
भारत की महान ‘स्टेज क्वीन’ चपल भादुरी की कथा
लेखक जानकारी: बीसवीं शताब्दी के मध्य में पूर्वी भारत के बंगाल में रंगमंच की प्रसिद्ध ‘महिला स्टार’ में से कई कलाकार असल में पुरुष थे। इन्हीं में से चपल भादुरी सबसे चर्चित थे। उन्हें ‘चपल रानी’ के नाम से जाना जाता था। उन्हें ‘जात्रा’ की रानी कहा जाता था और कभी यह घूमते रंगमंच बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता था। पुरुष कलाकारों द्वारा महिलाओं की भूमिकाएं निभाने की परंपरा उस समय यूरोप से लेकर जापान और चीन तक विश्वभर के रंगमंचों में सामान्य थी। यह परंपरा बंगाल में जात्रा के रूप में विकसित हुई। भले ही आमदनी कम होती थी, ग्रामीण खुली जगहों पर होने वाले संगीत और मिथक से भरपूर मेले वाले नाटक उस समय के सिनेमा के समान लोकप्रियता रखते थे। काव्य और भक्ति कथाओं पर आधारित ये नाटक खुले मंच पर प्रस्तुत किए जाते थे। इन प्रस्तुतियों में जोरदार आवाज, हाव-भाव और विशेष भेष-भूषा देखने को मिलती थी। नई पुस्तक “चपल रानी: द लास्ट क्वीन ऑफ बंगाल” में लेखक संदीप रॉय ने भादुरी की स्टारडम से अनदेखेपन तक की यात्रा का अनुसरण किया है। यह एक खोती दुनिया को सामने लाता है जहाँ लैंगिक पहचान खुद एक अभिनय थी। ऐसे जात्राओं में महिलाओं के किरदार पुरुषों द्वारा निभाए जाने का चलन कई सालों तक रहा। उन्हें “पुरुष रानी” कहा जाता था। लेकिन इसके चरम काल में भी इस विधा को सामाजिक कलंक की तरह देखा जाता था। उपनिवेश काल में यूरोपीय प्रीतियों से प्रभावित कोलकाता के उच्च वर्ग द्वारा जात्रा को अक्सर ‘गांववाला या असंस्कृत’ माना जाता था। 19वीं सदी में एक एंग्लो-इंडियन पत्रिका ने महिलाओं का रोल निभाने वाले पुरुषों की आवाज को अस्वाभाविक मानते हुए उसकी तुलना सियार की आवाज से की थी। 1950 के दशक में भादुरी रंगमंच में आये जब यह दुनिया परिवर्तन के दौर में थी। महिलाएं अभिनय करने लगी थीं, जिससे पुरुष कलाकारों के लिए स्थान सीमित हो रहा था। इसके बावजूद भादुरी ने अपनी खास पहचान बनाई। 1939 में उत्तर कोलकाता में रंगमंच अभिनेत्री प्रभा देवी के परिवार में जन्मे भादुरी कलाकार समुदाय में ही पले-बढ़े। उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में अभिनय शुरू किया। “मेरा हाव-भाव और स्वर लड़की जैसा था,” वे बाद में कहते थे। मंच पर उनका रूपांतरण पूरी तरह से होता था। उन्होंने रानी, देवी और देह व्यापार करने वाली महिलाओं की भूमिकाएँ कुशलता से निभाई। उनके परिधान ध्यानपूर्वक बनाए जाते थे और कई बार तत्काल तैयार किए जाते थे। स्तनों को आकार देने के लिए पहले कपड़े के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता था, बाद में स्पंज का उपयोग शुरू हुआ। महिला बनने के लिए विभिन्न क्रीमों का इस्तेमाल करते और छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते। “स्त्रीत्व हमेशा मेरे हिस्से का था,” भादुरी कहते थे। उनकी प्रस्तुतियाँ केवल हास्य या व्यंग्य नहीं थीं, न ही नक़ल मात्र। वे गहरे अनुभव में डूब कर अभिनय करते थे। क्वियर संकेतों वाले पात्रों को आमतौर पर