को मैदान में उतारा था, पर वे कोई भी जीत हासिल नहीं कर सके।

संविधान की धारा ४० सभी सरकारी संस्थाओं में दलितों को समानुपातिक समावेशिता के आधार पर भागीदारी सुनिश्चित करती है, लेकिन इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन में मुख्य राजनीतिक दल उदासीन नजर आते हैं।

१३.४ प्रतिशत जनसंख्या के बावजूद दलित समुदाय में कांग्रेस और रास्वपा ने केवल ०.६१ प्रतिशत अर्थात एक ही प्रत्यक्ष उम्मीदवार को टिकट दिया, जबकि एमाले और नेकपाले दो-दो उम्मीदवार उतारे, कुल मिला कर दलित उम्मीदवार १.२१ प्रतिशत बने।

दलित अधिकारकर्मी और लेखक जेबी विश्वकर्मा ने कहा, ‘बड़े दल प्रत्यक्ष टिकट rarely दलित नेताओं को नहीं देते, देते भी तो जितने की संभावना वाले क्षेत्रों की संख्या बहुत कम मिलती है।’

प्रतिनिधि सभा में प्रत्यक्ष दलित प्रतिनिधित्व घट रहा है, परन्तु बाँके–३ ने २०४८, २०७० और २०८२ में दलित प्रतिनिधि सफल कर संसद भेजा है।

२०४८ में इस क्षेत्र से कांग्रेस के कृष्णसिंह परियार चुने गए थे, जिन्होंने राज्य व्यवस्था समिति की अध्यक्षता भी की थी।

२०७० की संविधान सभा चुनाव में बाँके–३ से एमाले के दलबहादुर सुनार निर्वाचित हुए, जिन्होंने कड़ाई से दलित मुद्दों को उठाया।

हाल ही के चुनाव में बाँके–३ से रास्वपा के खगेन्द्र सुनार जीते हैं।

दलित अधिकारकर्मी प्रकाश उपाध्याय के अनुसार, बाँके–३ से दलित उम्मीदवारों की निरंतर सफलता का मुख्य कारण क्षेत्र में १७-१८ हजार तक दलित मतदाताओं की संख्या और दलित समुदाय के अंदर अपनी प्रतिनिधि चुनने की जरूरत है।

बाँके–३ क्षेत्र दलित बहुल क्षेत्र है, जहां करीब ९ प्रतिशत पहाड़ी और ६ प्रतिशत मधेसी, कुल मिलाकर १५ प्रतिशत दलित समुदाय रहते हैं। यहाँ १,१७,३५४ मतदाताओं में १७,६३१ दलित मतदाता हैं।

दलित समुदाय की मुख्य मांगें क्या हैं?

दलित अधिकारकर्मी एवं लेखक जेबी विश्वकर्मा के अनुसार दलित समुदाय की सबसे बड़ी समस्या संविधान की धारा ४० के तहत उपलब्ध अधिकारों को लागू करने के लिए एकीकृत कानून न बनने की है।

धारा ४० समानुपातिक सहभागिता, निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, कौशल और तकनीक संरक्षण, भूमि व्यवस्था, आवास अधिकार और समानुपातिक वितरण का प्रावधान करती है, लेकिन एकीकृत कानून न होने से दलित समुदाय अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग नहीं कर पा रहा।

सरकारी बजट और नीतियां दलित-मित्र नहीं होने के कारण नेपाल में गरीबी दर औसतन २०.३ प्रतिशत है, जबकि दलित समुदाय में यह लगभग ४१ से ४२ प्रतिशत के करीब है, जो राष्ट्रीय औसत का दोगुना है। सरकार की नीतियां दलित गरीबी कम करने में प्रभावी साबित नहीं हो पाई हैं।

नेपाल में लगभग ३९ प्रतिशत दलित भूमिहीन हैं। वर्षों से भूमि और सुकुम्बासी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है।

प्रतिनिधि सभा में निर्वाचित दलित सांसदों से इन मुद्दों पर जागरूक आवाज उठाने की उम्मीद की जाती है।

खगेन्द्र सुनार कौन हैं?

खगेन्द्र सुनार का जन्म २ जेठ २०४७ को दैलेख के नारायण नगरपालिका–५ छातीकोट में हुआ था। उनकी पढ़ाई कक्षा ८ से प्लस टु तक सुर्खेत के वीरेन्द्रनगर में हुई। २०६६ से वे कलाकारिता और रेडियो पंचकोशी से पत्रकारिता करते आए।

वह काठमांडू आरआर क्याम्पस से राजनीतिक विज्ञान और इतिहास में स्नातक हैं। पत्रकारिता के साथ-साथ वे दलित अभियान के संयोजक भी थे।

अंतरजातीय विवाह के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा। दैलेख की सीता गुरुङ से प्रेम विवाह किया, लेकिन शादी के बाद सीता अपनी मायके नहीं जा पाईं।

२०७७ जेठ १० को रुकुम पश्चिम के नवराज विक सहित ६ लोगों की हत्या के बाद खगेन्द्र दलित आंदोलन में प्रखर और आक्रामक कार्यकर्ता के रूप में उभरे।

२०७८ जेठ से उन्होंने दलितों के लिए ‘खै’ अभियान शुरू किया और २०८१ साउने २३ से माइतीघर में नेल लगाकर तथा प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किए।

प्रतिकात्मक विरोध के माध्यम से उन्होंने दलित समुदाय के भेदभाव और वंचना के मुद्दे को आम जनता के ध्यान में लाया।

२०८२ में उन्होंने ‘हमारा पार्टी नेपाल’ नामक पार्टी दर्ता कर राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के साथ एकता की।

२१ फागुन को संपन्न प्रतिनिधि सभा चुनाव में रास्वपाने खगेन्द्र सुनार को बाँके–३ से उम्मीदवार बनाया। भले ही उनका परिवार दैलेख का है, पर वे काठमांडू में रहकर दलित अभियान में सक्रिय हैं और इस क्षेत्र के नए चेहरे माने जाते हैं।

दलित बहुल बाँके–३ से खगेन्द्र ने मतदाताओं का विश्वास जीतकर प्रतिनिधि सभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए हैं।

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