
प्राज्ञिक स्वतंत्रता और सुरक्षा सतर्कता: जम्मू-कश्मीर के पुस्तकों की समीक्षा का आदेश
जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों ने शैक्षिक संस्थाओं की पुस्तकालयों और सामग्रियों में आपत्तिजनक विषयों की जांच करने का नया आदेश जारी किया है। इस आदेश में आतंकवाद, पृथकतावाद और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाली सामग्री का पता लगाकर हटाने को कहा गया है, जबकि शिक्षाविदों ने इसे प्राज्ञिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा दो पुस्तकों पर पृथकतावादी विचारधाराओं का महिमामंडन करने का आरोप लगाने के बाद प्रशासन ने यह सख्त कदम उठाया है, जिसका विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया है।
1 साउन, काठमांडू। जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों ने सभी शैक्षिक संस्थाओं को ‘अनुचित और आपत्तिजनक’ सामग्री वाले पुस्तकों की समीक्षा करने का नया आदेश जारी किया है। इस कदम के बाद कक्षाओं में इस क्षेत्र के इतिहास को किस तरह प्रस्तुत किया जाएगा और यह निर्णय कौन करेगा, इस पर चर्चा शुरू हो गई है। पिछले सप्ताह जारी आदेश के अनुसार स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और कोचिंग संस्थानों को अपने परिसरों में मौजूद सभी प्रकाशित सामग्रियों की जाँच करने निर्देश दिए गए हैं। इसमें शोध पत्र और शैक्षिक थीसिस भी शामिल हैं।
अधिकारियों ने कहा कि यह निर्देश अध्ययन की स्वतंत्रता को रोकने के लिए नहीं है, बल्कि ‘तथ्यगत रूप से गलत या गैरकानूनी’ सामग्री को हटाने का उद्देश्य है। इसमें ‘आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद, पृथकतावाद, कट्टरपंथ या राष्ट्र सुरक्षा विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने, उनका महिमामंडन करने या वैध ठहराने’ वाली सामग्री शामिल है। लेकिन विपक्षी दलों, शिक्षाविदों और छात्रों ने इसे प्राज्ञिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए कहा है कि यह कश्मीर के इतिहास को मिटाने का प्रयास है।
भारतीय जनता पार्टी के आरोपों के बाद यह आदेश जारी किया गया। जम्मू-कश्मीर के महान व्यक्तित्वों पर आधारित उन पुस्तकों के विवादास्पद होने के बाद उन्हें हटाया गया है। बाद में पुलिस ने प्रकाशन से संबंधित तीन लोगों को गिरफ्तार किया और शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया। जम्मू-कश्मीर के विद्वानों की प्रतिक्रिया में स्कूल शिक्षा निदेशक नसीर अहमद वानी ने बताया कि एक समिति विद्यालयों और पुस्तकालयों में मौजूद पुस्तकों की समीक्षा करेगी। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि किन सामग्री को ‘आपत्तिजनक’ माना जाएगा।