
देश में तानाशाही की ओर बढ़ने का विरोध करते हुए मोर्चाबंदी शुरू
२९ चैत, काठमाडौँ। कानुन व्यवसायी, नागरिक समाज के नेता एवं छात्र नेता मोर्चाबंदी में शामिल हुए हैं। उन्होंने देश में तानाशाही की ओर बढ़ने का आरोप लगाते हुए विरोध स्वरूप मोर्चाबंदी आरंभ की है। प्रगतिशील रूपांतरण अभियान के आयोजन में काठमाडौँ के भृकुटीमण्डप स्थित ल क्याम्पस में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने शैक्षिक संस्थानों में विद्यार्थी संगठनों पर लगने वाली प्रतिबंधों का कड़ा विरोध किया है। सरकार के इस कदम को असंवैधानिक तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधि के विपरीत बताते हुए उन्होंने देश में तानाशाही का संकेत मिलने का आरोप लगाकर कड़ा संघर्ष जारी रखने की चेतावनी दी है।
सरकार ने शासकीय सुधार से संबंधित १०० बिंदु प्रस्तुत किए हैं, जिनमें विद्यार्थी संगठन बंद करने का प्रस्ताव भी शामिल है। अधिवक्ता, नागरिक समाज एवं विद्यार्थी संगठन के नेताओं ने इसे लोकतंत्र और संविधान द्वारा सुनिश्चित मौलिक अधिकारों पर गंभीर हमला बताया है। अधिवक्ता अञ्जिता खनाल, विश्लेषक युग पाठक एवं विभिन्न विद्यार्थी संगठनों के नेताओं ने सरकार के इस कदम को तानाशाही की छवि वाला करार दिया है। अञ्जिता खनाल ने कहा कि सरकार द्वारा नीति एवं कार्यक्रम में विद्यार्थी संगठन समाप्त करने की बात उठाना असंवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधि के खिलाफ है।
संविधान की धारा १७ के तहत प्रत्येक नागरिक को संस्था स्थापना करने तथा स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्ति करने का अधिकार प्राप्त है, इसका स्मरण कराते हुए उन्होंने सरकार के इस कदम का कड़ा प्रतिवाद करने का संकल्प व्यक्त किया। खनाल ने प्रधानमंत्री के पोशाक चयन पर भी सवाल उठाए। कहा कि नेपाली सेना के कार्यक्रम में राष्ट्रीय पोशाक दौरा सुरुवाल पहनकर भाग लेने वाले प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधि सभा में टी-शर्ट पहनना उचित नहीं किया। ‘‘प्रतिनिधि सभा राष्ट्रीयता प्रदर्शित करने वाला स्थान है। क्या वहाँ प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय पोशाक नहीं पहननी चाहिए?’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम बालेन्द्र शाह को किस नजर से देखते हैं?’’
अञ्जिता खनाल का विश्लेषण है कि बहुदलीय राजनीति को स्वीकार न करने और विचारों की रक्षा न होने से देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। लेखक और विश्लेषक युग पाठक ने कहा कि नेपाली राजनीति में तानाशाही के स्पष्ट लक्षण उभरने लगे हैं और देश गम्भीर वैचारिक संकट में फंसा हुआ है। उन्होंने प्रधानमंत्री शाह की कार्यशैली, नए राजनीतिक दलों के उदय और विद्यार्थी संगठन समाप्ति के विवाद को जोड़ कर यह विश्लेषण दिया है। ‘‘बौद्धिक वर्ग बालेन्द्र की चश्मा, कपड़े और चलने के अंदाज से प्रभावित हो रहा है, पर इस बहस के भीतर तानाशाही के स्पष्ट लक्षण छिपे हुए हैं,’’ वह कहते हैं। ‘‘संसार में तानाशाहों का पहला काम लोगों के संगठनों को खत्म करना होता है। पार्टियों के अपने वैचारिक दृष्टिकोण होते हैं जो समाज को दिशा देते हैं। विद्यार्थी संगठन नहीं होंगे तो वैचारिक विमर्श कैसे होगा?’’
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के निकट विद्यार्थी संगठन के नेता विराज थापा ने सरकार की विद्यार्थी संगठन एवं ट्रेड यूनियन पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी को ‘डक्ट्रिन ऑफ प्वाइजनस ट्री’ (विष वृक्ष का सिद्धांत) से तुलना की है। थापा का कहना है कि विद्यार्थी संगठन की सबसे अधिक आवश्यकता उन विद्यार्थी वर्गों को है जो आवाज़हीन एवं सीमांतित समुदायों से आते हैं। उनके अनुसार, तीन प्रमुख विद्यार्थी संगठनों में ३२ वर्ष की आयु सीमा लागू हो चुकी है, और स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन (स्ववियु) में २८ वर्ष की सीमा। इससे चंदा जुटाने और विवाद उत्पन्न करने की प्रवृत्ति खत्म हो गई है और वास्तविक विद्यार्थी नेतृत्व कर पा रहे हैं।
नेत्रविक्रम चन्द नेतृत्व वाली नेकपा (माओवादी) के निकट विद्यार्थी संगठन के नेता नरेन्द्र बिके ने शैक्षिक क्षेत्र की सभी समस्याओं की जड़ विद्यार्थी संगठन नहीं बल्कि नेपाल सरकार तथा राज्य की सोच को बताया। संविधान की धारा ३१ में निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित है, बावजूद इसके शिक्षा अधिनियम अभी तक न आना तथा अगर आए तो माफियाओं के हित में संशोधन होना विडम्बनापूर्ण बताया और इस पर ध्यान देने की मांग की।