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‘रविमाथि संगठित अपराध र सम्पत्ति शुद्धीकरणको अभियोगले न्यायको ढोका बन्द हुन्छ’

‘रवि पर लगे संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोपों से न्याय के द्वार बंद होते हैं’

८ चैत्र, काठमांडू। महा न्यायाधिवक्ता सबिता भण्डारी बराल ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सभापति रवि लामिछाने पर सहकारी ठगी के अलावा लगाये गए संगठित अपराध एवं संपत्ति शोधन के आरोपों के कारण पीड़ितों के न्याय पाने के रास्ते जटिल होते जाने का निष्कर्ष निकाला है।

रास्वपा सभापति रवि लामिछाने के मामले में संशोधन के निर्णय के विरोध में सर्वोच्च अदालत में दायर रिट याचिका के जवाब में प्रस्तुत दायर फाइल में इस प्रकार तथ्य उल्लेखित हैं।

महा न्यायाधिवक्ता भण्डारी ने संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप होने से पीड़ितों का रकम वापस पाने का मार्ग बंद होने के कारण इन दो अतिरिक्त आरोपों को संशोधित कर फिर्ती का निर्णय करने की आवश्यकता व्यक्त की है।

महा न्यायाधिवक्ता के निर्णय के पूर्ण पाठ में कहा गया है, ‘जिन्हें निक्षेपकर्ता (पीड़ित वर्ग) की रकम वापस मिलने की संभावना जीवंत रखना चाहते हैं, उनके लिए मिलापत्र संभव रहे इसका संरक्षण करना आवश्यक है। इस हेतु मौलिक दंड प्रक्रिया संहिता, २०७४ की धारा ३६ के अनुसार अभियोग संशोधन के लिए आवेदन देना उचित प्रतीत होता है।’

‘संसदीय समिति ने विषय उठाया’

काठमांडू, रूपन्देही, कास्की समेत जिलों के सरकारी वकील कार्यालयों से निकासी हेतु दायर मामलों में संलग्न कागजात एवं महा न्यायाधिवक्ता तथा नायब महा न्यायाधिवक्ता ने निकासी हेतु टिप्पणियाँ पेश की हैं। इनमें प्रस्तुत तथ्य निम्नानुसार हैं:

१. सहकारी की रकम का अपव्यय एवं हिनामिना संबंधी अदालतों में सहकारी संस्थाओं के संचालकों के विरुद्ध चल रहे मामले जिसमें रवि लामिछाने ने आवेदन किया है।

इस कार्यालय में दिनांक २०८२ मंसिर २३, २०८२ पुष २० एवं ۲۰۸۲ पुष २३ को उनके विरुद्ध राजनीतिक प्रतिशोध के तहत सहकारी ठगी, संगठित अपराध व संपत्ति शोधन के आरोप में मामला दायर करने का अनुरोध किया गया है।

आवेदन के संबंध में प्रस्तुत टिप्पणियाँ और संलग्न मिसिल दस्तावेज अध्ययन करने पर तथ्य इस प्रकार हैं:

क) विभिन्न तिथियों पर सहकारी संस्थाओं में बचतकर्ताओं की रकम के अपव्यय की शिकायतें दर्ज हुई हैं।

तदुपरांत, संघीय संसद के अधीन सहकारी समस्याओं की पहचान व समाधान के लिए सुझाव देने हेतु बचतकर्ताओं की रकम के अपव्यय करने वालों के प्रति कार्रवाई की सिफारिश करने वाली संसदीय विशेष छानबीन समिति २०८१ बनाई गई है।

समिति ने विभिन्न सहकारी संस्थाओं से पैसे कंपनियों में संचालित करने पर विस्तृत अध्ययन कर २०८१ में छानबीन रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इस रिपोर्ट में उल्लेख है, ‘सहकारी संस्थाओं से गोरखा मीडिया प्रालि को रकम आने की प्रक्रिया में रवि लामिछाने की संलिप्तता के स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं, लेकिन उक्त रकम गोरखा मीडिया तक पहुंचने के बाद उनके संचालन खर्च में उनकी भागीदारी दिखती है।’ (संसदीय विशेष छानबीन समिति की रिपोर्ट पृष्ठ ४४९)

