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लोप हुँदै झिँगटीको छाना – Online Khabar

तेह्रथुम में झिँगटी छत का विलुप्तिकरण

तेह्रथुम के गांवों में झिँगटी की छत पारंपरिक रूप से घर की छत पर उपयोग की जाती थी, लेकिन अब यह तीव्रता से लुप्त होती जा रही है। झिँगटी की छत घर के अंदर तापमान संतुलित रखने का काम करती है, जबकि टिन की छतें गर्मी में अत्यधिक गर्मी और सर्दी में ठंडक बढ़ाने की समस्या पैदा करती हैं। स्थानीय प्रशासन और समुदाय को झिँगटी बनाने की कला को संरक्षित करने, प्रशिक्षण देने और पर्यटन को बढ़ावा देने के माध्यम से इसे बचाने की आवश्यकता बताई जा रही है।

३० चैत, पाँचथर – तेह्रथुम के म्याङलुङ से छथर, फेदाप, आठराई और लालीगुड़ासहित विभिन्न गांवों के बसेरों में एक समय घर की छतों पर झिँगटी की छत सजाई जाती थी, जो अब धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही है। ग्रामीण समाज की जीवनशैली, पहचान और सांस्कृतिक विरासत से गहरा जुड़ा यह पारंपरिक छतें अब तेज़ी से लुप्त हो रही हैं।

तेह्रथुम के कई गांवों में पत्थर और मिट्टी से बने घरों और उनकी छतों पर लगाए झिँगटी के छतें अपनी अलग सुंदरता प्रस्तुत कर रही थीं। विशेष रूप से, होनेखाने, ठुलाबड़ा, सुब्बा और मुखियाओं के घरों में झिँगटी की छत होना सम्मान और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज तेह्रथुम के कई गांवों में दृश्य बदल गया है। कच्ची सड़कों के पक्की सड़क बनने, गांवों तक आधुनिकता पहुँचने, बाजार से जुड़ाव बढ़ने और नई निर्माण सामग्री की आसान उपलब्धता के कारण टिन की छतें और कंक्रीट के घर तेजी से बढ़ रहे हैं।

म्याङलुङ नगरपालिका–२ के स्थानीय लीलाबहादुर तुम्बाहाङफे कहते हैं, ‘पहले गांवों में झिँगटी की छत वाले घर बहुत सम्मानित होते थे। अब तो गांव में भी टिन और सीमेंट के घर ज्यादा बन रहे हैं, जिससे झिँगटी छत लगाने का चलन कम होता जा रहा है।’ उनके अनुसार, झिँगटी बनाने और छत आवरण की विशेषज्ञ कारिगर अब गांवों में लगभग नहीं मिलते। झिँगटी छत की मुख्य विशेषता इसका प्राकृतिक तापमान संतुलन है।

गर्मी और ठंडे मौसम में झिँगटी की छत घर के अंदर तापमान को संतुलित रखने में मदद करती है। गर्मी में ठंडक और सर्दी में गर्माहट प्रदान करने वाली इस छत पर बैठने से वातावरण के साथ मेल खाने का एहसास होता है। स्थानीय खगेन्द्रप्रसाद ढकाल कहते हैं, ‘समाज बदलने के साथ-साथ पुराने निर्माण और परंपराएं भी लुप्त हो रही हैं। झिँगटी की छत भी इसी बदलाव के साथ धीरे-धीरे गायब हो रही है।’

तेह्रथुम के गांवों में झिँगटी बनाने की कला भी लुप्त हो रही है। पहले गांव में ही मिट्टी से झिँगटी बनाने और छत बनाने के कारीगर होते थे, लेकिन अब वह ज्ञान नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहा है। विदेश में रोजगार, शिक्षा के अवसरों की खोज और वैकल्पिक व्यवसाय की ओर युवाओं के आकर्षित होने से ये पारंपरिक कौशल छुपने लगे हैं। इस प्रकार झिँगटी छत के साथ ही ग्रामीण जीवनशैली, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक पहचान के कुछ पहलू भी लुप्त होते जा रहे हैं।

झिँगटी की छत हमारे अतीत की जीवंत दस्तावेज है। यह ग्रामीण समाज का इतिहास, तकनीक, पर्यावरणीय ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्य समेटे हुए है। यदि इसे संरक्षित न किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल पुस्तकों में पढ़ेंगी, गांवों में देखना असंभव होगा। इसलिए स्थानीय प्रशासन, संबंधित पक्ष और समुदाय को मिलकर इसकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रयासरत रहना आवश्यक है।

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