मजाक का विषय बनाया जाता था, लेकिन भादुरी का काम इसका अलग महत्व रखता था। रॉय लिखते हैं, “समलैंगिक या क्वियर पात्रों को अक्सर उपहास में प्रस्तुत करने वाले भारतीय रंगमंच में चपल भादुरी ने महिलाओं के रूप में अपनी भूमिका ईमानदारी और साहस के साथ निभाई।” रंगमंच के बाहर भादुरी का जीवन और भी जटिल था। उस समय मध्यम वर्गीय बंगाली समाज जटिल था, इसलिए वे खुले तौर पर समलैंगिक नहीं माने गए, पर प्रशंसा से परिपूर्ण थे। प्रशंसकों और प्रेमीओं की ओर से स्नेहपूर्ण पत्र और प्रेम प्रस्ताव आते थे। भादुरी चयन में सतर्क थे और इसमें गर्व महसूस करते थे। पर वे स्पष्ट रूप से कहते थे, “मैं प्रेम के लिए माफी नहीं मांगता।” उनके साथी विवाह कर बच्चे भी हुए। भादुरी का मूल परिवार हमेशा वहीं था। उनकी मौजूदगी थी पर पूर्ण स्वीकृति नहीं मिली और अंत में वे एक घरेलू सहायक जैसे बन गए। उनके समकालीन गरीबी में फंसे। कुछ सिलाई का काम करने लगे, कुछ चाय और बादाम बेचना शुरू किया, कुछ शारीरिक श्रम करने लगे, एक ने आत्महत्या कर ली। ये कहानियां अक्सर दर्ज नहीं की गईं। भादुरी ने भी जीवन के लिए पुस्तकालय में सफाई और धूल झाड़ने जैसे काम किए। एक बार उन्होंने सड़क पर शीतला देवी की भूमिका भी निभाई। पिछले दशक में वे कुछ समय के लिए फिर सामने आए। बंगाली फिल्म निर्देशक कौशिक गांगुली ने अपनी फिल्मों में भादुरी को भूमिकाएँ दीं। 1999 में कोलकाता के प्रकाशन गृह एवं रंगमंच संचालक नवीन किशोर ने भादुरी के जीवन को फिल्म और प्रदर्शनी के माध्यम से अभिलेखित किया। इससे नई पीढ़ी भादुरी को अलग नजरिए से देखने लगी। रॉय लिखते हैं, “भारत में LGBTQ+ आंदोलन नया था और समलैंगिक इतिहास का अभाव था, इसलिए उन्होंने भादुरी को मार्गदर्शक के रूप में चुना।” लेकिन भादुरी ने स्वयं को किसी लेबल से दूर रखा। उन्हें “तीसरा लिंग” जैसे शब्द नहीं पता थे। रॉय के अनुसार, रंगमंच के बाहर वे अन्य बंगाली पुरुषों की तरह कुर्ता-पजामा पहनते थे। इससे उनकी जीवन व्याख्या और जटिल हो जाती है। “वे एक क्वियर के रूप में अस्तित्व में थे,” रॉय टिप्पणी करते हैं। आज दुनिया भर में लिंग और पहचान के विषय व्यापक चर्चा में हैं, भादुरी की कहानी एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यह अभिनय कला के उस इतिहास को दिखाता है जहाँ लिंग लचीला था, भले नाम से वह पहचाना न जाता हो। भादुरी अब एक वृद्धाश्रम में रहते हैं, जो उनके जन्म स्थान के नजदीक है। हालांकि वहां उन्हें स्वागत नहीं मिलता। वे पुरानी यादों को संभाले स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। क्यों कुछ कलाकार याद किए जाते हैं और कुछ भुला दिए जाते हैं? क्यों कुछ कला संग्रहित होती है और कुछ कला करने वालों के साथ खो जाती है? भादुरी के जीवन को दस्तावेजीकृत कर रॉय ने इन सवालों का जवाब देने या सामना करने का प्रयास किया है। भादुरी ने छह दशक से अधिक समय रंगमंच क्षेत्र में बिताया। किसी भी मानक से वे एक स्टार थे। फिर भी वर्षों तक वे उस संस्कृति के विसर्जन में जीवन बिताते रहे, जिसकी उड़ान को उन्होंने समर्थन दिया था।