रिपोर्ट कार्यान्वयन के लिए संघीय संसद सचिवालय ने नेपाल सरकार को भेजा तथा गृह मंत्रालय को संबंधित सुझाव एवं सिफारिश मंत्रिपरिषद के निर्णयानुसार क्रियान्वयन हेतु प्रेषित किया।

ख) गृह मंत्रालय ने उक्त निर्णयानुसार पुलिस प्रधानालय को पत्र भेज कर आवश्यक कार्रवाई हेतु निर्देशित किया।

इसमें संसदीय छानबीन समिति की रिपोर्ट एवं सुझावों के आधार पर आवश्यक निर्देश शामिल हैं।

पुलिस प्रधानालय ने जिलों को सुझाव कार्यान्वयन हेतु पत्र भेजा तथा उसी आधार पर जांच आगे बढ़ी।

ग) उक्त रिपोर्ट एवं स्थानीय छानबीन रिपोर्ट के आधार पर कास्की जिला अदालत ने २०८१ असोज १८ को बचतकर्ताओं की रकम के अपव्यय का मामला दायर किया।

जालसाजीपूर्ण शिकायत में नाम जोड़ा गया

मामले में जांच के दौरान तथ्य न मिलने पर पुनः शिकायत दर्ज कर रवि लामिछाने का नाम जोड़ा गया।

संसदीय रिपोर्ट और बाद में दर्ज शिकायत के आधार पर बिना अतिरिक्त जांच के अवैध अपराध जोड़ा गया और आरोप पत्र दाखिल किया गया।

२०८१ पुष ७ को सहकारी ठगी, संगठित अपराध एवं संपत्ति शोधन के साथ पूरक आरोप पत्र दाखिल हुआ।

घ) २०८१ पुष २१ को काठमांडू जिला अदालत में स्वर्णलक्ष्मी बहुउद्देश्यीय सहकारी संस्था में बचतकर्ताओं की रकम के अपव्यय का मामला दर्ज हुआ।

ङ) २०८१ वैशाख ३ को रुपन्देही जिला अदालत में सुप्रीम बचत एवं ऋण सहकारी संस्थाओं के बचतकर्ताओं के रकम के अपव्यय का मामला दर्ज था।

उपरोक्त उल्लेखित सहकारी ठगी मामलों में संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप भी शामिल कर पूरक अभियोग पत्र दाखिल किया गया।

च) २०८१ माघ २२ को चितवन जिला अदालत में साहारा चितवन बहुउद्देश्यीय सहकारी संस्था लिमिटेड के बचतकर्ताओं की रकम के दुरुपयोग के आरोप में ठगी संबंधी मामले में याचिकाकर्ता को प्रतिवादी बनाया गया।

छ) २०८० असोज २३ को पर्सा जिला अदालत ने सानो पाइला बचत एवं ऋण सहकारी संस्था लिमिटेड के बचतकर्ताओं के रकम दुरुपयोग के आरोप में मामला दर्ज किया।

उसके बाद २०८० फागुन २ को संगठित अपराध के आरोप जोड़े।

२०८२ जेठ २९ को सहकारी संचालक समिति या सदस्य न होने वाले व्यक्तियों को भी प्रतिवादी बनाकर सहकारी ठगी व संगठित अपराध के आरोप जोड़े गए।

नारायणबहादुर पहराई का आवेदन

सामान्यतः सभी सहकारी संस्थाओं में बचतकर्ताओं की रकम के दुरुपयोग का आरोप ही दर्ज है।

