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यक्ष प्रश्नों की उत्पत्ति

मेरे दो हाथ हैं। तेरे भी दो हाथ हैं। मेरे दो पैर हैं। तेरे भी दो पैर हैं। मैं बोलता हूँ। तू भी बोलता है। मेरा नाम है। तेरा भी नाम है। मैं सांस लेता हूँ। तू भी लेता है। मैं मानव हूँ। तू भी मानव है। लेकिन मुझमें और तुझमें क्या अंतर है? इसलिए, मेरा दिल और मस्तिष्क काम कर रहे हैं। मेरे हाथ और पैर सक्रिय हैं। मेरे शरीर की नसें भावविहीन हैं। मैं निस्संदेह स्तब्ध हूँ।

हजारों वर्षों से छुआछूत का खेल चलता आ रहा है। भगवान ने बनाए संसार के सभी मानव समान हैं। फिर भी इंसानों में विभिन्न प्रकार के भेदभाव क्यों हैं? यह अपमान और तिरस्कार कब तक चलेगा? यह प्रश्न स्वयं में यक्ष प्रश्न बन चुका है। भगवान बुद्ध की पवित्र भूमि में सामाजिक द्वेष और भेदभाव? जगत जननी सीता माता की पावन भूमि में अत्याचार, अन्याय, बलात्कार और उत्पीड़न? भगवान पशुपतिनाथ के देश में धर्म, संस्कृति और रीति-रिवाज के नाम पर घृणा, हिंसा और क्रूरता? आखिरकार ये सब कब तक? यह प्रश्न स्वयं में यक्ष प्रश्न बन चुका है।

पशु-पक्षी और वनस्पतियों में कोई छुआछूत नहीं है। वर्ण और बनावट केवल जीवों का खेल है, सृजित फिनोटाइपिक विविधता है। मानव जाति में 99 प्रतिशत आनुवंशिक समानता मौजूद है। सभी मनुष्यों को भगवान ने समान रूप से बनाया है। तो फिर मानव जाति में छुआछूत और भेदभाव क्यों? यह प्रश्न स्वयं में यक्ष प्रश्न बन चुका है।