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सरकार द्वारा विद्यार्थी संगठन हटाने का निर्णय: उठाए गए कदम और विरोध की आवाजें

सरकार ने ६० दिन के भीतर विद्यालय और विश्वविद्यालय से दलीय विद्यार्थी संगठनों को हटाने और स्वतंत्र स्टूडेंट काउंसिल स्थापित करने का निर्णय लिया है। विद्यार्थी संगठनों ने इस निर्णय को असंवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए विरोध जताया है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति केदारभक्त माथेमा ने कहा है कि विश्वविद्यालय में दलगत संगठन आवश्यक नहीं हैं, लेकिन विद्यार्थी गर्वनेंस आवश्यक है। ७ वैशाख, काठमांडू।

सरकार विश्वविद्यालय से दलीय विद्यार्थी संगठनों को हटाने के लिए सक्रिय है। सरकार ने अपनी १०० दिन की कार्ययोजना में बताया था कि ६० दिन के भीतर विद्यालय और विश्वविद्यालय से दलीय संगठन हटाए जाएंगे। शासकीय सुधारों की १०० योजनाओं में कहा गया, ‘‘शिक्षा क्षेत्र में दलीय हस्तक्षेप, विद्यार्थियों की वास्तविक आवाज़ न सुनना और शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए ६० दिन के भीतर विद्यालय और विश्वविद्यालय से दलीय विद्यार्थी संगठन संरचनाओं को हटाकर ९० दिन के भीतर ‘स्टूडेंट काउंसिल’ या ‘वॉयस ऑफ स्टूडेंट’ जैसे तंत्र विकसित किए जाएंगे।’’ इस प्रकार दलगत विद्यार्थी संगठनों के प्रति सख्त रवैया अपनाते हुए सरकार ने विश्वविद्यालय परिसरों में विद्यार्थियों को उपलब्ध कराए गए संरचनाओं को दो माह के भीतर खाली करने का निर्णय लिया है।

शिक्षा, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी मंत्री सस्मित पोखरेल ने उपकुलपतियों को निर्देश दिया है कि वे ६० दिन के भीतर विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराए गए पूर्वाधार खाली कराएं। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन के नियमों में आवश्यक संशोधन करते हुए स्टूडेंट काउंसिल या वॉयस ऑफ स्टूडेंट जैसे स्वतंत्र तंत्र की स्थापना की तैयारी में है। यदि दलीय विद्यार्थी संगठन हटाने की प्रक्रिया में कोई सुरक्षा चुनौती आती है तो विश्वविद्यालय परिसर में अस्थायी या स्थायी सुरक्षा इकाई स्थापित करने का भी सरकार ने निर्णय लिया है। हालांकि, इस निर्णय के साथ ही इसके पक्ष और विपक्ष में बहस भी शुरू हो चुकी है।

सोशल मीडिया पर इस विषय पर चर्चा शुरू हो चुकी है। छात्र संगठनों के विरोध में विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े १४ विद्यार्थी संगठनों ने एक बयान जारी कर सरकारी निर्णय की आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि छात्र आंदोलन की पुनर्गठन सरकार की प्राथमिकता हो तो वह स्वागत योग्य है, लेकिन सुधार के नाम पर विचार, अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना अपरिपक्व, गैरराजनीतिक, अप्राकृतिक, असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है।

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