२) २०८२ पुष ३ को रुपन्देही के सुप्रीम सहकारी के बचतकर्ता नारायणबहादुर पहराई ने अपनी वास्तविक शिकायत अलग होने का दावा करते हुए स्वघोषणा सहित आवेदन अदालत में दायर करवाना चाहा पर दायर नहीं किए जाने के प्रमाण प्राप्त हैं।

उनके पत्र में उल्लेख है–

‘मैंने सहकारी संस्था के अलावा किसी अन्य के विरुद्ध मामला नहीं दायर किया। मुझे गलती से सहकारी में बचत करने के लिए विवश किया गया, जिसे रवि लामिछाने ने नहीं कहा। मेरी बचत के दुरुपयोग में जिन्हें जिम्मेदार नहीं हैं, उनके खिलाफ शिकायत देना उचित नहीं है। मेरा नियमित किया गया शिकायत पूर्णतः झूठी जानकारी के साथ तैयार की गई है। मेरी वास्तविक शिकायत २०८१ असोज ४ की है।’

इस स्वघोषणा को नोटरीकृत कर जांच अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।

यह मामले की अभियोजन स्थिति से भिन्न प्रतीत होता है। पीड़ित की स्वघोषणा को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

बचत है मुख्य प्राथमिकता

३) सभी मामलों की शुरुआत संसदीय विशेष छानबीन समिति से हुई और समिति की रिपोर्ट में रवि लामिछाने की कोई संलिप्तता नहीं पाई गई।

समिति ने गैरकानूनी तरीके से रकम लेने और खर्च करने वालों को कानूनी जवाबदेह बनाने के सुझाव दिए।

सहकारी से रकम सही तरीके से संस्थाओं में हस्तांतरित हुई दिखने पर इसके नियंत्रण के लिए कंपनी कानून के अनुसार सिफारिश की गई।

सहकारी पीड़ित एवं बचतकर्ता महा न्यायाधिवक्ता के कार्यालय में प्रतिनिधिमंडल के रूप में आए और ‘हमारे खिलाफ क्या-क्या मामले हैं, इससे हमारा सरोकार नहीं लेकिन हमारी बचत राशि वापस होनी चाहिए’ की गुहार लगाई।

सहकारी बचतकर्ताओं का मुख्य मुद्दा अपनी रकम वापस न मिलना और दुरुपयोग होना है। राज्य को बचतकर्ता के हित और रकम की सुरक्षा की मुख्य भूमिका निभानी चाहिए।

सहकारी से रकम वापस पाना चाहने वाले बचतकर्ता अब मामले दायर कर शिकायत कर रहे हैं।

न्याय के द्वार बंद हो गए

क) चितवन जिला अदालत को छोड़कर अन्य जिलों की अदालतों में केवल सहकारी ठगी पर अभियोजन शुरू किया गया लेकिन बाद में संगठित अपराध व संपत्ति शोधन की धाराएं जोड़कर आरोप पत्र दाखिल किया गया।

सहकारी ऐन, २०७४ (संशोधित २०८१) की धारा १३१(क) के अनुसार सहकारी ठगी का मामला मेल-मिलाप हो सकता है पर संगठित अपराध और संपत्ति शोधन में मिलापत्र संभव नहीं है।

सहकारी बचतकर्ता अपनी बचत न मिलने पर न्याय हेतू अंतिम विकल्प शिकायत करने को मजबूर हैं।

कम आय वर्ग द्वारा अर्जित बचत का शीघ्र वापसी राज्य का प्रमुख दायित्व है।

‘जानकारी के आधार पर कनक जाता है कि अभियोजन द्वारा सहकारी ठगी के साथ-साथ संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप लगाने से पीड़ितों को न्याय का मार्ग बंद हो रहा है।’

संगठित अपराध और संपत्ति शोधन पर दंड हो सकता है, जिसमें जुर्माना या रकम जब्त होना संभव है, जो पीड़ित के हित के विपरीत है।

जमाहिर की जमा राशि अप्रत्यक्ष रूप से संपत्ति शोधन से संबंधित होने पर रकम जब्त हो सकती है और खो सकती है।

ख) विभिन्न सहकारी संचालक या भूमिका निभाने वाले फर्जी लोन देने, फर्जी खाते खोलने वालों से बचतकर्ता की रकम वसूल सकते हैं।

साथ ही ‘सहकारी से कंपनी में भेजी गई रकम के भुगतान के लिए कंपनी की संपत्ति बेच कर चुक्ता किया जा सकता है।’

इस स्थिति में संगठित अपराध और संपत्ति शोधन का आरोप बना होने से उपलब्ध कानूनी रास्ता भी बंद हो जाता है, जो पीड़ित की भावना के विपरीत है।

मिलापत्र द्वारा समाधान की राह खोलनी चाहिए, यह कानूनी औचित्य है।

ग) संसदीय विशेष छानबीन समिति के निष्कर्ष और सिफारिश ही मामले का आधार हैं।

यह चिकित्सकीय एवं कानूनी उपाय अपनाकर बचतकर्ताओं की रकम वापस दिलाई जानी चाहिए।

‘मिलापत्र का मार्ग खुला रहे’

संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप लगाकर सहकारी बचतकर्ता मिलापत्र से रकम पाने के मार्ग को बंद होने से बचाना आवश्यक है।

संसदीय समिति के अनुसार बचत राशि जल्द से जल्द वापस होना ज़रूरी है।

इसलिए, कानूनी प्रक्रिया जारी रहते हुए भी संशोधित कानून के अनुसार निक्षेप फिर्ता की समस्या का समाधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

घ) इसके लिए मौलिक दंड प्रक्रिया संहिता, २०७४ की धारा ३६ के अनुसार आरोप पत्र संशोधित कर पीड़ित को न्याय दिलाने की सुनिश्चितता दी जानी चाहिए।

प्रारंभ, अतिरिक्त व पूरक आरोप पत्रों में सहकारी ठगी के अलावा संगठित अपराध व संपत्ति शोधन के आरोप हटाकर निक्षेपकर्ता के रकम वापसी की संभावना बनाए रखने हेतु संशोधन करना सुझावित है।

संगठित अपराध व संपत्ति शोधन के आरोप वापस करने का निर्णय

४) उपरोक्त तथ्य और कानूनी आधार पर यह निर्णय लिया गया है।

क) याचिकाकर्ता रवि लामिछाने ने अपने ऊपर राजनीतिक प्रतिशोध के लिए सहकारी ठगी, संगठित अपराध व संपत्ति शोधन के आरोप लगाए जाने का दावा कर निकासी की मांग की।

मौलिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ३६ के अनुसार अभियोग संशोधन आवश्यक है जिससे पीड़ित बचतकर्ता के हित को प्राथमिकता मिले।

कास्की, काठमांडू, रूपन्देही, पर्सा और चितवन जिलों की अदालतों में सहकारी ठगी का आरोप बनाए रखते हुए संगठित अपराध और संपत्ति शोधन के आरोप हटाकर संशोधन करने की अनुमति दी गई।

इस निर्णय के अनुसार संबंधित जिलों के सरकारी वकील कार्यालयों को कार्रवाई आगे बढ़ाने हेतु सूचित किया जाएगा।

२०८२ पुष ३०

सबिता भण्डारी

महा न्यायाधिवक्ता

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इसी प्रकार २०८२ माघ २ को उपरोक्त निर्णय के प्रकरण संख्या ४(क) के ११वें हरफ में ‘सम्पत्ति शोधन के अभियोग दावा नजदीक ‘निज के हक में’ शब्द हटा दिए गए।

२०८२ माघ २

सबिता भण्डारी

महा न्यायाधिवक्ता

(महा न्यायाधिवक्ता कार्यालय द्वारा सर्वोच्च अदालत में प्रस्तुत निर्णय का संपादित अंश)

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